Drishyam 3 Review: सस्पेंस-थ्रिलर फ्रैंचाइजी की आखिरी कड़ी दृश्यम 3 अब सिनेमाघरों में है। फिल्म 2 अक्टूबर 2026 को रिलीज हुई है। 2 अक्टूबर का राज तो हर दर्शक को पता है, लेकिन इस बार कहानी एक नई तारीख 23 जुलाई के इर्द-गिर्द घूमती है। सवाल यह है कि उस दिन विजय सलगांवकर कहां था और क्या पुलिस इस तारीख के सहारे उसकी बुनी पूरी कहानी पलट सकती है। मुकाबले में अजय देवगन के सामने जयदीप अहलावत हैं, जो पुलिस अधीक्षक राजवीर सिंह तोमर बने हैं। फिल्म कई बार लगता है कि विजय फंस गया, फिर वह चुप हो जाता है। रोमांच भरपूर है, पर हर चाल उतनी दमदार नहीं है और कहीं-कहीं कहानी आसान रास्ता पकड़ लेती है।
Drishyam 3 Review: 23 जुलाई की तारीख से शुरू होता है असली खेल
दृश्यम के प्रशंसकों के लिए 2 अक्टूबर का मतलब पाव भाजी, सत्संग, फिल्म और विजय सलगांवकर का वह खेल है, जिसने पुलिस को सालों उलझाए रखा। तीसरे हिस्से में कहानी सिर्फ उस तारीख पर नहीं टिकी है।
अब 23 जुलाई सामने है। फिल्म पूछती है कि उस दिन क्या हुआ था और क्या यह तारीख विजय की बनाई कहानी में सेंध लगा सकती है। यहीं से फिल्म अपनी असली बाजी शुरू करती है।
फिल्म की कहानी: दोबारा खुलता है पुराना केस
सलगांवकर परिवार अपनी पुरानी जिंदगी में लौटने की कोशिश कर रहा है। मगर सैम देशमुख की मौत का दर्द मीरा देशमुख के भीतर अब भी जिंदा है। मीरा और महेश देशमुख के लिए यह मामला कभी खत्म नहीं हुआ।
केस दोबारा खुलता है और पुलिस अधीक्षक राजवीर सिंह तोमर की एंट्री होती है। वह पुराने सबूतों को नए नजरिए से देखता है, जिससे विजय फिर पुलिस की नजर में आ जाता है। वकील इंद्रजीत शेट्टी भी इस खेल में उतरते हैं, जबकि इंस्पेक्टर गायतोंडे अपने पुराने अंदाज में केस को थोड़ा हल्का रखते हैं।
इसके बाद शुरू होती है विजय और राजवीर की दिमागी टक्कर। एक तरफ कानून है। दूसरी तरफ विजय, जो कानून की किताबें नहीं पढ़ता, पर उसे अपने हिसाब से घुमाना जानता है।
अजय देवगन और जयदीप अहलावत की टक्कर फिल्म की जान
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अजय देवगन और जयदीप अहलावत का आमना-सामना है। अजय का विजय अब सिर्फ किरदार नहीं रहा। चेहरे और आवाज में ज्यादा हलचल नहीं है, लेकिन उनकी आंखें बहुत कुछ कह जाती हैं। दर्शक सोचता रहता है कि वह इतना शांत क्यों है, और यही शांति रोमांच बढ़ाती है।
जयदीप अहलावत का राजवीर भी शांत है। वह धीरे-धीरे विजय के करीब पहुंचता है और यही उसका हथियार है। कुछ जगह फिल्म धीमी पड़ती है, पर दोनों के आमने-सामने आते ही रफ्तार लौट आती है।
सहायक कलाकारों का काम
प्रकाश राज वकील के किरदार में शानदार हैं। उनके संवाद और अंदाज कोर्ट के दृश्यों को मजबूत बनाते हैं। श्रेया सरन को इस बार पहले दोनों हिस्सों की तुलना में कम जगह मिली है, फिर भी उनके भावुक दृश्य असर छोड़ते हैं।
तब्बू और रजत कपूर बेटे को खोने का दर्द लेकर लौटे हैं। दोनों के किरदारों की बेचैनी साफ दिखती है। गायतोंडे गंभीर कहानी के बीच हंसी का मौका देते हैं। 2 अक्टूबर के मीम्स, पाव भाजी और पुलिसिया परेशानियों के साथ वह फिल्म का तनाव हल्का करते हैं।
