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अंटार्कटिक संधि: 1959 में 12 देशों का समझौता, बर्फीले महाद्वीप पर सेना और खनन पर रोक, मैड्रिड प्रोटोकॉल और भारत की भूमिका

धरती का अकेला महाद्वीप, जो किसी देश का नहीं और जहां सिर्फ विज्ञान और शांति के काम होते हैं। जानिए अंटार्कटिक संधि क्या है।

बर्फीले अंटार्कटिका में शोध केंद्र का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • अंटार्कटिका धरती का सबसे ठंडा, सबसे सूखा और सबसे तेज हवाओं वाला महाद्वीप है।
  • 1957 और 1958 को अंतरराष्ट्रीय भूभौतिकीय वर्ष के रूप में मनाया गया।
  • संधि में दो तरह के सदस्य हैं। सलाहकार दल वे देश हैं, जो अंटार्कटिका में ठोस वैज्ञानिक काम करते हैं, जैसे शोध केंद्र बनाना या वैज्ञानिक अभियान भेजना।
  • भारत ने 1981 में अंटार्कटिका के लिए अपना पहला वैज्ञानिक अभियान भेजा।

अंटार्कटिका धरती का सबसे ठंडा, सबसे सूखा और सबसे तेज हवाओं वाला महाद्वीप है। यह करीब 1.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर में फैला है और लगभग पूरा बर्फ की मोटी चादर से ढका है। यहां कोई स्थायी आबादी नहीं है, सिर्फ वैज्ञानिक और सहायक कर्मचारी शोध केंद्रों में रहते हैं। सबसे खास बात यह है कि यह महाद्वीप किसी एक देश का नहीं है। यहां सैन्य गतिविधियां और खनन मना है और यहां सिर्फ शांतिपूर्ण और वैज्ञानिक काम होते हैं। यह सब संभव हुआ है अंटार्कटिक संधि के कारण। इस लेख में जानिए यह संधि कैसे बनी, इसके मुख्य नियम क्या हैं और भारत की इसमें क्या भूमिका है।

संधि से पहले का दौर

20वीं सदी की शुरुआत में कई देशों ने अंटार्कटिका के अलग अलग हिस्सों पर दावा करना शुरू किया। अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, चिली, फ्रांस, न्यूजीलैंड, नॉर्वे और ब्रिटेन ने अपने अपने क्षेत्रों पर दावा किया। इनमें से कुछ दावे एक दूसरे से टकराते थे। शीत युद्ध के उस दौर में अमेरिका और सोवियत संघ भी यहां सक्रिय थे। डर था कि यह बर्फीला महाद्वीप भी टकराव का मैदान बन सकता है।

मुख्य बातें: बर्फीले अंटार्कटिका में शोध केंद्र का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

अंतरराष्ट्रीय भूभौतिकीय वर्ष

1957 और 1958 को अंतरराष्ट्रीय भूभौतिकीय वर्ष के रूप में मनाया गया। इस दौरान 12 देशों ने अंटार्कटिका में 50 से ज्यादा शोध केंद्र बनाए और मिलकर वैज्ञानिक काम किया। इस सहयोग की सफलता ने दिखाया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद देश अंटार्कटिका में साथ काम कर सकते हैं। इसी से एक स्थायी समझौते का रास्ता खुला।

संधि पर हस्ताक्षर

1 दिसंबर 1959 को अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में 12 देशों ने अंटार्कटिक संधि पर हस्ताक्षर किए। ये देश थे अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, चिली, फ्रांस, जापान, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और अमेरिका। संधि 23 जून 1961 को लागू हुई। आज 50 से ज्यादा देश इसके सदस्य हैं।

