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राष्ट्रपति वीटो क्या है: अनुच्छेद 111, विधेयक लौटाने की शक्ति, पॉकेट वीटो और जैल सिंह का डाक विधेयक वाला मामला

संसद से पास विधेयक कानून तभी बनता है जब राष्ट्रपति मंजूरी दें। लेकिन क्या राष्ट्रपति मना कर सकते हैं? समझिए वीटो की शक्ति।

राष्ट्रपति भवन और संसद का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद भी कोई विधेयक तब तक कानून नहीं बनता, जब तक राष्ट्रपति उस पर मंजूरी न दे दें।
  • संविधान के जानकार राष्ट्रपति की इस शक्ति को आम तौर पर तीन हिस्सों में समझाते हैं:
  • धन विधेयक को राष्ट्रपति लौटा नहीं सकते, क्योंकि ऐसे विधेयक उनकी पूर्व अनुमति से ही लोकसभा में पेश होते हैं।
  • राज्य विधानसभा से पास विधेयक राज्यपाल के पास जाते हैं। अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल मंजूरी दे सकते हैं, रोक सकते हैं, लौटा सकते हैं या विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते…

संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद भी कोई विधेयक तब तक कानून नहीं बनता, जब तक राष्ट्रपति उस पर मंजूरी न दे दें। राष्ट्रपति के पास यह विकल्प भी होता है कि वे मंजूरी रोक लें या विधेयक को दोबारा विचार के लिए संसद को लौटा दें। इसी शक्ति को आम भाषा में वीटो कहा जाता है। भारत में यह शक्ति सीमित है और ज्यादातर मामलों में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। यह लेख एक व्याख्या है, जिसमें बताया गया है कि संविधान राष्ट्रपति को विधेयकों पर क्या अधिकार देता है और इनकी सीमाएं क्या हैं।

अनुच्छेद 111 क्या कहता है

संविधान का अनुच्छेद 111 कहता है कि संसद से पास हर विधेयक राष्ट्रपति के सामने रखा जाएगा। राष्ट्रपति घोषणा करेंगे कि वे उस पर मंजूरी देते हैं या मंजूरी रोकते हैं। अगर विधेयक धन विधेयक नहीं है, तो वे उसे संदेश के साथ संसद को लौटा सकते हैं और कह सकते हैं कि पूरे विधेयक या उसके किसी हिस्से पर दोबारा विचार किया जाए। अगर संसद संशोधन के साथ या बिना संशोधन के विधेयक को फिर से पास कर देती है, तो राष्ट्रपति उस पर मंजूरी नहीं रोक सकते।

मुख्य बातें: राष्ट्रपति भवन और संसद का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

वीटो के तीन रूप

संविधान के जानकार राष्ट्रपति की इस शक्ति को आम तौर पर तीन हिस्सों में समझाते हैं:

  • पूर्ण वीटो: राष्ट्रपति विधेयक पर मंजूरी देने से मना कर दें और विधेयक खत्म हो जाए। यह आम तौर पर तब होता है जब निजी सदस्य का विधेयक हो या विधेयक पास होने के बाद सरकार बदल जाए और नई सरकार उसे आगे न बढ़ाना चाहे।
  • निलंबित वीटो: राष्ट्रपति विधेयक को दोबारा विचार के लिए लौटा दें। संसद उसे साधारण बहुमत से फिर पास कर दे तो मंजूरी देनी पड़ती है।
  • पॉकेट वीटो: राष्ट्रपति न मंजूरी दें, न मना करें और न लौटाएं, बल्कि विधेयक को अपने पास ही रखे रहें।

पॉकेट वीटो क्यों संभव है

अमेरिका में राष्ट्रपति को दस दिन में फैसला करना होता है, लेकिन भारत के संविधान में राष्ट्रपति के लिए कोई समय सीमा नहीं लिखी गई है। इसी वजह से राष्ट्रपति किसी विधेयक को लंबे समय तक अपने पास रख सकते हैं। इसी को पॉकेट वीटो कहा जाता है।

