संक्षेप में: किसी संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को देने पर FIR दर्ज होती है। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 के तहत अब किसी भी थाने में जीरो FIR और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से e-FIR की व्यवस्था कानून में शामिल है। यहां जानिए FIR दर्ज कराने का तरीका और पुलिस मना करे तो क्या करें।
FIR क्या है और कब दर्ज होती है
FIR यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट वह दस्तावेज है, जिससे किसी संज्ञेय अपराध की पुलिस जांच शुरू होती है। संज्ञेय अपराध वे हैं, जिनमें पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है, जैसे चोरी, लूट, मारपीट से गंभीर चोट, धोखाधड़ी या दुष्कर्म। असंज्ञेय मामलों, जैसे मामूली गाली-गलौज, में पुलिस शिकायत दर्ज करती है, लेकिन जांच के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी होती है। पहले FIR का प्रावधान CrPC की धारा 154 में था, अब यह BNSS की धारा 173 में है।
थाने जाकर FIR दर्ज कराने का तरीका
- घटना वाली जगह या नजदीकी थाने जाएं और ड्यूटी अधिकारी को लिखित या मौखिक सूचना दें।
- मौखिक सूचना को पुलिस लिखेगी और आपको पढ़कर सुनाएगी। ठीक लगने पर ही हस्ताक्षर करें।
- घटना की तारीख, समय, जगह, आरोपी (अगर पता हो), गवाह और नुकसान का विवरण साफ-साफ बताएं।
- कानून के तहत FIR की कॉपी सूचना देने वाले को मुफ्त मिलती है। FIR नंबर जरूर नोट करें।
महिलाओं के खिलाफ कुछ गंभीर अपराधों में बयान महिला पुलिस अधिकारी दर्ज करती है। आपात स्थिति में पहले 112 पर कॉल करें।
जीरो FIR और e-FIR क्या हैं
जीरो FIR: अपराध किसी भी इलाके में हुआ हो, पीड़ित किसी भी थाने में FIR दर्ज करा सकता है। थाना रिपोर्ट लिखकर उसे संबंधित क्षेत्र के थाने को भेज देता है। इससे इलाके के विवाद में समय बर्बाद नहीं होता।
e-FIR: BNSS के तहत सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी दी जा सकती है, लेकिन सूचना देने वाले को तीन दिन के भीतर उस पर हस्ताक्षर करने होते हैं, तभी वह FIR के रूप में दर्ज होती है। कई राज्यों की पुलिस वेबसाइट और ऐप पर वाहन चोरी, सामान चोरी या दस्तावेज गुम होने जैसे मामलों की ऑनलाइन शिकायत की सुविधा है। साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत करें।
पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें
- पुलिस अधीक्षक को शिकायत: थाना रिपोर्ट लिखने से मना करे, तो लिखित शिकायत डाक से या खुद जाकर SP/DCP को दें (BNSS धारा 173(4))।
- मजिस्ट्रेट के पास अर्जी: इसके बाद भी कार्रवाई न हो, तो मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देकर जांच का आदेश मांगा जा सकता है।
- प्रारंभिक जांच: तीन से सात साल तक की सजा वाले कुछ अपराधों में पुलिस FIR से पहले 14 दिन में प्रारंभिक जांच कर सकती है।
शिकायत से जुड़ी जानकारी या कार्रवाई की स्थिति जानने के लिए RTI आवेदन का रास्ता भी है। सरकारी विभागों में शिकायत निपटान के निर्देशों पर हमारी यह खबर भी पढ़ें।
FIR दर्ज कराते समय ध्यान रखें
- झूठी FIR दर्ज कराना खुद एक अपराध है, इसलिए केवल सही तथ्य बताएं।
- मेडिकल रिपोर्ट, फोटो, वीडियो, बिल या चैट जैसे सबूत संभालकर रखें।
- FIR की स्थिति कई राज्यों में पुलिस पोर्टल पर FIR नंबर से देखी जा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या FIR दर्ज कराने की कोई फीस है?
नहीं। FIR दर्ज कराना और उसकी कॉपी लेना दोनों मुफ्त हैं।
क्या ऑनलाइन दी गई सूचना सीधे FIR बन जाती है?
BNSS के तहत इलेक्ट्रॉनिक सूचना पर तीन दिन के भीतर सूचना देने वाले के हस्ताक्षर के बाद FIR दर्ज होती है।
क्या दूसरे शहर में हुई घटना की FIR अपने शहर में करा सकते हैं?
हां, जीरो FIR के तहत किसी भी थाने में FIR दर्ज कराई जा सकती है।
स्रोत: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (धारा 173 और 175), India Code, राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल। जानकारी अक्टूबर 2026 तक की।





