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लोक अदालत क्या है: कौन से मामले सुलझते हैं, कोर्ट फीस नहीं लगती और फैसला अंतिम होता है

लोक अदालत क्या है, कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987, कौन से मामले सुलझते हैं, आवेदन की प्रक्रिया, स्थायी लोक अदालत और मुफ्त कानूनी सहायता।

लोक अदालत की प्रक्रिया और फायदे बताने वाला ग्राफिक
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सारांश

  • अदालतों में मुकदमे सालों तक चलते रहते हैं, जिससे समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं।
  • लोक अदालत को कानूनी आधार विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 से मिला है।
  • लोक अदालत में कोई कोर्ट फीस नहीं लगती। अगर अदालत में लंबित मामला यहां सुलझ जाता है, तो कानून के मुताबिक पहले जमा की गई कोर्ट फीस वापस मिल सकती है।
  • अगर आपका केस अदालत में चल रहा है, तो आप संबंधित अदालत में आवेदन देकर उसे लोक अदालत में भेजने का अनुरोध कर सकते हैं।

अदालतों में मुकदमे सालों तक चलते रहते हैं, जिससे समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं। ऐसे में लोक अदालत एक ऐसा मंच है, जहां दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद सुलझा सकते हैं। यहां न लंबी तारीखें होती हैं और न कोर्ट फीस। जानिए लोक अदालत क्या है, इसमें कौन से मामले जाते हैं और इसका फैसला कितना मान्य होता है।

लोक अदालत क्या है

लोक अदालत को कानूनी आधार विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 से मिला है। इसका आयोजन राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), राज्य, जिला और तालुका स्तर के विधिक सेवा प्राधिकरण करते हैं। लोक अदालत की बेंच में आमतौर पर एक न्यायिक अधिकारी के साथ वकील या सामाजिक कार्यकर्ता सदस्य होते हैं। इसका मकसद समझौते और बातचीत से विवाद खत्म करना है, न कि किसी को दोषी ठहराना। देशभर में समय-समय पर राष्ट्रीय लोक अदालत भी लगाई जाती है, जिसमें एक ही दिन बड़ी संख्या में मामले निपटाए जाते हैं।

मुख्य बातें: लोक अदालत की प्रक्रिया और फायदे बताने वाला ग्राफिक
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कौन से मामले लोक अदालत में जाते हैं

  • अदालत में लंबित दीवानी मामले और समझौते योग्य आपराधिक मामले
  • मोटर दुर्घटना मुआवजे के दावे
  • बैंक कर्ज की वसूली और चेक बाउंस से जुड़े मामले
  • बिजली, पानी और टेलीफोन बिल के विवाद
  • पारिवारिक विवाद, जैसे भरण-पोषण, और श्रम से जुड़े मामले

ऐसे अपराध जिनमें कानून समझौते की अनुमति नहीं देता, लोक अदालत में नहीं सुलझाए जा सकते। अदालत में केस दायर होने से पहले के विवाद भी प्री-लिटिगेशन मामले के रूप में लोक अदालत में ले जाए जा सकते हैं।

लोक अदालत के फायदे

लोक अदालत में कोई कोर्ट फीस नहीं लगती। अगर अदालत में लंबित मामला यहां सुलझ जाता है, तो कानून के मुताबिक पहले जमा की गई कोर्ट फीस वापस मिल सकती है। प्रक्रिया सरल और अनौपचारिक होती है, इसलिए पक्षकार खुद भी अपनी बात रख सकते हैं। अधिनियम के तहत लोक अदालत का फैसला सिविल कोर्ट की डिक्री माना जाता है और सभी पक्षों पर बाध्यकारी होता है। इसके खिलाफ किसी अदालत में अपील नहीं होती, क्योंकि यह दोनों पक्षों की सहमति से होता है। समझौता न हो, तो मामला वापस संबंधित अदालत में चला जाता है।

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लोक अदालत में मामला कैसे भेजें

अगर आपका केस अदालत में चल रहा है, तो आप संबंधित अदालत में आवेदन देकर उसे लोक अदालत में भेजने का अनुरोध कर सकते हैं। दूसरा पक्ष भी सहमत हो, तो मामला भेजा जाता है। प्री-लिटिगेशन मामलों के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यालय में आवेदन दिया जा सकता है। राष्ट्रीय लोक अदालत की तारीखें NALSA और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों की वेबसाइट पर जारी होती हैं।

स्थायी लोक अदालत और मुफ्त कानूनी सहायता

सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं, जैसे परिवहन, डाक, बिजली, पानी, अस्पताल और बीमा से जुड़े विवादों के लिए स्थायी लोक अदालत की व्यवस्था है। यहां समझौता न होने पर भी अदालत मामले का फैसला कर सकती है। आर्थिक रूप से कमजोर लोग, महिलाएं, बच्चे और कुछ अन्य वर्ग विधिक सेवा प्राधिकरण से मुफ्त कानूनी सहायता भी ले सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या लोक अदालत में वकील जरूरी है?

नहीं, पक्षकार खुद भी अपनी बात रख सकते हैं।

क्या लोक अदालत का फैसला बाद में बदल सकता है?

फैसला अंतिम होता है और उस पर अपील नहीं होती।

स्रोत: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987, इंडिया कोड। जानकारी अक्टूबर 2026 तक की।

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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