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Saturday Puja Vidhi: शनिदेव के साथ हनुमान जी की उपासना क्यों है खास?

Saturday Puja Vidhi: शनिदेव के साथ हनुमान जी की उपासना क्यों है खास?
Saturday Puja Vidhi

सारांश

  • Saturday Puja Vidhi: सनातन हिंदू धर्म परंपरा में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी विशिष्ट देवी-देवता के पूजन और आध्यात्मिक साधना के लिए निर्धारित किया गया है।
  • शनिवार के दिन विधिवत पूजा अथवा व्रत प्रारंभ करने के लिए साधक को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होना चाहिए।
  • शनिदेव की अर्चना के उपरांत अथवा समानांतर रूप से संकटमोचन हनुमान जी के मंदिर में जाकर आराधना करनी चाहिए।
  • भारतीय दर्शन में दान का मूल उद्देश्य केवल ग्रहों की शांति नहीं, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचित वर्ग की सेवा और अपने अहंकार का विसर्जन करना है।

Saturday Puja Vidhi: सनातन हिंदू धर्म परंपरा में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी विशिष्ट देवी-देवता के पूजन और आध्यात्मिक साधना के लिए निर्धारित किया गया है। इनमें शनिवार का दिन विशेष रूप से न्याय और कर्मफल के अधिष्ठाता सूर्यपुत्र शनिदेव की आराधना को समर्पित माना जाता है। इसके साथ ही एक अत्यंत सुदृढ़ और प्राचीन धार्मिक परंपरा के अनुसार शनिवार के दिन संकटमोचन श्री हनुमान जी की उपासना का भी विशेष महात्म्य है।

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव व्यक्ति को उसके भले और बुरे कर्मों के आधार पर ही अनुकूल या प्रतिकूल फल प्रदान करते हैं। यही कारण है कि शनिवार की साधना केवल कर्मकांडीय अनुष्ठान तक सीमित न रहकर मनुष्य को अपने आचरण में शुचिता, सत्य, आत्म-नियंत्रण और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाने की गंभीर सीख देती है। यदि आप भी शनिवार के दिन शनिदेव और हनुमान जी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो पूजा की शास्त्रीय विधि, पीपल के नीचे प्रज्वलित किए जाने वाले सरसों के तेल के दीपक का महत्व, राशि दोष निवारण के उपाय और शास्त्रसम्मत दान की मर्यादा को समझना अत्यंत आवश्यक है।

Saturday Puja Vidhi: शनिवार को शनिदेव के साथ हनुमान जी की पूजा का क्या है पौराणिक रहस्य?

धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि शनिदेव के दिन महावीर हनुमान जी की उपासना को इतना कल्याणकारी क्यों माना गया है। रामायण काल से जुड़े एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक प्रसंग के अनुसार, जब लंकापति रावण ने अपने अहंकार में नवग्रहों को बंदी बनाकर लंका की कारागार में पैरों के नीचे दबा रखा था, तब माता सीता की खोज में लंका पहुंचे श्री हनुमान जी ने वहां बंदी बने शनिदेव सहित सभी ग्रहों को रावण के बंधन से मुक्त कराया था।

उस समय शनिदेव के शरीर पर रावण के अत्याचारों से गहरे घाव और तीव्र पीड़ा थी, जिसे शांत करने के लिए पवनपुत्र हनुमान जी ने उनके अंगों पर सरसों का शीतल तेल लगाया था। इस उपकार से परम प्रसन्न होकर शनिदेव ने वरदान दिया था कि जो भी साधक शनिवार के दिन श्री हनुमान जी की अनन्य भाव से भक्ति करेगा, सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करेगा अथवा उन्हें सिंदूर व चमेली का तेल अर्पित करेगा, उसे उनकी पीड़ादायक साढ़ेसाती या ढैय्या का कोई अनिष्टकारी प्रभाव नहीं झेलना पड़ेगा। यही कारण है कि शनिवार के दिन दोनों देवताओं की संयुक्त पूजा साधक के जीवन से समस्त भय, व्याधि और ग्रहों के दुष्प्रभावों को समाप्त करने वाली मानी जाती है।

