भारत ने 3 नवंबर 2026 को ओडिशा के तट पर अपनी रक्षा क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए प्रलय मिसाइल का एक और सफल परीक्षण संपन्न किया है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन: डीआरडीओ: द्वारा विकसित यह स्वदेशी मिसाइल सतह से सतह पर मार करने में सक्षम है और इसकी मारक क्षमता 150 से 500 किलोमीटर के बीच है. इस परीक्षण के दौरान मिसाइल ने अपनी उन्नत नेविगेशन प्रणाली और उड़ान के दौरान दिशा बदलने की विशिष्ट क्षमता का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है.

प्रलय मिसाइल की तकनीकी विशेषताएं और मारक क्षमता
प्रलय मिसाइल भारत की रक्षा तकनीक में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है. यह एक सतह से सतह पर मार करने वाली क्वासी: बैलिस्टिक मिसाइल है जिसे विशेष रूप से जमीन पर स्थित दुश्मन के सैन्य ठिकानों को सटीकता से निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है. इस मिसाइल की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी मारक सीमा है, जो 150 किलोमीटर से शुरू होकर 500 किलोमीटर तक जाती है. यह सीमा इसे कम दूरी के सामरिक लक्ष्यों के लिए एक आदर्श हथियार बनाती है. तकनीकी रूप से, यह मिसाइल ठोस ईंधन यानी सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट मोटर द्वारा संचालित होती है. ठोस ईंधन का उपयोग करने के कई महत्वपूर्ण लाभ हैं, जिनमें सबसे प्रमुख यह है कि मिसाइल को लंबे समय तक पूरी तरह से तैयार स्थिति में रखा जा सकता है. तरल ईंधन वाली मिसाइलों के विपरीत, इसे लॉन्च करने से पहले ईंधन भरने की लंबी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती, जिससे युद्ध जैसी स्थितियों में इसे बहुत कम समय में दागा जा सकता है.
इसके अलावा, प्रलय मिसाइल को मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. इसका अर्थ यह है कि भारतीय सेना को इसे दागने के लिए किसी एक स्थायी या निश्चित लॉन्चिंग स्टेशन पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होगी. मोबाइल लॉन्चर की वजह से इस मिसाइल प्रणाली को सड़क मार्ग से विभिन्न स्थानों पर ले जाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर किसी भी उपयुक्त स्थान से तैनात किया जा सकता है. यह लचीलापन दुश्मन के लिए मिसाइल की स्थिति का पता लगाना और उसे नष्ट करना अत्यंत कठिन बना देता है. रक्षा मंत्रालय के विवरण के अनुसार, इस मिसाइल में अत्याधुनिक नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम लगाए गए हैं, जो इसे अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने में उच्च स्तर की सटीकता प्रदान करते हैं. साथ ही, यह विभिन्न प्रकार के वॉरहेड यानी हथियार ले जाने में भी पूरी तरह सक्षम है.
क्वासी बैलिस्टिक तकनीक और इसका सामरिक महत्व
प्रलय को एक क्वासी: बैलिस्टिक मिसाइल के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जो इसे पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों से अलग और अधिक घातक बनाता है. एक सामान्य बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च होने के बाद एक पूर्व: निर्धारित धनुषाकार या घुमावदार रास्ते पर चलती है, जिसे प्रोजेक्टाइल मोशन कहा जाता है. इस निश्चित रास्ते के कारण दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों और रडार के लिए मिसाइल की गति और उसके गिरने के स्थान का अनुमान लगाना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. हालांकि, प्रलय जैसी क्वासी: बैलिस्टिक मिसाइल अपनी उड़ान के दौरान अपनी दिशा और पथ को बदलने की क्षमता रखती है. यह तकनीक इसे दुश्मन के रडार और मिसाइल रोधी प्रणालियों के लिए एक बड़ी चुनौती बना देती है.
जब कोई मिसाइल हवा में अपना रास्ता बदल सकती है, तो दुश्मन की इंटरसेप्टर मिसाइलों के लिए उसे बीच में रोकना लगभग असंभव हो जाता है. प्रलय की यह विशेषता इसे आधुनिक युद्धक्षेत्र में एक शक्तिशाली उपकरण बनाती है. परीक्षण के दौरान भी यह देखा गया कि मिसाइल ने ऐसा रास्ता अपनाया जिसमें उड़ान के बीच में पैंतरेबाजी शामिल थी. हालांकि यह तकनीक इसे पूरी तरह से अभेद्य नहीं बनाती, क्योंकि इसकी प्रभावशीलता हमेशा विरोधी पक्ष की रक्षा क्षमताओं और तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करेगी, लेकिन यह निश्चित रूप से भारत की मारक क्षमता को एक नया आयाम प्रदान करती है. 500 किलोमीटर की मारक क्षमता के साथ, यह सीमावर्ती क्षेत्रों के पार महत्वपूर्ण सैन्य बुनियादी ढांचे और ठिकानों को निशाना बनाने का एक प्रभावी विकल्प प्रदान करती है.
