Mineral Bill 2026: झारखंड की राजनीति में एक बार फिर केंद्र और राज्य के बीच टकराव के नए आसार बनते नजर आ रहे हैं क्योंकि खान एवं खनिज संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर राज्य सरकार ने आक्रामक रुख अपना लिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस नए प्रस्तावित कानून के कड़े विरोध में देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक विस्तृत पत्र भेजा है। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि यह केंद्र सरकार का विधेयक इसी रूप में लागू होता है, तो इससे खनिज संपन्न राज्य झारखंड को प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व से वंचित होना पड़ सकता है। इतना ही नहीं, इससे राज्य के विकास कार्यों पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा और जनहित की तमाम योजनाएं बीच में ही अटक सकती हैं। इस अहम राजनीतिक घटनाक्रम ने देश भर के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां संघीय ढांचे और राज्यों के वित्तीय अधिकारों पर खुलकर चर्चा की जा रही है।
Mineral Bill 2026: राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र के मुख्य बिंदु और आपत्तियां
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को लिखे गए अपने आधिकारिक पत्र में प्रस्तावित संशोधन के अंतर्गत एमएमडीआर अधिनियम में धारा नौ-डी जोड़े जाने के प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई है। इस नए प्रावधान के अनुसार, अब देश की विभिन्न राज्य सरकारें खनिज अधिकारों अथवा खनिज वहन भूमि पर किसी भी प्रकार का कर, उपकर यानी सेस या अन्य लेवी केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाने वाली शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन ही लगा सकेंगी। इसके अलावा कुछ विशेष परिस्थितियों में पूर्व काल में लगाए गए ऐसे उपकरों के बकाया दावों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता कमजोर होगी। मुख्यमंत्री ने तर्क दिया है कि इस तरह के प्रावधानों से राज्यों की राजस्व संग्रहण की शक्ति सीधे तौर पर सीमित हो जाएगी और वे अपने ही संसाधनों का खुलकर उपयोग करने में असमर्थ महसूस करेंगी। यही कारण है कि झारखंड सरकार इस विधेयक को राज्य के अधिकारों पर सीधा हमला मान रही है और इसके खिलाफ मुखर होकर विरोध प्रदर्शन की रणनीति तैयार कर रही है।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय और राज्य के संवैधानिक अधिकारों का हवाला
अपने इस विरोध को मजबूत आधार देने के लिए मुख्यमंत्री ने देश की सर्वोच्च अदालत के एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले का विशेष तौर पर हवाला दिया है। उन्होंने बताया कि हाल ही में सर्वोच्च अदालत की नौ न्यायाधीशों की एक वृहद संविधान पीठ ने मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड मामले में अपना फैसला सुनाया था। इस फैसले में अदालत ने यह पूरी तरह स्पष्ट किया था कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 49 के अंतर्गत राज्यों को खनिज वहन भूमि पर कर अथवा उपकर लगाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना था कि खनिज का बाजार मूल्य या उसका उत्पादन ऐसे कर निर्धारण का मुख्य आधार बन सकता है। इसी कानूनी और संवैधानिक अधिकार के बल पर झारखंड विधानसभा ने पूर्व में झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस अधिनियम, 2024 को पारित किया था और उसके अंतर्गत जरूरी नियमों को अधिसूचित किया था।
खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और आदिवासी समुदायों के कल्याण पर पड़ने वाला असर
झारखंड विधानसभा द्वारा बनाया गया वह कानून कोई साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि राज्य विधानमंडल द्वारा संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुरूप तैयार किया गया एक पुख्ता विधान था। इस कानून का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य केवल राजस्व का भारी संग्रह करना नहीं था, बल्कि खनन गतिविधियों से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के समग्र विकास को गति देना था। इसके माध्यम से सामाजिक सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पेयजल आपूर्ति, ग्रामीण आधारभूत संरचना और कई प्रकार के कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए वित्तीय संसाधन जुटाए जाते थे। यदि केंद्र का नया संशोधन प्रभावी होता है और राज्य की उपकर लगाने की शक्ति कमजोर होती है, तो इन तमाम कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन का संकट खड़ा हो जाएगा। इससे विशेषकर आदिवासी समुदायों को विस्थापन, भूमि से बेदखली, पर्यावरणीय क्षति, प्रदूषण और पारंपरिक आजीविकाओं के नुकसान जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
Mineral Bill 2026: राहुल गांधी से हस्तक्षेप का अनुरोध और राज्य में महाआंदोलन की सुगबुगाहट
इस पूरे राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे पर केवल केंद्र सरकार को पत्र लिखने तक ही सीमित न रहते हुए, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी पत्र प्रेषित किया है। उन्होंने राहुल गांधी से इस पूरे मामले में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने तथा संसद के भीतर और बाहर इस विधेयक के विरोध में विपक्षी दलों का सहयोग करने का औपचारिक अनुरोध किया है। राज्य के मंत्रियों और सत्ताधारी दल के नेताओं का मानना है कि यह नया विधेयक सीधे तौर पर संघीय ढांचे को कमजोर करने और गैर-भाजपा शासित राज्यों के अधिकारों में दखल देने की एक सोची-समझी साजिश है। इस बिल के तीव्र विरोध के स्वरूप झारखंड मुक्ति मोर्चा आने वाले दिनों में एक बड़े राज्यव्यापी महाआंदोलन की रूपरेखा तैयार करने में जुट गया है। सत्तारूढ़ दल का यह कड़ा तेवर यह साफ संकेत देता है कि आने वाले समय में खनिज अधिकारों को लेकर केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक संघर्ष और अधिक तीव्र होने वाला है।
खान एवं खनिज संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड सरकार का यह कड़ा रुख आने वाले समय में देश की संघीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को पत्र लिखकर राज्य के वित्तीय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जो मांग उठाई गई है, वह काफी दूरगामी परिणाम देने वाली है। यदि केंद्र सरकार इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाती है, तो झारखंड में होने वाला संभावित महाआंदोलन राष्ट्रीय राजनीति का एक अहम केंद्र बन जाएगा। राज्य के विकास, वहां के मूलवासियों और आदिवासी समुदायों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए यह कानूनी और राजनीतिक लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार इस गंभीर विषय पर क्या रुख अपनाती है और आने वाले दिनों में इस विधायी प्रस्ताव का भविष्य क्या होगा।
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