इजरायल में हुए संसदीय चुनावों के शुरुआती नतीजों ने देश में एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि किसी भी गुट को सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गुट को 120 सदस्यीय संसद में केवल 53 सीटें प्राप्त हुई हैं, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइजनकोट के गुट को 48 सीटें मिली हैं। इस चुनाव में अरब पार्टियों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 19 सीटें जीती हैं, जो भविष्य की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में मतदाताओं का स्पष्ट बंटवारा देखा गया है, जहां यरुशलम और दक्षिणी जिलों में नेतन्याहू का दबदबा रहा, वहीं तेल अवीव और मध्य जिलों में विपक्ष को बढ़त मिली है।

नेतन्याहू के गुट और लिकुड पार्टी का प्रदर्शन
इजरायल की 120 सीटों वाली संसद, जिसे नेसेट कहा जाता है, के शुरुआती चुनावी नतीजों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को अब तक केवल 53 सीटें मिली हैं, जो बहुमत के आंकड़े 61 से काफी दूर है। उनकी अपनी पार्टी, लिकुड, 27 सीटों के साथ संसद में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है, लेकिन यह 2022 के चुनावों में मिली 32 सीटों के मुकाबले पांच सीटों की गिरावट को दर्शाता है। हालांकि लिकुड सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है, लेकिन नेतन्याहू के लिए अपने सहयोगियों के साथ मिलकर बहुमत जुटाना एक कठिन कार्य साबित हो रहा है। आधिकारिक नतीजों की घोषणा 4 नवंबर को होने की उम्मीद है, लेकिन वर्तमान रुझान एक त्रिशंकु संसद की ओर इशारा कर रहे हैं।
विपक्ष और अरब पार्टियों की स्थिति
पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट ने इस चुनाव में 48 सीटें हासिल की हैं। इस चुनाव की सबसे बड़ी खबर अरब पार्टियों का शानदार प्रदर्शन रहा है, जिन्होंने कुल मिलाकर 19 सीटें जीती हैं। इनमें जॉइंट लिस्ट को 11 और रआम पार्टी को 8 सीटें मिली हैं। यह आंकड़ा 2022 के चुनावों की तुलना में लगभग दोगुना है, जब इन पार्टियों के पास केवल 10 सीटें थीं। इस बार मतदाताओं में भारी उत्साह देखा गया और मतदान का प्रतिशत 78 तक पहुंच गया, जो पिछली बार के 71 प्रतिशत से अधिक है। अरब पार्टियों की यह बढ़त उन्हें किंगमेकर की भूमिका में ला सकती है, हालांकि उनके साथ गठबंधन को लेकर प्रमुख गुटों के बीच वैचारिक मतभेद बने हुए हैं।
क्षेत्रीय मतदान और वैचारिक विभाजन
चुनाव के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर देश में गहरा क्षेत्रीय और वैचारिक विभाजन दिखाई देता है। यरुशलम जिले में नेतन्याहू के गुट को 67.5 प्रतिशत वोट मिले, जबकि दक्षिणी जिले में उन्हें 51.2 प्रतिशत समर्थन प्राप्त हुआ। इसके विपरीत, तेल अवीव जिले में विपक्षी गुट 56.2 प्रतिशत वोटों के साथ आगे रहा। मध्य और हाइफा जिलों में भी विपक्ष का दबदबा देखा गया। उत्तरी जिले में अरब पार्टियों ने 45.6 प्रतिशत वोट हासिल किए। वेस्ट बैंक की इजरायली बस्तियों में नेतन्याहू के गुट को भारी समर्थन मिला, जहां हर पांच में से चार वोट उनके पक्ष में गए। वहीं, कुछ छोटी पार्टियां 3.25 प्रतिशत की न्यूनतम सीमा पार करने में विफल रहीं, जिनमें योआज हेंडेल की रिजर्विस्ट्स: इकोनॉमिक पार्टी शामिल है जिसे केवल 2.72 प्रतिशत वोट मिले।
सरकार गठन के संभावित रास्ते और चुनौतियां
इजरायल में सरकार बनाने के लिए अब तीन मुख्य रास्ते दिखाई दे रहे हैं। पहला विकल्प एक यहूदी: अरब गठबंधन का है, जहां आइजनकोट का गुट और अरब पार्टियां मिलकर 67 सीटें बना सकती हैं। हालांकि, इसके लिए अरब पार्टियों को हमास को एक आतंकी संगठन मानने और उसके निरस्त्रीकरण का समर्थन करने जैसी कड़ी शर्तें माननी होंगी। दूसरा विकल्प एक एकता सरकार का है, जिसमें लिकुड और अन्य प्रमुख पार्टियां मिलकर 67 सीटें जुटा सकती हैं, लेकिन आइजनकोट ने नेतन्याहू को हटाने के वादे पर चुनाव लड़ा है। तीसरा विकल्प दलबदल का है, जहां नेतन्याहू को बहुमत के लिए 8 और सांसदों की आवश्यकता होगी। अब राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग सभी दलों से मिलेंगे और किसी एक नेता को सरकार बनाने का निमंत्रण देंगे, जिसके पास 28 दिन का समय होगा।
उत्तर प्रदेश एमएलसी चुनाव और अखिलेश यादव का हमला
भारत में, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश एमएलसी चुनाव के नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला किया है। अखिलेश यादव ने दावा किया कि भाजपा केवल 5 सीटें नहीं हारी है, बल्कि उसे 50 जिलों में हार का सामना करना पड़ा है। उन्होंने वाराणसी स्नातक सीट पर सपा के आशुतोष सिन्हा की जीत और आकाश अग्रवाल के निर्वाचन को बड़ी उपलब्धि बताया। अखिलेश ने भाजपा के डबल इंजन सरकार के नारे पर तंज कसते हुए इसे डबल जीरो करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने 6 सीटें छल से जीती हैं और अगर बेईमानी नहीं होती, तो वे इतनी सीटें भी नहीं जीत पाते।
सरकारी नीतियों और चुनावी प्रणाली पर सवाल
अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भाजपा सरकार की नीतियों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सरकार 27 हजार स्कूल बंद कर रही है और उसी संख्या में शराब के ठेके खुलवा रही है। उन्होंने अमित शाह के उत्तर प्रदेश दौरे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भाजपा के अंदर की फूट अब और उजागर होगी। अखिलेश ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और वोटर लिस्ट की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट में तस्वीरें पहचानना मुश्किल है और उन्होंने मांग की कि भविष्य में चुनाव आधार कार्ड, मेटल कार्ड या बायोमेट्रिक पहचान के आधार पर होने चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि वह 1 नवंबर को विपक्ष की रैली में शामिल होंगे और जनता भाजपा की कार्यशैली को समझ चुकी है।





