किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, आवारा हूं, मेरा जूता है जापानी, सजन रे झूठ मत बोलो और होठों पे सच्चाई रहती है। ये गीत दशकों बाद भी उतने ही ताजा लगते हैं। इन्हें लिखने वाले शैलेंद्र हिंदी सिनेमा के उन गीतकारों में थे, जिन्होंने बहुत सरल शब्दों में जीवन की गहरी बातें कहीं। रेलवे वर्कशॉप में काम करने वाला यह कवि राज कपूर की टीम का अहम हिस्सा बना और फिर एक फिल्म के निर्माण ने उसे भीतर तक तोड़ दिया। इस लेख में जानिए शैलेंद्र के जीवन और गीतों की कहानी।
जन्म और संघर्ष
शैलेंद्र का असली नाम शंकरदास केसरीलाल था। उनका जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। उनका परिवार मूल रूप से बिहार से जुड़ा था और बाद में उत्तर प्रदेश के मथुरा में रहा। आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई के बाद उन्होंने बंबई के माटुंगा में रेलवे वर्कशॉप में नौकरी की। काम के साथ वे कविताएं लिखते रहे और भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से जुड़ गए। उनकी कविताओं में मजदूरों और आम आदमी के दुख दर्द की बात होती थी।

राज कपूर से मुलाकात
एक मुशायरे में राज कपूर ने शैलेंद्र को अपनी कविता जलता है पंजाब पढ़ते सुना और उनसे अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने को कहा। शैलेंद्र ने पहले मना कर दिया, क्योंकि वे अपनी कविता को फिल्मों के लिए बेचना नहीं चाहते थे। बाद में पैसों की जरूरत पड़ने पर वे राज कपूर के पास गए। 1949 की फिल्म बरसात के लिए उन्होंने गीत लिखे, जिनमें बरसात में हमसे मिले तुम सजन बहुत मशहूर हुआ।
शंकर जयकिशन और हसरत के साथ
इसके बाद शैलेंद्र राज कपूर की टीम का स्थायी हिस्सा बन गए। संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन, गीतकार हसरत जयपुरी, गायक मुकेश और राज कपूर के साथ मिलकर उन्होंने आवारा, श्री 420, चोरी चोरी, अनाड़ी और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फिल्मों के अमर गीत रचे। आवारा हूं और मेरा जूता है जापानी जैसे गीत भारत के बाहर, खासकर सोवियत संघ में भी बहुत लोकप्रिय हुए।
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दूसरे संगीतकारों के साथ
शैलेंद्र ने एसडी बर्मन, सलिल चौधरी और दूसरे संगीतकारों के साथ भी यादगार गीत लिखे। गाइड के गीत आज फिर जीने की तमन्ना है, पिया तोसे नैना लागे रे और वहां कौन है तेरा उन्हीं की कलम से निकले। मधुमती के सुहाना सफर और ये मौसम हसीं और दो बीघा जमीन के गीत भी उनके लिखे माने जाते हैं।
फिल्मफेयर पुरस्कार
शैलेंद्र को तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
- ये मेरा दीवानापन है, फिल्म यहूदी
- सब कुछ सीखा हमने, फिल्म अनाड़ी
- मैं गाऊं तुम सो जाओ, फिल्म ब्रह्मचारी, जो उनके निधन के बाद मिला
तीसरी कसम
शैलेंद्र ने फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर फिल्म बनाने का सपना देखा। बासु भट्टाचार्य के निर्देशन में बनी तीसरी कसम में राज कपूर ने गाड़ीवान हीरामन और वहीदा रहमान ने नौटंकी कलाकार हीराबाई की भूमिका निभाई। सजन रे झूठ मत बोलो, दुनिया बनाने वाले और चलत मुसाफिर मोह लियो रे जैसे गीत इसी फिल्म के हैं। फिल्म बनने में कई साल लगे और इसमें शैलेंद्र की सारी जमा पूंजी लग गई। 1966 में रिलीज होने पर यह व्यावसायिक रूप से नहीं चली।
निधन और सम्मान
फिल्म की असफलता, कर्ज और मानसिक तनाव ने शैलेंद्र की सेहत पर बुरा असर डाला। 14 दिसंबर 1966 को केवल 43 साल की उम्र में मुंबई में उनका निधन हो गया। संयोग से उसी दिन राज कपूर का जन्मदिन था। बाद में तीसरी कसम को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और आज इसे हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में गिना जाता है।
शैलेंद्र के कुछ यादगार गीत
- आवारा हूं, फिल्म आवारा
- मेरा जूता है जापानी, फिल्म श्री 420
- प्यार हुआ इकरार हुआ, फिल्म श्री 420
- किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, फिल्म अनाड़ी
- होठों पे सच्चाई रहती है, फिल्म जिस देश में गंगा बहती है
- आज फिर जीने की तमन्ना है, फिल्म गाइड
- सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, फिल्म मधुमती
- सजन रे झूठ मत बोलो, फिल्म तीसरी कसम
लेखन की खासियत
शैलेंद्र के गीतों की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी थी। वे भारी भरकम शब्दों के बजाय रोजमर्रा की बोलचाल की भाषा में लिखते थे, लेकिन उन शब्दों में जीवन का दर्शन छिपा होता था। उनके गीतों में मेहनतकश लोगों का दर्द, प्रेम की कोमलता और व्यवस्था पर व्यंग्य, तीनों दिखते हैं। कई गीतकारों और कवियों ने उन्हें हिंदी फिल्मी गीतों का सबसे बड़ा जनकवि कहा है।
शैलेंद्र का असली नाम क्या था
शंकरदास केसरीलाल।
शैलेंद्र की पहली फिल्म कौन सी थी
राज कपूर की बरसात, 1949।
तीसरी कसम किसकी कहानी पर बनी
फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर।
शैलेंद्र को कितने फिल्मफेयर मिले
सर्वश्रेष्ठ गीतकार के तीन।
स्रोत: Directorate of Film Festivals: National Film Awards, Filmfare Awards, Prasar Bharati Archives





