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ओम पुरी: अंबाला से NSD और FTII तक, अर्ध सत्य के इंस्पेक्टर वेलणकर, दो राष्ट्रीय पुरस्कार और हॉलीवुड ब्रिटिश फिल्मों तक का सफर

खुरदुरे चेहरे और दमदार आवाज वाले ओम पुरी ने साबित किया कि अभिनय के लिए परंपरागत हीरो जैसा दिखना जरूरी नहीं।

फिल्म कैमरा और क्लैपरबोर्ड का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • हिंदी सिनेमा में लंबे समय तक हीरो का मतलब गोरा, सुंदर और चिकना चेहरा माना जाता था।
  • अभिनय सीखने के लिए ओम पुरी ने दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानी NSD में दाखिला लिया, जहां उनके सहपाठियों में नसीरुद्दीन शाह भी थे।
  • ओम पुरी ने गंभीर फिल्मों के साथ हल्की फुल्की फिल्मों में भी काम किया।
  • 6 जनवरी 2017 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से ओम पुरी का निधन हो गया।

हिंदी सिनेमा में लंबे समय तक हीरो का मतलब गोरा, सुंदर और चिकना चेहरा माना जाता था। ओम पुरी ने इस सोच को तोड़ा। चेचक के दाग वाले चेहरे और भारी आवाज के साथ उन्होंने ऐसे किरदार निभाए, जो आम आदमी के गुस्से, दर्द और संघर्ष को परदे पर जीवित कर देते थे। अर्ध सत्य के इंस्पेक्टर अनंत वेलणकर से लेकर ब्रिटिश फिल्म ईस्ट इज ईस्ट के जॉर्ज खान तक, उनका दायरा बहुत बड़ा था। इस लेख में जानिए ओम पुरी के जीवन और करियर की खास बातें।

कठिन बचपन

ओम पुरी का जन्म 18 अक्टूबर 1950 को हरियाणा के अंबाला में एक साधारण परिवार में हुआ। उनका बचपन आर्थिक तंगी में बीता। छोटी उम्र में उन्होंने ढाबे पर काम सहित कई छोटे मोटे काम किए। पढ़ाई के दौरान पंजाब में वे रंगमंच से जुड़े और यहीं से अभिनय में उनकी रुचि गहरी हुई।

मुख्य बातें: फिल्म कैमरा और क्लैपरबोर्ड का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

NSD और FTII

अभिनय सीखने के लिए ओम पुरी ने दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानी NSD में दाखिला लिया, जहां उनके सहपाठियों में नसीरुद्दीन शाह भी थे। इसके बाद उन्होंने पुणे के फिल्म और टेलीविजन संस्थान यानी FTII से भी प्रशिक्षण लिया। NSD और FTII दोनों से निकले ओम पुरी के अभिनय में मंच की गहराई और कैमरे की बारीक समझ दोनों दिखती थीं।

समानांतर सिनेमा का चेहरा

1976 में मराठी नाटक पर आधारित फिल्म घासीराम कोतवाल से उन्होंने फिल्मी करियर शुरू किया। 1980 में गोविंद निहलानी की फिल्म आक्रोश में आदिवासी लाहन्या भीकू की भूमिका में उन्होंने लगभग पूरी फिल्म बिना संवाद के सिर्फ आंखों और चेहरे से अभिनय किया। इसके बाद श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, केतन मेहता और सत्यजीत रे जैसे निर्देशकों के साथ उन्होंने काम किया।

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अर्ध सत्य

1983 में आई गोविंद निहलानी की अर्ध सत्य में ओम पुरी ने ईमानदार लेकिन व्यवस्था से हारते पुलिस इंस्पेक्टर अनंत वेलणकर का किरदार निभाया। यह फिल्म हिंदी सिनेमा में पुलिस के चित्रण के लिए मील का पत्थर मानी जाती है। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इससे पहले फिल्म आरोहण के लिए भी उन्हें यही पुरस्कार मिल चुका था।