शनिवार की प्रात:कालीन पूजा की तैयारी और संकल्प विधान

शनिवार के दिन विधिवत पूजा अथवा व्रत प्रारंभ करने के लिए साधक को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होना चाहिए। इस दिन हल्के नीले, गहरे नीले या काले वस्त्र धारण करने की परंपरा रही है, किंतु पूजा करते समय मन में पूर्ण सात्विकता और शांति का होना अनिवार्य है।

पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और एक पाटे या चौकी पर काला या गहरा नीला कपड़ा बिछाएं। यदि घर में शनि यंत्र या नवग्रह चित्र उपलब्ध हो, तो उसे स्थापित करें। शास्त्रों का यह कड़ा निर्देश है कि घर के भीतर कभी भी शनिदेव की वक्र दृष्टि वाली उग्र विग्रह मूर्ति स्थापित नहीं करनी चाहिए; घर में केवल शनि यंत्र या नवग्रह चित्र की ही पूजा करनी चाहिए, जबकि विग्रह दर्शन के लिए बाहर स्थित शनि मंदिर जाना ही शास्त्रसम्मत है। इसके उपरांत हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपने इष्टदेव का स्मरण करते हुए निष्काम भाव से दिनभर सात्विक रहने और पूजन का संकल्प लें।

शनि मंदिर में पूजन विधि: दृष्टि का रखें विशेष ध्यान

शनि मंदिर में जाकर पूजन करते समय कुछ मूलभूत आध्यात्मिक नियमों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। मंदिर में प्रवेश के उपरांत सबसे पहले शनिदेव की शिला या प्रतिमा पर शुद्ध जल, कच्चा दूध और फिर सुगंधित सरसों का तेल अर्पित किया जाता है। भगवान को काले तिल, काली साबुत उड़द, नीले अपराजिता के फूल या शमी पत्र समर्पित करें।

शनिदेव की प्रतिमा के समक्ष खड़े होते समय इस बात की विशेष सावधानी रखनी चाहिए कि साधक कभी भी मूर्ति की आंखों में सीधे आंखें डालकर न देखे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव की दृष्टि में अत्यधिक ताप और वक्रता होती है, इसलिए हमेशा सिर झुकाकर केवल उनके पावन चरणों के दर्शन करने चाहिए और वहीं अपनी प्रार्थना निवेदित करनी चाहिए। पूजा के दौरान “ॐ शं शनैश्चराय नमः” अथवा शनि तांत्रिक मंत्र “ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः” का कम से कम 108 बार रुद्राक्ष की माला से जप करना आत्मबल को बढ़ाता है।

शनिवार को हनुमान जी की उपासना: सिंदूर, चमेली का तेल और सुंदरकांड का पाठ

शनिदेव की अर्चना के उपरांत अथवा समानांतर रूप से संकटमोचन हनुमान जी के मंदिर में जाकर आराधना करनी चाहिए। हनुमान जी के सम्मुख चमेली के तेल में नारंगी सिंदूर मिलाकर चोला चढ़ाने अथवा उनके चरणों का सिंदूर अपने मस्तक पर धारण करने से मानसिक अवसाद और अज्ञात भय दूर होते हैं।

भगवान बजरंगबली को बूंदी के लड्डू, गुड़-चना अथवा तुलसी दल की माला अर्पित करनी चाहिए। शनिवार की संध्या को लाल या पीले आसन पर बैठकर श्री हनुमान चालीसा का सात बार पाठ करना, बजरंग बाण अथवा श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का सस्वर पाठ करना साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आध्यात्मिक घेरा निर्मित करता है। हनुमान जी की उपासना से जातक में अनुशासन, कर्तव्यपरायणता और सेवा भाव का उदय होता है, जो अंततः शनिदेव को भी सर्वाधिक प्रिय है।

पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक: क्या है आध्यात्मिक विधान?