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संधि के मुख्य नियम

  • अंटार्कटिका का इस्तेमाल सिर्फ शांतिपूर्ण कामों के लिए होगा। सैन्य अड्डे, सैन्य अभ्यास और हथियारों का परीक्षण मना है। हालांकि वैज्ञानिक कामों में सेना के लोगों और साधनों की मदद ली जा सकती है।
  • वैज्ञानिक शोध की आजादी होगी और देश अपनी योजनाएं, वैज्ञानिक और नतीजे एक दूसरे से साझा करेंगे।
  • संधि के लागू रहने तक कोई देश नया क्षेत्रीय दावा नहीं करेगा और पुराने दावे भी बढ़ाए नहीं जाएंगे। संधि पुराने दावों को न मानती है, न नकारती है, बल्कि उन्हें जहां का तहां रोक देती है।
  • अंटार्कटिका में परमाणु विस्फोट और रेडियोधर्मी कचरा डालना पूरी तरह मना है।
  • सदस्य देश किसी भी समय दूसरे देशों के शोध केंद्रों का निरीक्षण कर सकते हैं।
  • यह संधि 60 डिग्री दक्षिणी अक्षांश के दक्षिण के पूरे इलाके पर लागू होती है, जिसमें बर्फ की चट्टानें भी शामिल हैं।

सलाहकार दल

संधि में दो तरह के सदस्य हैं। सलाहकार दल वे देश हैं, जो अंटार्कटिका में ठोस वैज्ञानिक काम करते हैं, जैसे शोध केंद्र बनाना या वैज्ञानिक अभियान भेजना। इन्हें संधि की बैठकों में फैसलों पर वोट का अधिकार होता है। बाकी देश सदस्य होते हैं, लेकिन उन्हें वोट का अधिकार नहीं होता। हर साल अंटार्कटिक संधि सलाहकार बैठक होती है। संधि का सचिवालय अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में है।

मैड्रिड प्रोटोकॉल

1991 में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में अंटार्कटिक संधि के पर्यावरण संरक्षण प्रोटोकॉल पर सहमति बनी, जो 1998 में लागू हुआ। इसे मैड्रिड प्रोटोकॉल कहा जाता है। इसमें अंटार्कटिका को शांति और विज्ञान के लिए समर्पित प्राकृतिक भंडार घोषित किया गया। वैज्ञानिक शोध को छोड़कर खनिज संसाधनों से जुड़ी हर गतिविधि पर रोक लगा दी गई। इसके अलावा कचरा प्रबंधन, समुद्री प्रदूषण रोकने और वन्यजीवों की सुरक्षा के सख्त नियम बनाए गए। 2048 के बाद इस प्रोटोकॉल की समीक्षा की मांग की जा सकती है।

भारत की भूमिका

भारत ने 1981 में अंटार्कटिका के लिए अपना पहला वैज्ञानिक अभियान भेजा। 1983 में भारत अंटार्कटिक संधि में शामिल हुआ और उसी साल उसे सलाहकार दल का दर्जा मिल गया। भारत ने 1983 में अपना पहला शोध केंद्र दक्षिण गंगोत्री बनाया। इसके बाद 1989 में मैत्री और 2012 में भारती नाम के शोध केंद्र शुरू हुए। इन केंद्रों का संचालन गोवा का राष्ट्रीय ध्रुवीय और समुद्री अनुसंधान केंद्र यानी NCPOR करता है। 2022 में भारत ने अपना अंटार्कटिक अधिनियम बनाया, ताकि भारतीय अभियानों और गतिविधियों पर संधि के नियम कानूनी रूप से लागू हों। मई 2024 में भारत ने कोच्चि में 46वीं अंटार्कटिक संधि सलाहकार बैठक की मेजबानी की।

आज की चुनौतियां

जलवायु परिवर्तन से अंटार्कटिका की बर्फ पिघलने की रफ्तार पर वैज्ञानिकों की नजर है, क्योंकि इसका असर दुनिया भर के समुद्र के स्तर पर पड़ता है। पर्यटन बढ़ने से पर्यावरण पर दबाव भी बढ़ा है। समुद्री संसाधनों, खासकर क्रिल मछली के शिकार को लेकर भी बहस होती है, जिसके लिए अलग समझौता बना है।

अंटार्कटिक संधि पर कब हस्ताक्षर हुए

1 दिसंबर 1959 को, वाशिंगटन में।

शुरुआत में कितने देश थे

12।

भारत संधि में कब शामिल हुआ

1983 में।

अंटार्कटिका में खनन पर रोक किस समझौते से लगी

1991 के मैड्रिड प्रोटोकॉल से।

स्रोत: Secretariat of the Antarctic Treaty, NCPOR, Ministry of Earth Sciences, Ministry of Earth Sciences

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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