कॉमेडी और मुख्यधारा

ओम पुरी ने गंभीर फिल्मों के साथ हल्की फुल्की फिल्मों में भी काम किया। 1983 की कल्ट कॉमेडी जाने भी दो यारो में उनका किरदार आहूजा आज भी याद किया जाता है। बाद में चाची 420 और मालामाल वीकली जैसी कॉमिक फिल्मों में भी वे दर्शकों के प्रिय रहे। 1988 में भीष्म साहनी के उपन्यास पर बने धारावाहिक तमस में भी उन्होंने यादगार अभिनय किया।

अंतरराष्ट्रीय सिनेमा

ओम पुरी उन गिने चुने भारतीय अभिनेताओं में थे, जिन्हें ब्रिटिश और हॉलीवुड सिनेमा में भी बड़ी पहचान मिली। रिचर्ड एटनबरो की गांधी में छोटी भूमिका के बाद उन्होंने सिटी ऑफ जॉय, माई सन द फैनेटिक, ईस्ट इज ईस्ट, चार्ली विल्सन्स वॉर और द हंड्रेड फुट जर्नी जैसी फिल्मों में काम किया। ईस्ट इज ईस्ट में पाकिस्तानी मूल के पिता जॉर्ज खान की भूमिका के लिए उन्हें बाफ्टा नामांकन मिला। ब्रिटिश सिनेमा में योगदान के लिए 2004 में उन्हें मानद OBE दिया गया।

सम्मान

  • सर्वश्रेष्ठ अभिनेता राष्ट्रीय पुरस्कार: आरोहण और अर्ध सत्य
  • पद्म श्री: 1990
  • मानद OBE: 2004
  • फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार

निधन

6 जनवरी 2017 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से ओम पुरी का निधन हो गया। उनकी कुछ फिल्में उनके निधन के बाद रिलीज हुईं। हिंदी, पंजाबी, मराठी, अंग्रेजी और कई अन्य भाषाओं में करीब चार दशक तक काम करने वाले ओम पुरी को भारतीय सिनेमा के सबसे सशक्त अभिनेताओं में गिना जाता है।

अभिनय की खासियत

ओम पुरी के अभिनय की सबसे बड़ी ताकत उनकी आंखें और आवाज थीं। आक्रोश में बिना बोले उन्होंने जो दर्द दिखाया, वह आज भी अभिनय के छात्रों को पढ़ाया जाता है। अर्ध सत्य में उनके भीतर उबलता गुस्सा हर दृश्य में महसूस होता है। वे किसी भी किरदार की बोली, चाल और हाव भाव को बहुत बारीकी से पकड़ते थे। चाहे गरीब किसान हो, पुलिस अफसर हो या ब्रिटेन में बसा प्रवासी पिता, वे हर रूप में विश्वसनीय लगते थे।

रंगमंच से जुड़ाव

फिल्मों में व्यस्त होने के बाद भी ओम पुरी का रंगमंच से रिश्ता बना रहा। उन्होंने मुंबई में मजमा नाम का थिएटर ग्रुप भी शुरू किया था। उनका मानना था कि मंच अभिनेता को अनुशासन और आत्मविश्वास देता है।

ओम पुरी की कुछ यादगार फिल्में

  • आक्रोश, 1980
  • आरोहण, 1982
  • अर्ध सत्य, 1983
  • जाने भी दो यारो, 1983
  • मिर्च मसाला, 1987
  • माचिस, 1996
  • ईस्ट इज ईस्ट, 1999
  • मकबूल, 2003
  • चार्ली विल्सन्स वॉर, 2007

ओम पुरी का जन्म कहां हुआ

18 अक्टूबर 1950 को हरियाणा के अंबाला में।

ओम पुरी को किन फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला

आरोहण और अर्ध सत्य।

अर्ध सत्य में उनका किरदार क्या था

इंस्पेक्टर अनंत वेलणकर।

ओम पुरी को OBE कब मिला

2004 में, मानद OBE।

स्रोत: Directorate of Film Festivals: National Film Awards, National School of Drama, FTII Pune

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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