भारत सरकार के गजट, आकाशवाणी के समाचार और कई सरकारी कैलेंडरों में ग्रेगोरियन तारीख के साथ एक और तारीख लिखी होती है, जैसे 9 कार्तिक 1948। यह तारीख भारत के राष्ट्रीय पंचांग से आती है, जो शक संवत पर आधारित है। बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत का अपना एक आधिकारिक कैलेंडर है, जिसे आजादी के बाद वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया था। इस लेख में जानिए शक संवत क्या है, राष्ट्रीय पंचांग कैसे बना और इसकी तारीखें कैसे निकाली जाती हैं।
शक संवत की शुरुआत
शक संवत की गणना 78 ईस्वी से की जाती है। इतिहासकार इसे आमतौर पर कुषाण शासक कनिष्क या शक शासकों से जोड़ते हैं, हालांकि इसकी शुरुआत को लेकर विद्वानों में अलग अलग राय है। प्राचीन भारत के कई खगोलशास्त्रियों ने अपनी गणनाओं में शक संवत का इस्तेमाल किया। वराहमिहिर और बाद के कई ज्योतिष ग्रंथों में इसके उदाहरण मिलते हैं। दक्षिण भारत और पश्चिम भारत के कई अभिलेखों में भी शक संवत की तारीखें लिखी हैं।

आजादी के बाद कैलेंडर की समस्या
आजादी के समय भारत में अलग अलग इलाकों में 30 से ज्यादा पंचांग चल रहे थे। हर क्षेत्र के त्योहार और नए साल अलग तारीखों पर पड़ते थे। सरकारी कामकाज के लिए एक समान भारतीय कैलेंडर की जरूरत महसूस की गई। इसलिए 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी CSIR के तहत कैलेंडर सुधार समिति बनाई गई, जिसके अध्यक्ष प्रसिद्ध खगोल भौतिकविद मेघनाद साहा थे।
समिति की सिफारिश
समिति ने देश भर के पंचांगों का अध्ययन किया और 1955 में अपनी रिपोर्ट दी। इसकी सिफारिश पर शक संवत पर आधारित एक सौर कैलेंडर तैयार किया गया, जिसके महीनों की लंबाई तय कर दी गई ताकि यह ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ स्थिर रूप से चल सके। सरकार ने इसे 22 मार्च 1957 से आधिकारिक रूप से अपनाया, जो शक संवत 1879 की चैत्र 1 तारीख थी।
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महीने और दिन
राष्ट्रीय पंचांग में 12 महीने हैं, जिनके नाम पारंपरिक हिंदू महीनों पर रखे गए हैं।
- चैत्र: 30 दिन, लीप वर्ष में 31 दिन
- वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण और भाद्र: 31 31 दिन
- आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ और फाल्गुन: 30 30 दिन
इस तरह सामान्य वर्ष में 365 और लीप वर्ष में 366 दिन होते हैं।
ग्रेगोरियन तारीख से मिलान
सामान्य वर्ष में चैत्र 1 तारीख 22 मार्च को पड़ती है, जबकि ग्रेगोरियन लीप वर्ष में यह 21 मार्च को आती है। शक वर्ष निकालने के लिए 22 मार्च के बाद की तारीखों में ग्रेगोरियन वर्ष से 78 घटाते हैं, और 1 जनवरी से 21 मार्च के बीच 79 घटाते हैं। उदाहरण के लिए 31 अक्टूबर 2026 शक संवत 1948 में पड़ता है। लीप वर्ष का नियम भी ग्रेगोरियन कैलेंडर जैसा ही है, यानी जिस शक वर्ष में 78 जोड़ने पर ग्रेगोरियन लीप वर्ष बनता है, वही शक लीप वर्ष होता है।
कहां इस्तेमाल होता है
