देश के करोड़ों आदिवासी परिवारों की आजीविका जंगल से मिलने वाली उपज पर टिकी है। महुआ के फूल, इमली, चिरौंजी, साल के बीज, शहद, लाख, आंवला, हर्रा, बहेड़ा और तेंदू पत्ता जैसी चीजें वे जंगल से इकट्ठा करते हैं और स्थानीय हाट में व्यापारियों को बेचते हैं। अक्सर उन्हें इसका बहुत कम दाम मिलता है, जबकि यही उपज साफ करके, सुखाकर या प्रसंस्करण के बाद शहरों में कई गुना कीमत पर बिकती है। इस अंतर को कम करने और आदिवासी समुदाय की आमदनी बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री वन धन योजना शुरू की। इस लेख में जानिए योजना कैसे काम करती है और इससे कौन जुड़ सकता है।
योजना की शुरुआत
प्रधानमंत्री वन धन योजना की शुरुआत 14 अप्रैल 2018 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर से हुई। इसे केंद्र सरकार का जनजातीय कार्य मंत्रालय भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ यानी TRIFED के जरिए चलाता है। राज्यों में इसे राज्य की नोडल एजेंसियां, जैसे वन विकास निगम, लघु वनोपज संघ या जनजातीय विकास निगम, लागू करती हैं। बाद में इस योजना को प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन के तहत आगे बढ़ाया गया।

लघु वनोपज क्या है
लघु वनोपज यानी माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस में लकड़ी को छोड़कर जंगल से मिलने वाली लगभग सभी चीजें आती हैं, जैसे फूल, फल, बीज, पत्ते, जड़ें, गोंद, लाख, शहद और औषधीय पौधे। वन अधिकार कानून 2006 के तहत जंगल में रहने वाले समुदायों को इन्हें इकट्ठा करने, इस्तेमाल करने और बेचने का अधिकार मिला हुआ है।
वन धन विकास केंद्र
योजना का मुख्य ढांचा वन धन विकास केंद्र है। आम तौर पर एक केंद्र में 15 स्वयं सहायता समूह होते हैं और हर समूह में करीब 20 सदस्य, यानी कुल करीब 300 सदस्य। इनमें ज्यादातर आदिवासी महिलाएं होती हैं। केंद्र में वन उपज को इकट्ठा करने, साफ करने, सुखाने, छांटने, पैक करने और प्रसंस्करण की सुविधा होती है। जैसे महुआ से लड्डू या सिरप, इमली से बिना बीज की इमली या कैंडी, शहद की पैकिंग और आंवले से मुरब्बा या कैंडी बनाना।
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आर्थिक मदद और ट्रेनिंग
हर वन धन विकास केंद्र को प्रसंस्करण मशीनें, औजार, गोदाम और कामकाजी पूंजी के लिए आर्थिक मदद दी जाती है। सदस्यों को उपज को सही तरीके से इकट्ठा करने, गुणवत्ता बनाए रखने, प्रसंस्करण, पैकिंग, हिसाब किताब और बाजार से जुड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है। इससे वे अपने उत्पादों का बेहतर दाम पा सकते हैं।
बाजार से जुड़ाव
TRIFED केंद्रों के उत्पादों को अपने ट्राइब्स इंडिया ब्रांड के तहत बेचने में मदद करता है। ट्राइब्स इंडिया के देश भर में स्टोर हैं और ऑनलाइन बिक्री भी होती है। इसके अलावा राज्य सरकारें मेलों, प्रदर्शनियों और निजी कंपनियों से समझौतों के जरिए भी उत्पाद बिकवाती हैं। कई केंद्रों ने अपने ब्रांड बनाकर शहरों तक पहुंच बनाई है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य का साथ
वन धन योजना के साथ लघु वनोपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP की योजना भी चलती है। इसमें केंद्र सरकार कई वन उपजों के लिए न्यूनतम दाम तय करती है। अगर बाजार में दाम इससे नीचे गिरें, तो राज्य की एजेंसियां आदिवासियों से इसी दाम पर खरीद करती हैं। इससे उन्हें बिचौलियों के शोषण से कुछ हद तक राहत मिलती है।
कौन जुड़ सकता है
योजना मुख्य रूप से जंगल पर निर्भर आदिवासी समुदायों के लिए है। गांव के आदिवासी परिवार स्वयं सहायता समूह बनाकर या पहले से बने समूहों के जरिए वन धन विकास केंद्र से जुड़ सकते हैं। इसके लिए जिले के जनजातीय विकास विभाग, वन विभाग, राज्य की नोडल एजेंसी या राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के कार्यकर्ताओं से संपर्क किया जा सकता है।
योजना से बदलाव
कई राज्यों से ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां वन धन केंद्रों से जुड़ी महिलाओं ने महुआ, इमली या शहद के प्रसंस्करण से पहले के मुकाबले बेहतर कमाई की। गांव में ही काम मिलने से पलायन भी कुछ हद तक कम हुआ है। हालांकि कई केंद्रों के सामने बाजार तक पहुंच, कामकाजी पूंजी की कमी और ट्रेनिंग की निरंतरता जैसी चुनौतियां भी हैं, जिन पर लगातार काम की जरूरत है।
महुआ का उदाहरण
महुआ के फूल मध्य भारत के आदिवासी इलाकों की सबसे अहम वन उपज में से एक हैं। पहले ज्यादातर परिवार इन्हें जमीन से बटोरकर सीधे सुखाकर बेचते थे, जिससे इनमें धूल और मिट्टी मिल जाती थी और दाम कम मिलता था। वन धन केंद्रों में महिलाओं को पेड़ के नीचे जाल बिछाकर साफ फूल इकट्ठा करने और उन्हें साफ जगह पर सुखाने की ट्रेनिंग दी गई। साफ महुआ का दाम बेहतर मिलता है। कई केंद्र महुआ से लड्डू, कुकीज, जैम और सिरप जैसे उत्पाद भी बना रहे हैं, जिनकी शहरों में मांग है। इसी तरह इमली से बीज निकालकर और उसकी ईंटें बनाकर बेचने से भी आमदनी बढ़ती है।
प्रधानमंत्री वन धन योजना कब शुरू हुई
14 अप्रैल 2018 को, छत्तीसगढ़ के बीजापुर से।
योजना कौन सी एजेंसी चलाती है
जनजातीय कार्य मंत्रालय, TRIFED के जरिए।
एक वन धन विकास केंद्र में कितने सदस्य होते हैं
आम तौर पर 15 समूह और करीब 300 सदस्य।
वन धन उत्पाद कहां बिकते हैं
ट्राइब्स इंडिया स्टोर, ऑनलाइन और मेलों में।
स्रोत: TRIFED, Ministry of Tribal Affairs, PIB: Van Dhan Yojana





