धरती के ऊपर वायुमंडल में एक पतली सी परत है, जो सूरज से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों के बड़े हिस्से को रोक लेती है। इसे ओजोन परत कहते हैं। अगर यह परत न हो, तो त्वचा के कैंसर, मोतियाबिंद, फसलों के नुकसान और समुद्री जीवन पर बुरा असर बढ़ सकता है। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि इंसानों की बनाई कुछ गैसें इस परत को पतला कर रही हैं और अंटार्कटिका के ऊपर एक बड़ा ओजोन छेद बन गया है। इसके बाद दुनिया के देशों ने मिलकर जो कदम उठाए, उन्हें आज पर्यावरण की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय सफलताओं में गिना जाता है। इस लेख में जानिए ओजोन परत, ओजोन छेद और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की पूरी कहानी।
ओजोन क्या है
ओजोन ऑक्सीजन का ही एक रूप है। सामान्य ऑक्सीजन के अणु में दो परमाणु होते हैं, जबकि ओजोन में तीन। वायुमंडल की ज्यादातर ओजोन समताप मंडल यानी स्ट्रेटोस्फियर में पाई जाती है, जो धरती से लगभग 15 से 35 किलोमीटर की ऊंचाई पर है। यहां ओजोन पराबैंगनी किरणों को सोख लेती है। ध्यान रहे कि जमीन के पास बनने वाली ओजोन प्रदूषण का हिस्सा है और सांस के लिए नुकसानदेह है। अच्छी ओजोन ऊपर है, बुरी ओजोन नीचे।

ओजोन छेद की खोज
1985 में ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के वैज्ञानिक जोसेफ फारमन और उनके साथियों ने बताया कि अंटार्कटिका के ऊपर हर साल वसंत के समय ओजोन की मात्रा बहुत घट जाती है। बाद में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के उपग्रह आंकड़ों ने भी इसकी पुष्टि की। इसे ओजोन छेद कहा गया, हालांकि यह असल में पूरा छेद नहीं, बल्कि ओजोन के बहुत पतले होने का इलाका है। यह हर साल अगस्त से अक्टूबर के बीच सबसे बड़ा होता है।
कौन सी गैसें जिम्मेदार
वैज्ञानिक मारियो मोलिना और शेरवुड रोलैंड ने 1974 में ही चेतावनी दी थी कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी CFC गैसें ओजोन को नष्ट कर सकती हैं। CFC का इस्तेमाल फ्रिज, एयर कंडीशनर, स्प्रे कैन और फोम बनाने में होता था। ये गैसें ऊपर जाकर पराबैंगनी किरणों से टूटती हैं और क्लोरीन छोड़ती हैं, जो ओजोन के हजारों अणुओं को नष्ट कर सकती है। हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड और मिथाइल ब्रोमाइड जैसी गैसें भी इसमें शामिल हैं। मोलिना, रोलैंड और पॉल क्रुट्जन को 1995 में इस काम के लिए रसायन का नोबेल पुरस्कार मिला।
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वियना कन्वेंशन और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
1985 में ओजोन परत की सुरक्षा के लिए वियना कन्वेंशन बना, जिसमें देशों ने शोध और सहयोग पर सहमति जताई। इसके बाद 16 सितंबर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों का उत्पादन और इस्तेमाल चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का फैसला हुआ। संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों ने इसे मंजूर किया है, जो किसी भी संधि के लिए बड़ी बात है। 16 सितंबर को हर साल विश्व ओजोन दिवस मनाया जाता है।
विकासशील देशों को मदद
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में विकासशील देशों को ज्यादा समय और आर्थिक मदद देने का प्रावधान किया गया। इसके लिए एक बहुपक्षीय कोष बनाया गया, जिससे इन देशों में उद्योगों को नई तकनीक अपनाने में मदद मिली। भारत 1992 में इस प्रोटोकॉल में शामिल हुआ। भारत में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का ओजोन सेल इसके पालन की निगरानी करता है। भारत ने तय समय पर CFC और कई दूसरी गैसों का उत्पादन बंद किया।
किगाली संशोधन
CFC की जगह इस्तेमाल होने लगी HFC गैसें ओजोन को नुकसान नहीं पहुंचातीं, लेकिन ये ताकतवर ग्रीनहाउस गैसें हैं और धरती को गर्म करती हैं। इसलिए 2016 में रवांडा की राजधानी किगाली में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधन कर HFC को भी धीरे धीरे घटाने पर सहमति बनी। भारत ने 2021 में किगाली संशोधन को मंजूरी दी। वैज्ञानिक मानते हैं कि इससे इस सदी के अंत तक धरती के तापमान में होने वाली बढ़ोतरी को कुछ हद तक रोका जा सकता है।
ओजोन परत कब भरेगी
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और विश्व मौसम विज्ञान संगठन के वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, अगर मौजूदा नीतियां जारी रहीं तो ओजोन परत अंटार्कटिका के ऊपर करीब 2066 तक, आर्कटिक के ऊपर करीब 2045 तक और बाकी दुनिया में करीब 2040 तक 1980 के स्तर पर लौट सकती है। हालांकि ज्वालामुखी विस्फोट और मौसम में बदलाव से हर साल ओजोन छेद का आकार थोड़ा बदलता रहता है।
हम क्या कर सकते हैं
पुराने फ्रिज और एसी को कबाड़ में फेंकने के बजाय अधिकृत रीसाइक्लर को दें, ताकि उनकी गैस ठीक से निकाली जा सके। एसी की सर्विसिंग प्रशिक्षित मैकेनिक से कराएं और गैस लीक की जांच कराएं। ऊर्जा बचाने वाले उपकरण चुनें। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल बताता है कि विज्ञान की बात सुनकर दुनिया मिलकर काम करे तो बड़ी पर्यावरण समस्याएं भी सुलझ सकती हैं।
ओजोन परत कहां है
धरती से करीब 15 से 35 किलोमीटर ऊपर समताप मंडल में।
ओजोन छेद की खोज कब हुई
1985 में।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल कब हुआ
16 सितंबर 1987 को।
विश्व ओजोन दिवस कब है
16 सितंबर को।
स्रोत: UNEP Ozone Secretariat, NASA Ozone Watch, MoEFCC Ozone Cell





