कार्तिक मास को दीपों का महीना भी कहा जाता है। इसी महीने में दिवाली और देव दीपावली जैसे बड़े दीपोत्सव आते हैं। कार्तिक की एक पुरानी परंपरा है आकाशदीप, यानी घर की छत, मंदिर के शिखर या ऊंचे बांस पर दीपक टांगना। बहुत से घरों में यह परंपरा पूरे कार्तिक महीने चलती है। जानिए कार्तिक में आकाशदीप का महत्व और इसे जलाने का तरीका।
आकाशदीप क्या है
आकाशदीप ऐसा दीपक है, जो जमीन से ऊंचे स्थान पर जलाया जाता है, ताकि उसकी रोशनी दूर से दिखे। पारंपरिक रूप से एक लंबे बांस के ऊपर टोकरी या लालटेन में दीपक रखकर उसे रस्सी से ऊपर खींचा जाता था। कई जगह छत की मुंडेर पर ऊंचाई पर दीप रखा जाता है। महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों में दिवाली के समय घरों के बाहर टंगे कंदील को भी आकाशदीप की परंपरा से जोड़ा जाता है।

परंपरा से जुड़ी मान्यताएं
लोक मान्यता में आकाशदीप को पितरों के मार्ग को प्रकाशित करने और देवताओं के स्वागत से जोड़ा जाता है। पुराणों से जुड़ी कथाओं में कार्तिक में दीपदान को बहुत पुण्यदायी बताया गया है। कई परिवार शरद पूर्णिमा या कार्तिक की शुरुआत से कार्तिक पूर्णिमा तक हर शाम आकाशदीप जलाते हैं।
वाराणसी और गंगा घाट
वाराणसी में कार्तिक महीने में गंगा घाटों पर बांस की लंबी डंडियों पर आकाशदीप टांगने की परंपरा प्रसिद्ध है। कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली के दिन घाट लाखों दीयों से जगमगा उठते हैं। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग भी देव दीपावली को राज्य के प्रमुख आयोजनों में गिनता है।
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आकाशदीप कैसे जलाएं
- शाम को सूर्यास्त के बाद दीप जलाने की परंपरा है
- मिट्टी के दीये में घी या तेल और रूई की बाती डालें
- दीये को ऐसी लालटेन या टोकरी में रखें, जिससे हवा से न बुझे
- बांस या छत पर इसे सुरक्षित तरीके से टांगें या रखें
- दीप जलाते समय भगवान विष्णु, लक्ष्मी या अपने इष्ट देव का स्मरण करें
सुरक्षा का ध्यान रखें
आकाशदीप ऊंचाई पर और खुली हवा में होता है, इसलिए सावधानी जरूरी है।
- कागज या कपड़े की लालटेन में खुली लौ न रखें, उसकी जगह कांच या धातु की लालटेन लें
- पेड़, बिजली के तार, सूखे पत्तों और कपड़ों से दूर टांगें
- तेज हवा वाले दिन जलती लौ की जगह LED लालटेन का इस्तेमाल करें
- छत की मुंडेर पर चढ़कर दीप न टांगें, सीढ़ी का सहारा लें
- दीप पूरी रात जलता रहे, तो उसकी देखरेख की व्यवस्था रखें
आधुनिक तरीका
शहरों के फ्लैटों में बांस पर दीप टांगना संभव नहीं होता। ऐसे में बालकनी में ऊंचाई पर टंगी लालटेन या कंदील भी इस परंपरा का रूप है। मिट्टी के दीयों और स्थानीय कारीगरों की बनाई लालटेन से परंपरा भी निभती है और कारीगरों को सहारा भी मिलता है।
आकाशदीप कब तक जलाया जाता है?
परंपरा में आमतौर पर पूरे कार्तिक मास, यानी कार्तिक पूर्णिमा तक, आकाशदीप जलाने का विधान बताया जाता है। 2026 में कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली की तारीख अपने पंचांग से देखें।
स्रोत: द्रिक पंचांग, उत्तर प्रदेश पर्यटन। जानकारी अक्टूबर 2026 तक की।





