आज भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास यान उतार चुका है, मंगल तक पहुंच चुका है और दुनिया भर के उपग्रह अंतरिक्ष में भेजता है। इस सफर की नींव 1960 के दशक में एक ऐसे वैज्ञानिक ने रखी थी, जो मानते थे कि अंतरिक्ष तकनीक गरीब देश के आम लोगों की जिंदगी बदल सकती है। वे थे विक्रम साराभाई, जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। इस लेख में जानिए उनके जीवन, उनके बनाए संस्थानों और देश के विज्ञान पर उनके असर के बारे में।
जन्म और परिवार
विक्रम अंबालाल साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद के एक संपन्न उद्योगपति परिवार में हुआ। उनके पिता अंबालाल साराभाई कपड़ा उद्योग से जुड़े थे और परिवार स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं से गहरे जुड़ाव के लिए जाना जाता था। घर में महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर और जवाहरलाल नेहरू जैसे लोगों का आना जाना था। बचपन से ही विक्रम को विज्ञान और गणित में गहरी रुचि थी।

पढ़ाई और शोध
गुजरात कॉलेज में पढ़ाई के बाद वे इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वे भारत लौटे और बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में नोबेल विजेता सीवी रमन के साथ कॉस्मिक किरणों पर शोध किया। युद्ध के बाद वे फिर कैम्ब्रिज गए और कॉस्मिक किरणों पर शोध के लिए पीएचडी की उपाधि हासिल की।
भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला
1947 में भारत लौटने के बाद साराभाई ने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला यानी PRL की स्थापना की। इसमें उनके परिवार के ट्रस्ट और अहमदाबाद एजुकेशन सोसायटी की मदद मिली। PRL ने कॉस्मिक किरणों, वायुमंडल और अंतरिक्ष विज्ञान में शोध की मजबूत परंपरा शुरू की। आज यह संस्थान अंतरिक्ष विभाग के तहत काम करता है और ग्रहों के विज्ञान में भी अहम योगदान देता है।
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अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव
1957 में सोवियत संघ के स्पुतनिक उपग्रह के बाद साराभाई ने सरकार को समझाया कि भारत जैसे देश के लिए अंतरिक्ष तकनीक जरूरी है। उनका तर्क था कि उपग्रहों से संचार, मौसम की जानकारी, शिक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के सर्वे में बड़ी मदद मिल सकती है। 1962 में होमी भाभा के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति यानी INCOSPAR बनी, जिसके अध्यक्ष साराभाई थे।
थुंबा से पहला रॉकेट
रॉकेट लॉन्च के लिए केरल में तिरुवनंतपुरम के पास थुंबा गांव चुना गया, क्योंकि यह पृथ्वी की चुंबकीय भूमध्य रेखा के करीब है। यहां एक चर्च और पादरी के घर को प्रयोगशाला और दफ्तर बनाया गया। 21 नवंबर 1963 को थुंबा से अमेरिका में बना नाइकी अपाचे साउंडिंग रॉकेट छोड़ा गया। उस दौर की तस्वीरों में वैज्ञानिक रॉकेट के पुर्जे साइकिल और बैलगाड़ी पर ढोते दिखते हैं। एपीजे अब्दुल कलाम भी इस शुरुआती टीम का हिस्सा थे। आज इसी जगह पर विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र है।
इसरो की स्थापना
15 अगस्त 1969 को INCOSPAR की जगह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो बना। साराभाई इसके पहले अध्यक्ष थे। उन्होंने भारत का अपना उपग्रह बनाने और उसे अपने रॉकेट से छोड़ने का लक्ष्य रखा। उनकी पहल पर भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट पर काम शुरू हुआ, जिसे 1975 में, उनके निधन के बाद, सोवियत संघ की मदद से छोड़ा गया। उन्होंने उपग्रह से गांवों में शिक्षा पहुंचाने के प्रयोग SITE की योजना भी बनाई, जो 1975 और 1976 में चलाया गया।
परमाणु ऊर्जा आयोग की जिम्मेदारी
1966 में होमी भाभा के विमान हादसे में निधन के बाद साराभाई को परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष भी बनाया गया। इस तरह वे एक साथ परमाणु और अंतरिक्ष दोनों कार्यक्रमों की अगुवाई कर रहे थे। उन्होंने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर जोर दिया।
विज्ञान से आगे
साराभाई की रुचि सिर्फ विज्ञान तक सीमित नहीं थी। भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद यानी IIM अहमदाबाद की स्थापना में उनकी अहम भूमिका रही। उन्होंने अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्री रिसर्च एसोसिएशन यानी ATIRA, सामुदायिक विज्ञान केंद्र और दर्पण एकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स जैसे संस्थानों को बनाने और बढ़ाने में मदद की। दर्पण की स्थापना उनकी पत्नी, प्रसिद्ध नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई ने की थी। उनकी बेटी मल्लिका साराभाई भी जानी मानी नृत्यांगना हैं।
असमय निधन और सम्मान
30 दिसंबर 1971 को केरल के कोवलम में नींद में ही उनका निधन हो गया। वे सिर्फ 52 साल के थे। भारत सरकार ने उन्हें 1966 में पद्म भूषण और 1972 में मरणोपरांत पद्म विभूषण दिया। चंद्रमा पर एक क्रेटर का नाम उनके नाम पर है। चंद्रयान 2 और चंद्रयान 3 के लैंडर का नाम भी विक्रम रखा गया।
विक्रम साराभाई का जन्म कब हुआ
12 अगस्त 1919 को, अहमदाबाद में।
भारत का पहला रॉकेट कब छोड़ा गया
21 नवंबर 1963 को, थुंबा से।
इसरो की स्थापना कब हुई
15 अगस्त 1969 को।
साराभाई का निधन कब हुआ
30 दिसंबर 1971 को, कोवलम में।
स्रोत: ISRO: Dr. Vikram Ambalal Sarabhai, Physical Research Laboratory, Vikram Sarabhai Space Centre






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