यह भी पढ़ें: भारत में कानून कैसे बनता है: विधेयक के तीन वाचन, संयुक्त बैठक, धन विधेयक और राष्ट्रपति की मंजूरी | Mineral Bill 2026: खनिज विधेयक के विरोध में सीएम हेमंत सोरेन का राष्ट्रपति और पीएम को पत्र, झारखंड को हजारों करोड़ के नुकसान की आशंका

जैल सिंह और डाक विधेयक

पॉकेट वीटो का सबसे चर्चित उदाहरण 1986 का भारतीय डाकघर संशोधन विधेयक है। इस विधेयक में सरकार को डाक से भेजी जाने वाली चिट्ठियों को रोकने और जांचने के व्यापक अधिकार देने का प्रावधान था। प्रेस और नागरिक अधिकारों से जुड़े लोगों ने इसकी आलोचना की। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने इस पर न मंजूरी दी और न इसे लौटाया। उनके कार्यकाल के अंत तक विधेयक उनके पास ही रहा। बाद में सरकार ने भी इसे आगे नहीं बढ़ाया।

किन विधेयकों पर सीमा

धन विधेयक को राष्ट्रपति लौटा नहीं सकते, क्योंकि ऐसे विधेयक उनकी पूर्व अनुमति से ही लोकसभा में पेश होते हैं। संविधान संशोधन विधेयक के मामले में 1971 के 24वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 368 में यह साफ लिखा गया कि राष्ट्रपति उस पर मंजूरी देंगे। यानी संविधान संशोधन पर वीटो की गुंजाइश नहीं है।

मंत्रिपरिषद की सलाह

अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। 1976 के 42वें संशोधन ने इस सलाह को बाध्यकारी बनाया और 1978 के 44वें संशोधन ने राष्ट्रपति को एक बार सलाह पर दोबारा विचार करने के लिए कहने का अधिकार दिया। इसलिए व्यवहार में वीटो का इस्तेमाल बहुत कम होता है और ज्यादातर विधेयकों को मंजूरी मिल जाती है।

राज्यों के विधेयक

राज्य विधानसभा से पास विधेयक राज्यपाल के पास जाते हैं। अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल मंजूरी दे सकते हैं, रोक सकते हैं, लौटा सकते हैं या विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं। अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति ऐसे विधेयक पर मंजूरी दे सकते हैं या रोक सकते हैं। धन विधेयक न हो तो वे राज्यपाल से उसे विधानसभा को लौटाने को कह सकते हैं। इस मामले में विधानसभा के दोबारा पास करने के बाद भी राष्ट्रपति मंजूरी देने के लिए बाध्य नहीं हैं। विधेयकों पर फैसले में देरी को लेकर केंद्र और कई राज्यों के बीच बहस भी होती रही है।

दूसरे राष्ट्रपतियों के उदाहरण

2006 में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने लाभ के पद से जुड़ा संसद सदस्य अयोग्यता निवारण संशोधन विधेयक दोबारा विचार के लिए लौटाया था। संसद ने इसे फिर से पास किया, जिसके बाद उन्होंने मंजूरी दे दी। यह उदाहरण दिखाता है कि राष्ट्रपति की आपत्ति के बाद भी अंतिम फैसला चुनी हुई संसद का होता है।

राष्ट्रपति की वीटो शक्ति किस अनुच्छेद में है

अनुच्छेद 111 में।

पॉकेट वीटो का प्रसिद्ध उदाहरण क्या है

1986 का भारतीय डाकघर संशोधन विधेयक, राष्ट्रपति जैल सिंह के समय।

क्या राष्ट्रपति धन विधेयक लौटा सकते हैं

नहीं।

लौटाया गया विधेयक दोबारा पास हो तो क्या होता है

राष्ट्रपति को मंजूरी देनी होती है।

स्रोत: Legislative Department: Constitution of India, Rashtrapati Bhavan, Lok Sabha: Legislative Process

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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