भारत के राजपत्र, आकाशवाणी के समाचार प्रसारण, भारत सरकार के कैलेंडर और सरकारी सूचनाओं में ग्रेगोरियन तारीख के साथ राष्ट्रीय पंचांग की तारीख भी दी जाती है। इसे भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों की सूची में भी शामिल किया गया है, जैसे राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय चिह्न। फिर भी आम जीवन में इसका इस्तेमाल कम ही होता है।
पारंपरिक पंचांग से अंतर
धार्मिक त्योहार जिन पारंपरिक पंचांगों से तय होते हैं, वे चंद्र सौर होते हैं, यानी उनमें तिथि चंद्रमा की चाल से तय होती है और बीच बीच में अधिक मास जोड़ा जाता है। राष्ट्रीय पंचांग पूरी तरह सौर है और इसके महीने निश्चित दिनों के होते हैं। इसलिए दीपावली या होली जैसी तिथियां इस कैलेंडर में हर साल अलग तारीख पर पड़ती हैं। धार्मिक कामों के लिए लोग अब भी पारंपरिक पंचांग देखते हैं।
खगोलीय पंचांग का प्रकाशन
भारत मौसम विज्ञान विभाग के तहत कोलकाता में पोजिशनल एस्ट्रोनॉमी सेंटर हर साल राष्ट्रीय पंचांग और भारतीय खगोलीय पंचांग प्रकाशित करता है। इसमें सूर्य और चंद्रमा की स्थिति, ग्रहण और त्योहारों से जुड़ी खगोलीय जानकारी होती है। यह केंद्र मेघनाद साहा समिति की सिफारिशों से ही जुड़ा हुआ है।
दूसरे भारतीय संवत
भारत में शक संवत के अलावा भी कई संवत चलते हैं। उत्तर भारत में विक्रम संवत सबसे ज्यादा प्रचलित है, जिसकी गणना 57 ईसा पूर्व से की जाती है। इसका नया साल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। बंगाल में बंगाब्द, केरल में कोल्लम संवत और कई इलाकों में कलियुग संवत का भी इस्तेमाल होता है। इन सबके बीच शक संवत को राष्ट्रीय पंचांग का आधार इसलिए बनाया गया क्योंकि यह खगोलीय गणनाओं में लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा था और पूरे देश में इसे जाना जाता था।
मेघनाद साहा का योगदान
मेघनाद साहा को उनके थर्मल आयनीकरण समीकरण के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, जिसने तारों के वर्णक्रम को समझने में मदद की। विज्ञान के साथ वे देश के विकास से जुड़े कामों में भी सक्रिय थे। वे 1952 में लोकसभा सांसद भी चुने गए। कैलेंडर सुधार समिति की उनकी रिपोर्ट को भारतीय पंचांगों पर सबसे गहन अध्ययनों में से एक माना जाता है। समिति ने धार्मिक पंचांगों के लिए भी एक समान खगोलीय गणना की सिफारिश की थी।
राष्ट्रीय पंचांग की तारीख कैसे पढ़ें
अगर किसी सरकारी अधिसूचना में 9 कार्तिक 1948 लिखा हो, तो इसका मतलब है शक संवत 1948 के कार्तिक महीने की 9 तारीख। सामान्य वर्ष में कार्तिक 23 अक्टूबर से शुरू होता है, इसलिए यह तारीख 31 अक्टूबर 2026 होगी। इसी तरह चैत्र 1 को भारत के राष्ट्रीय पंचांग का नया साल माना जाता है।
शक संवत कब से गिना जाता है
78 ईस्वी से।
राष्ट्रीय पंचांग कब अपनाया गया
22 मार्च 1957 को।
कैलेंडर सुधार समिति के अध्यक्ष कौन थे
मेघनाद साहा।
राष्ट्रीय पंचांग का पहला महीना कौन सा है
चैत्र।
स्रोत: भारत का राष्ट्रीय पोर्टल: राष्ट्रीय पंचांग, Positional Astronomy Centre, IMD, CSIR





