संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान भारत का पक्ष रखा। उन्होंने दोहरे रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि साख बचाने के लिए परिषद को सभी देशों के साथ एक जैसा व्यवहार करना चाहिए। भारत ने आतंकवाद को गंभीर खतरा बताते हुए इस मुद्दे पर शून्य सहनशीलता की नीति अपनाने की मांग की है।

मानवाधिकारों के नाम पर राजनीति बंद करने की अपील
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान भारत का कड़ा रुख दुनिया के सामने रखा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि इस संस्था की साख तभी कायम रह सकती है, जब यह बिना किसी भेदभाव के सभी सदस्य देशों के साथ एक जैसा और निष्पक्ष व्यवहार करे। किसी भी विशिष्ट देश को बिना शामिल किए उसके खिलाफ विशेष आदेश जारी करने से जमीनी स्तर पर कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आता है। इसके विपरीत इस तरह के कदमों से केवल परिषद के भीतर आपसी मतभेद और दूरियां ही बढ़ती हैं। भारत का स्पष्ट मानना है कि मानवाधिकारों की रक्षा की आड़ में किसी खास देश को निशाना बनाना या अपने हितों के हिसाब से दोहरे मापदंड अपनाना बिल्कुल भी सही तरीका नहीं है।
बातचीत और सच्ची साझेदारी से आगे बढ़ाने होंगे अधिकार
अपने संबोधन के दौरान भारतीय प्रतिनिधि ने विदेश मंत्री एस जयशंकर के फरवरी माह में दिए गए महत्वपूर्ण बयान का भी विशेष रूप से उल्लेख किया। जयशंकर ने मानवाधिकार परिषद के इकसठवें उच्चस्तरीय सत्र के दौरान कहा था कि मानवाधिकारों को सही मायनों में आगे बढ़ाने का सबसे बेहतरीन और प्रभावी जरिया आपसी बातचीत, क्षमता बढ़ाने में सहायता प्रदान करना और सच्ची साझेदारी का निर्माण करना है। राजनीतिक फायदों को साधने के लिए मानवाधिकारों का हथियार की तरह इस्तेमाल करना और चुनिंदा देशों को बार-बार सवालों के घेरे में खड़ा करना पूरी तरह अनुचित है। भारत का यह दृढ़ मत है कि यदि परिषद को एकजुट होकर प्रभावी रूप से कार्य करना है, तो उसे उन तमाम गंभीर आरोपों से बचना होगा जिसमें यह कहा जाता है कि मानवाधिकारों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है।
यूनिवर्सल पीरियोडिक रिव्यू और आतंकवाद पर भारत का कड़ा रुख
भारत ने यूनिवर्सल पीरियोडिक रिव्यू को मानवाधिकारों पर खुली चर्चा के लिए एक बेहतरीन और पारदर्शी मंच करार दिया है। इस अनोखी व्यवस्था के तहत संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की गहन समीक्षा की जाती है, जिसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें हर देश को पूर्ण रूप से बराबर माना जाता है और आपसी बातचीत के माध्यम से सुधार लाने पर विशेष जोर दिया जाता है। इस वर्ष दो हजार छब्बीस से दो हजार अट्ठाइस के कार्यकाल के लिए भारत सातवीं बार इस मानवाधिकार परिषद का सदस्य निर्वाचित हुआ है। इसके साथ ही भारत ने आतंकवाद को मानवाधिकारों के लिए सबसे भयंकर और गंभीर खतरों में से एक करार दिया है। खास तौर पर जीवन के अधिकार पर मंडराते इस खतरे को रेखांकित करते हुए परिषद से पुरजोर अपील की गई कि वह आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को अपनाए और इस संवेदनशील मुद्दे पर निरंतर अपनी कड़ी नजर रखे।
विकास के अधिकार को प्राथमिकता और वित्तीय पारदर्शिता की मांग
भारत ने इस बात पर भी जोर दिया कि मानवाधिकारों को संकीर्ण नजरिए से देखने के बजाय सभी प्रकार के अधिकारों को समान महत्व दिया जाना चाहिए। नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की तरह ही आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ-साथ विकास के अधिकार को भी सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। विकासशील देशों में बढ़ती गरीबी, भारी कर्ज का बोझ और नई तकनीक तक सीमित पहुंच लोगों के बुनियादी अधिकारों के मार्ग में बड़ी बाधा हैं और इनका समाधान दबाव बनाने से नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है। इसके अलावा भारत ने मांग की कि परिषद को अपने संसाधनों के दायरे में काम करना चाहिए तथा सुधार पूरी पारदर्शिता और सदस्य देशों की अगुवाई में होने चाहिए। विकास संबंधी कार्य प्रभावित नहीं होने चाहिए और परिषद का बजट नियमित रूप से संयुक्त राष्ट्र द्वारा पर्याप्त रूप से पोषित होना चाहिए न कि स्वैच्छिक फंड पर निर्भर रहना चाहिए।
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स्रोत: Amar Ujala, Aaj Tak