निर्देशन: अभिषेक पाठक ने नहीं दोहराई पुरानी कहानी
निर्देशक अभिषेक पाठक की अच्छी बात यह है कि उन्होंने तीसरे हिस्से को पहले दो भागों की नकल नहीं बनाया। कहानी में नए सवाल जुड़े हैं, जिनमें 23 जुलाई वाली कड़ी सबसे दिलचस्प है। इससे पहले अभिषेक दृश्यम 2 और उजड़ा चमन का निर्देशन कर चुके हैं।
फिल्म जल्दी कहानी में उतरती है। किरदारों का परिचय देने में समय नहीं गंवाया गया, क्योंकि दर्शक विजय की दुनिया पहले से जानता है। लेकिन यही इसकी कमजोरी भी है। विजय और परिवार के बीच का भावनात्मक रिश्ता पहले दो हिस्सों में ज्यादा मजबूत था। इस बार रोमांच बढ़ा है, पर पारिवारिक भाव कुछ कम हुआ है।
स्क्रीनप्ले: सवाल खड़े करती है, पर कुछ मोड़ आसान
स्क्रीनप्ले की खूबी यह है कि फिल्म जवाब देने से ज्यादा नए सवाल खड़े करती है। 23 जुलाई क्या है, राजवीर के पास ऐसा क्या है जिससे विजय परेशान है, विजय इतना शांत क्यों है और क्या इस बार उसकी कोई चाल नहीं चलेगी। यही सवाल दर्शक को आगे ले जाते हैं।
इंटरवल के आसपास फिल्म अच्छी पकड़ बनाती है। दूसरे हिस्से में विजय की योजना सामने आने लगती है। हालांकि कुछ मोड़ ऐसे हैं, जहां लगता है कि यह इतनी आसानी से कैसे हो गया। पहले दो भागों में विजय की योजनाएं बेहद पुख्ता लगती थीं, जबकि इस बार कहीं-कहीं कहानी आगे बढ़ाने के लिए सरल रास्ता चुना गया है।
तकनीकी पक्ष और संगीत
गोवा इस बार भी कहानी का हिस्सा लगता है, सिर्फ खूबसूरत लोकेशन भर नहीं। कैमरे का काम रोमांच का माहौल बनाए रखता है और संपादन ज्यादातर जगह चुस्त है। ढाई घंटे की फिल्म बेवजह लंबी नहीं लगती, हालांकि बीच के कुछ दृश्य और छोटे किए जा सकते थे।
फिल्म में गानों की गुंजाइश कम रखी गई है, जो अच्छी बात है। अमर मोहिले का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म की बड़ी ताकत है। कई दृश्यों में पहले से अंदाजा होता है कि कुछ होने वाला है, फिर भी संगीत बेचैनी बढ़ा देता है। गाना मुस्कुरा दो भावनात्मक हिस्सों को सहारा देता है।
फाइनल वर्डिक्ट
दृश्यम 3 यानी द कॉन्क्लूजन में कई शानदार रोमांचक पल हैं, पर हर जगह पहले दोनों हिस्सों जैसा असर नहीं बन पाता। बीच में रफ्तार थोड़ी गिरती है और कुछ योजनाएं जरूरत से ज्यादा आसान लगती हैं।
इसके बावजूद 23 जुलाई का सवाल और विजय के दिमाग में चल रहा खेल इतना मजबूत है कि आखिरी मिनट तक नजर स्क्रीन से नहीं हटती। अजय देवगन और जयदीप अहलावत की टक्कर, गायतोंडे की हल्की-फुल्की मौजूदगी और अमर मोहिले का संगीत फिल्म को देखने लायक बनाते हैं।
अजय देवगन की फ्रैंचाइजी की आखिरी फिल्म दृश्यम 3 इस बार 2 अक्टूबर के बजाय 23 जुलाई के सवाल पर टिकी है। अजय देवगन और जयदीप अहलावत की दिमागी टक्कर फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है, जबकि प्रकाश राज, तब्बू और रजत कपूर का काम कहानी को मजबूती देता है। अभिषेक पाठक ने कहानी को पुरानी फिल्मों की नकल बनने से बचाया है। बीच की सुस्ती, कुछ आसान मोड़ और कमजोर पड़ा पारिवारिक भाव खलता है। फिर भी बैकग्राउंड म्यूजिक और नए सवालों के दम पर फिल्म अंत तक बांधे रखती है।
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