शनिवार की संध्याकाल यानी गोधूलि बेला में पीपल के वृक्ष के समीप सरसों के तेल का चौमुखी दीपक प्रज्वलित करने की अत्यंत फलदायी परंपरा सनातन धर्म में चली आ रही है। श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने वृक्षों में स्वयं को ‘अश्वत्थ’ यानी पीपल बताया है, और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष में त्रिदेवों के साथ-साथ मां लक्ष्मी का भी वास माना जाता है।

शाम के समय एक मिट्टी के दीपक में शुद्ध सरसों का तेल भरकर, उसमें थोड़ी सी काली उड़द और काले तिल डालकर पीपल के तने के पास पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जलाना चाहिए। दीपक प्रज्वलित करने के बाद हाथ जोड़कर वृक्ष की सात बार मौन परिक्रमा करनी चाहिए। यह उपाय नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने, पूर्वजों यानी पितरों की तृप्ति और जीवन में आर्थिक अवरोधों को दूर करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।

Saturday Puja Vidhi: शनिवार के दिन किन वस्तुओं का दान करना माना जाता है सर्वोत्तम?

भारतीय दर्शन में दान का मूल उद्देश्य केवल ग्रहों की शांति नहीं, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचित वर्ग की सेवा और अपने अहंकार का विसर्जन करना है। शनिदेव को श्रम, सेवा और कर्मकारों का प्रतिनिधि ग्रह माना गया है, इसलिए शनिवार के दिन किए गए दान का सीधा संबंध जरूरतमंदों की सहायता से है।

इस दिन काले तिल, साबुत उड़द की दाल, सरसों का तेल, लोहे के बर्तन (जैसे तवा या चिमटा), काले जूते, छाता और गहरे रंग के ऊनी कंबल का दान किसी निर्धन, असहाय अथवा शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति को करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। इसके अलावा एक कांसे या लोहे के कटोरे में सरसों का तेल भरकर उसमें अपना मुख (चेहरा) देखकर उस तेल का दान करना, जिसे ‘छाया पात्र दान’ कहा जाता है, असाध्य शारीरिक कष्टों और मानसिक व्याधियों के निवारण के लिए एक प्रामाणिक उपाय माना गया है।

Saturday Puja Vidhi: शनिवार के दिन क्या करें और किन गलतियों से बचें?

शनिवार के दिन अपने आचरण की शुचिता बनाए रखना सबसे बड़ा आध्यात्मिक उपाय है। इस दिन किसी भी अधीनस्थ कर्मचारी, सफाईकर्मी, वाहन चालक, मजदूर अथवा बेजुबान पशुओं—विशेष रूप से काले श्वान (कुत्ते) और कौवों—को सताना नहीं चाहिए; बल्कि काले कुत्ते को सरसों के तेल से चुपड़ी रोटी और कौवों को दाना डालना चाहिए।

शनिवार (ISaturday Puja Vidhi) के दिन घर में लोहा, सरसों का तेल, नमक, चमड़े का सामान और काली उड़द खरीदकर लाने से बचना चाहिए; इन वस्तुओं का दान करना शुभ होता है, किंतु इन्हें शनिवार के दिन क्रय करना वर्जित माना गया है। इसके अलावा तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा और असत्य भाषण से पूर्णतः दूर रहना चाहिए।

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लेखक

Netsha Singh

नेत्शा सिंह डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी न्यूज़ कंटेंट राइटर हैं। वे सरकारी योजनाओं, आपका पैसा, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। डिजिटल न्यूज़ लेखन में उन्हें लगभग एक साल का अनुभव है; इससे पहले वे खबर नगरी और ऑनलाइन ताज़ा खबर के साथ काम कर चुकी हैं और यूट्यूब पर समसामयिक विषयों पर कंटेंट भी बनाती हैं।

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