दुनिया के समुद्री व्यापार में कुछ रास्ते ऐसे हैं जिन पर जरा सी रुकावट पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को हिला देती है। मिस्र की स्वेज नहर उन्हीं में सबसे अहम है। यह नहर भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है, जिससे एशिया और यूरोप के बीच चलने वाले जहाजों को पूरे अफ्रीका का चक्कर नहीं लगाना पड़ता। इस लेख में जानिए स्वेज नहर का इतिहास, इससे जुड़े बड़े संकट और भारत के लिए इसका महत्व।
नहर कहां है
स्वेज नहर मिस्र में है और उत्तर में पोर्ट सईद से दक्षिण में स्वेज शहर तक जाती है। इसकी लंबाई करीब 193 किलोमीटर है। यह नहर अफ्रीका और एशिया महाद्वीपों के बीच की सीमा भी मानी जाती है, क्योंकि इसके पूर्व में सिनाई प्रायद्वीप है, जो एशिया का हिस्सा है। नहर में ताले यानी लॉक नहीं हैं, क्योंकि दोनों समुद्रों के पानी का स्तर लगभग बराबर है।

कैसे बनी नहर
भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ने की कोशिशें प्राचीन मिस्र के समय से होती रही थीं। आधुनिक स्वेज नहर का निर्माण फ्रांस के राजनयिक फर्डिनेंड डी लेसेप्स की पहल पर हुआ। 1859 में काम शुरू हुआ और करीब दस साल बाद 17 नवंबर 1869 को नहर खोली गई। निर्माण में बड़ी संख्या में मिस्र के मजदूरों ने कठिन हालात में काम किया और हजारों की जान गई।
ब्रिटेन का दखल
नहर बनाने वाली कंपनी में शुरुआत में फ्रांस और मिस्र के शेयर थे। 1875 में आर्थिक संकट में फंसे मिस्र के शासक ने अपने शेयर ब्रिटेन को बेच दिए। ब्रिटेन के लिए यह नहर भारत तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता थी, इसलिए उसने इस पर अपना असर बढ़ाया। बाद में मिस्र पर भी ब्रिटेन का नियंत्रण बढ़ता गया।
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1956 का स्वेज संकट
26 जुलाई 1956 को मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसके जवाब में ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल ने मिस्र पर सैन्य कार्रवाई की। अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने इसका विरोध किया और संयुक्त राष्ट्र के दबाव में तीनों देशों को पीछे हटना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार आपात शांति सेना तैनात की, जिसमें भारत के सैनिक भी शामिल थे। इस संकट को ब्रिटेन और फ्रांस के औपनिवेशिक दबदबे के कमजोर होने का प्रतीक माना जाता है।
1967 से 1975 तक बंद
1967 के अरब इजराइल युद्ध के बाद स्वेज नहर करीब आठ साल तक बंद रही। इस दौरान कई जहाज नहर में फंसे रह गए। 1975 में नहर फिर से खोली गई। इस बंदी ने दुनिया को दिखाया कि इस रास्ते के बिना व्यापार कितना महंगा और लंबा हो जाता है।
नई स्वेज नहर
2015 में मिस्र ने नहर के एक हिस्से के समानांतर नई लेन बनाई, जिसे नई स्वेज नहर कहा गया। इससे दोनों दिशाओं में जहाजों का एक साथ आना जाना आसान हुआ और इंतजार का समय घटा। नहर से मिलने वाला शुल्क मिस्र की विदेशी कमाई का बड़ा स्रोत है।
एवर गिवेन का जाम
मार्च 2021 में विशाल मालवाहक जहाज एवर गिवेन तेज हवाओं के बीच नहर में तिरछा होकर फंस गया। करीब छह दिन तक नहर बंद रही और सैकड़ों जहाज दोनों तरफ इंतजार करते रहे। इस घटना ने दुनिया भर में सामान की सप्लाई और माल ढुलाई के किराए पर असर डाला।
लाल सागर का संकट
हाल के वर्षों में लाल सागर और बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य के पास जहाजों पर हमलों के कारण कई शिपिंग कंपनियों ने स्वेज का रास्ता छोड़ कर अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप वाला लंबा रास्ता चुना। इससे सफर का समय और खर्च दोनों बढ़े और स्वेज नहर की कमाई पर भी असर पड़ा।
भारत के लिए महत्व
भारत का यूरोप, उत्तर अफ्रीका और अमेरिका के पूर्वी तट से होने वाला बड़ा समुद्री व्यापार स्वेज नहर से होकर गुजरता है। कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, कपड़ा, दवाइयां और इंजीनियरिंग सामान जैसी चीजें इसी रास्ते से जाती आती हैं। नहर में कोई रुकावट आने पर भारतीय निर्यातकों का माल ढुलाई खर्च और समय दोनों बढ़ जाते हैं।
नहर से गुजरने के नियम
स्वेज नहर से जहाज काफिलों में गुजरते हैं और हर जहाज पर नहर प्राधिकरण का पायलट मौजूद रहता है, जो जहाज को सुरक्षित रास्ता दिखाता है। नहर पार करने में आम तौर पर कई घंटे लगते हैं। जहाज के आकार और माल के हिसाब से शुल्क तय होता है। नहर का संचालन मिस्र की स्वेज नहर प्राधिकरण करती है।
स्वेज नहर कब खुली
17 नवंबर 1869 को।
स्वेज नहर किन समुद्रों को जोड़ती है
भूमध्य सागर और लाल सागर को।
स्वेज संकट कब हुआ
1956 में, नहर के राष्ट्रीयकरण के बाद।
स्रोत: Suez Canal Authority, Britannica: Suez Canal, UNCTAD: Maritime transport






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