India Rejects China Incursions: अरुणाचल प्रदेश में चीन के धीरे-धीरे कब्जे या घुसपैठ के दावों को भारत ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय और सरकारी सूत्रों ने साफ कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में उठे आरोपों को बिना सबूत के ध्यान खींचने की चाल बताया गया है। सूत्रों के अनुसार इस क्षेत्र में चीन ने कोई धीरे-धीरे घुसपैठ नहीं की है। भारत-चीन सीमा के कुछ हिस्से अभी तय नहीं हैं इसलिए पेट्रोलिंग दल कभी आमने-सामने आ सकते हैं लेकिन उन्हें मौजूदा सिस्टम और प्रोटोकॉल से संभाला जाता है।
India Rejects China Incursions: सरकारी सूत्रों ने खारिज किए घुसपैठ के आरोप
सरकारी सूत्रों ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया कि अरुणाचल प्रदेश में चीन की तरफ से कोई धीरे-धीरे घुसपैठ नहीं हुई है। आरोपों को सनसनीखेज और सबूत रहित करार दिया गया। सीमा के कुछ हिस्सों के अनसुलझे होने के कारण दोनों तरफ के पेट्रोलिंग दल कभी टकरा सकते हैं। ऐसे हालात को मौजूदा व्यवस्था और प्रोटोकॉल के जरिए सुलझाया जाता है। सूत्रों ने जोर दिया कि ये दावे केवल ध्यान आकर्षित करने के लिए फैलाए जा रहे हैं।
India Rejects China Incursions: सेना और आईटीबीपी की तैयारियां
भारतीय सेना और इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस सीमा पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। वे हर गतिविधि पर नजर रख रहे हैं और चीनी गतिविधियों को रोकने के लिए सजग हैं। सीमा पर निगरानी और पेट्रोलिंग की क्षमता हाल के वर्षों में बेहतर हुई है। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से सर्विलांस मजबूत हुई है। दोनों बल किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए सतर्क हैं।
चीन के लंबे समय से चले आ रहे दावे
चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश को साउथ तिब्बत कहकर अपना दावा करता रहा है। वह भारत की संप्रभुता को चुनौती देता आया है। 1960 की भारत-चीन सीमा वार्ता के दौरान चीन ने अरुणाचल में करीब 69 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा किया था। 1959 में चीन ने लोंगजू में असम राइफल्स की चौकी पर हमला कर कब्जा कर लिया था। तब से वह इलाका चीन के नियंत्रण में है और वहां इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की खबरें आती रहती हैं।
India Rejects China Incursions: 1962 के युद्ध की घटनाएं
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अरुणाचल प्रदेश में बड़े सैन्य ऑपरेशन हुए थे। चीनी सेना ने कामेंग, सुबनसिरी, सियोम, सियांग और लोहित घाटियों में कार्रवाई शुरू की थी। युद्धविराम के बाद पीएलए एलएसी के उत्तर में वापस चला गया। अरुणाचल ग्रेट हिमालयन रेंज के साथ तिब्बत से लंबी सीमा साझा करता है। ऐतिहासिक घटनाओं को ध्यान में रखते हुए भारत अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।
विदेश मंत्रालय का दो टूक रुख
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने फिर से पुष्टि की कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा सच है जो खुद साफ है। किसी दूसरे देश की कोई कार्रवाई इस पक्की सच्चाई को नहीं बदल सकती। जायसवाल ने दोहराया कि अरुणाचल भारत का अभिन्न अंग है और यह स्थिति अपरिवर्तनीय है। मंत्रालय का रुख साफ और दृढ़ है।
India Rejects China Incursions: 27 जगहों के आधिकारिक भारतीय नाम
भारत ने अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे पर उनके मानक भारतीय नामों के साथ दर्ज किया है। यह कदम चीन द्वारा जगहों को चीनी नाम देने की कोशिशों के जवाब में उठाया गया। इनमें लॉन्ग जू शामिल है जहां 1959 में टकराव हुआ था। थाग ला भी सूची में है जहां 1962 के युद्ध की शुरुआती झड़पें हुई थीं। जयरामपुर, जसवंत गढ़ और शेर-ए-थापा मेमोरियल भी शामिल हैं।
चीन की नाम बदलने की कोशिशें और भारत का जवाब
बीजिंग ने अरुणाचल की जगहों के लिए चीनी नामों की कई सूची जारी की हैं जिन्हें वह जांगनान कहता है। 2017 में छह नाम, 2021 में 15 नाम और 2023 में 11 अन्य नाम दिए गए। भारत ने इन्हें बार-बार काल्पनिक बताकर खारिज किया है। आधिकारिक भारतीय नामकरण से क्षेत्र की पहचान मजबूत हुई है। भारत अपनी संप्रभुता को स्पष्ट रूप से रेखांकित कर रहा है।
India Rejects China Incursions: सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर और निगरानी
हाल के वर्षों में भारत ने सीमावर्ती इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर जोर दिया है। इससे पेट्रोलिंग और सर्विलांस क्षमता बेहतर हुई है। संवेदनशील सीमा पर नजर रखना आसान हो गया है। सेना और आईटीबीपी की मौजूदगी मजबूत बनी हुई है। किसी भी गतिविधि पर तुरंत प्रतिक्रिया देने की व्यवस्था है।
अरुणाचल प्रदेश में चीन के धीरे-धीरे कब्जे या घुसपैठ के दावों को भारत ने खारिज कर दिया है। सरकारी सूत्रों और विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि अरुणाचल भारत का अभिन्न हिस्सा है। कोई घुसपैठ नहीं हुई है और पेट्रोलिंग संबंधी घटनाओं को प्रोटोकॉल से संभाला जाता है। सेना व आईटीबीपी सीमा पर तैयार हैं। चीन के ऐतिहासिक दावों और नाम बदलने की कोशिशों का जवाब भारत ने आधिकारिक नामकरण और मजबूत रुख से दिया है। 1962 और 1959 की घटनाओं का जिक्र करते हुए संप्रभुता पर जोर दिया गया।
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