विकास यात्रा और औद्योगिक भागीदारों की भूमिका
प्रलय मिसाइल का विकास भारत के स्वदेशी रक्षा कार्यक्रम की सफलता का एक बड़ा उदाहरण है. इसे मुख्य रूप से हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत और डीआरडीओ की कई अन्य विशिष्ट प्रयोगशालाओं के सामूहिक प्रयासों से विकसित किया गया है. इस परियोजना में केवल सरकारी संस्थान ही नहीं, बल्कि भारत डायनेमिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसे प्रमुख औद्योगिक साझेदार भी शामिल रहे हैं. इन कंपनियों ने मिसाइल के निर्माण, सिस्टम इंटीग्रेशन और विभिन्न तकनीकी घटकों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इस मिसाइल की परीक्षण यात्रा दिसंबर 2021 में शुरू हुई थी, जब इसका पहला सफल परीक्षण किया गया था.
इसके बाद, जुलाई 2025 में डीआरडीओ ने ओडिशा तट से ही इसके दो लगातार सफल उड़ान परीक्षण किए थे. विकास का सिलसिला यहीं नहीं रुका और दिसंबर 2025 में एक और महत्वपूर्ण परीक्षण किया गया, जिसमें एक ही मोबाइल लॉन्चर से दो रॉकेटों को बहुत कम समय के अंतराल में दागने की क्षमता को परखा गया. उस समय रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की थी कि दोनों मिसाइलों ने अपने निर्धारित पथ का पालन किया और परीक्षण के सभी उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया. इन क्रमिक परीक्षणों ने मिसाइल की विश्वसनीयता को सिद्ध किया है और इसे भारतीय थल सेना और वायु सेना में शामिल करने की दिशा में मार्ग प्रशस्त किया है. 3 नवंबर 2026 को किया गया हालिया परीक्षण इसी कड़ी का हिस्सा है, जिसके बाद अब इसके सैन्य इस्तेमाल के लिए मूल्यांकन की प्रक्रिया और तेज होने की उम्मीद है.
सुरक्षा उपाय और भविष्य की संभावनाएं
3 नवंबर को चांदीपुर के पास किए गए इस परीक्षण की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने कड़े सुरक्षा उपाय किए थे. सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत, लॉन्च पैड के आसपास के इलाकों से 2,500 से अधिक निवासियों को अस्थायी रूप से सुरक्षित आश्रय स्थलों में स्थानांतरित किया गया था. यह एक मानक प्रक्रिया है जो किसी भी बड़े मिसाइल परीक्षण के दौरान अपनाई जाती है ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति में जान: माल की हानि को रोका जा सके. हालांकि इस विशेष परीक्षण की सफलता और लोगों को हटाए जाने के विवरण की अभी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि की प्रतीक्षा है, लेकिन उपलब्ध जानकारी इस मिशन की सफलता की ओर संकेत करती है.
प्रलय मिसाइल का भविष्य भारतीय सशस्त्र बलों के लिए बहुत आशाजनक दिखाई देता है. अब मुख्य ध्यान इस बात पर होगा कि थल सेना और वायु सेना इस मिसाइल को अपनी रणनीतियों में कैसे शामिल करती हैं. इसकी मोबाइल तैनाती क्षमता और सटीक मारक क्षमता इसे सीमा सुरक्षा के लिए एक लचीला विकल्प बनाती है. यदि इसे सफलतापूर्वक सेना के बेड़े में शामिल कर लिया जाता है, तो यह भारत की सामरिक मिसाइल क्षमता को काफी मजबूती प्रदान करेगा. यह मिसाइल न केवल रक्षात्मक बल्कि आक्रामक रणनीतियों में भी भारत को बढ़त दिला सकती है, जिससे संभावित खतरों के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोधक क्षमता विकसित होगी. कुल मिलाकर, प्रलय का सफल परीक्षण भारत की स्वदेशी तकनीक और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है.
स्रोत: Aaj Tak





