जब भी देश की रक्षा में असाधारण साहस की बात होती है, तो परमवीर चक्र का नाम सबसे पहले आता है। यह भारत का सबसे बड़ा युद्धकालीन वीरता सम्मान है, जो दुश्मन के सामने सबसे ऊंचे दर्जे की बहादुरी और आत्मबलिदान के लिए दिया जाता है। आजादी के बाद से अब तक यह सम्मान सिर्फ 21 सैनिकों को मिला है और इनमें से ज्यादातर को यह मरणोपरांत दिया गया। नवंबर 1947 में कश्मीर के बडगाम में लड़ते हुए शहीद हुए मेजर सोमनाथ शर्मा इसके पहले विजेता थे। इस लेख में जानिए परमवीर चक्र का इतिहास, डिजाइन, नियम और इसके विजेताओं की कहानी।
कब शुरू हुआ परमवीर चक्र
परमवीर चक्र की स्थापना 26 जनवरी 1950 को हुई, जिस दिन भारत गणतंत्र बना। इसे 15 अगस्त 1947 से लागू माना गया, ताकि आजादी के तुरंत बाद हुए कश्मीर युद्ध के वीरों को भी यह सम्मान दिया जा सके। इसी दिन महावीर चक्र और वीर चक्र भी शुरू किए गए। इस तरह युद्धकालीन वीरता के लिए तीन सम्मान बने, जिनमें परमवीर चक्र सबसे ऊपर है। शांतिकाल की वीरता के लिए अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र दिए जाते हैं।

डिजाइन किसने बनाया
परमवीर चक्र का डिजाइन सावित्री खानोलकर ने तैयार किया था। उनका जन्म स्विट्जरलैंड में हुआ था और उन्होंने भारतीय सेना के अधिकारी विक्रम खानोलकर से शादी के बाद भारतीय संस्कृति, संस्कृत और पुराणों का गहरा अध्ययन किया। पदक कांसे का गोल चक्र है। इसके बीच में अशोक का राष्ट्रीय चिह्न है और चारों ओर इंद्र के वज्र की चार आकृतियां हैं। वज्र की प्रेरणा महर्षि दधीचि की कथा से ली गई, जिन्होंने देवताओं के लिए अपनी हड्डियां दान कर दी थीं। पदक के पीछे हिंदी और अंग्रेजी में परमवीर चक्र लिखा होता है। इसका रिबन बैंगनी रंग का होता है।
किसे मिलता है यह सम्मान
यह सम्मान थल सेना, नौसेना और वायु सेना के किसी भी रैंक के अधिकारी या जवान को दिया जा सकता है। रिजर्व बल, प्रादेशिक सेना और सेना के अधीन काम करने वाले दूसरे बलों के लोग भी इसके पात्र हैं। शर्त यह है कि वीरता दुश्मन के सामने, जमीन, समुद्र या आसमान में दिखाई गई हो। अगर किसी विजेता को दोबारा ऐसी ही वीरता के लिए चुना जाए, तो उसे रिबन पर एक बार दिया जाता है। अब तक किसी को दो बार यह सम्मान नहीं मिला है।
यह भी पढ़ें: Vande Bharat Express: दुनिया के सबसे ऊंचे चिनाब ब्रिज पर 100 की रफ्तार से दौड़ी वंदे भारत, रेलवे ने बनाया नया रिकॉर्ड | Khel Ratna Award 2025: 12 साल बाद खेल रत्न खाली, 17 खिलाड़ियों को अर्जुन अवॉर्ड, जानें पूरी विजेता सूची और सम्मान का पूरा विवरण
पहले विजेता: मेजर सोमनाथ शर्मा
अक्टूबर 1947 में कबायली हमलावरों ने कश्मीर पर हमला किया। 3 नवंबर 1947 को मेजर सोमनाथ शर्मा अपनी कुमाऊं रेजिमेंट की टुकड़ी के साथ बडगाम में तैनात थे। उनका एक हाथ पहले से चोट के कारण प्लास्टर में था, फिर भी वे मोर्चे पर गए। संख्या में कहीं ज्यादा दुश्मनों से घिरने के बावजूद उन्होंने अपने जवानों का हौसला बनाए रखा और श्रीनगर हवाई अड्डे की ओर दुश्मन को बढ़ने से रोके रखा। इसी लड़ाई में एक मोर्टार गोले से वे शहीद हो गए। उनके आखिरी संदेश में कहा गया था कि वे एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे और आखिरी जवान, आखिरी गोली तक लड़ेंगे।
अलग अलग युद्धों के विजेता
1947 और 1948 के कश्मीर युद्ध में मेजर सोमनाथ शर्मा के अलावा नायक जदुनाथ सिंह, सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे, कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह और लांस नायक करम सिंह को यह सम्मान मिला। 1961 में कांगो में संयुक्त राष्ट्र मिशन के दौरान कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया को परमवीर चक्र मिला। 1962 के भारत चीन युद्ध में मेजर धन सिंह थापा, सूबेदार जोगिंदर सिंह और मेजर शैतान सिंह इसके विजेता बने। 1965 के युद्ध में कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद और लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर तारापोर को यह सम्मान मिला। अब्दुल हमीद ने खेमकरण सेक्टर में कई पाकिस्तानी टैंक नष्ट किए थे।
1971 का युद्ध
1971 के युद्ध में लांस नायक अल्बर्ट एक्का, फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों, सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल और मेजर होशियार सिंह को परमवीर चक्र मिला। निर्मलजीत सिंह सेखों भारतीय वायु सेना के अकेले परमवीर चक्र विजेता हैं। उन्होंने श्रीनगर पर हमला करने आए पाकिस्तानी विमानों का अकेले मुकाबला किया। अरुण खेत्रपाल सिर्फ 21 साल के थे, जब बसंतर की लड़ाई में उन्होंने अपने टैंक से दुश्मन के कई टैंक तबाह किए और शहीद हुए।
सियाचिन, श्रीलंका और कारगिल
1987 में सियाचिन में नायब सूबेदार बाना सिंह ने बेहद ऊंचाई पर दुश्मन की चौकी पर कब्जा किया, जिसे बाद में बाना पोस्ट नाम दिया गया। इसी साल श्रीलंका में भारतीय शांति सेना के अभियान में मेजर रामास्वामी परमेश्वरन को यह सम्मान मिला। 1999 के कारगिल युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव और राइफलमैन संजय कुमार को परमवीर चक्र दिया गया। विक्रम बत्रा का नारा ये दिल मांगे मोर आज भी याद किया जाता है।
विजेताओं को मिलने वाली सुविधाएं
परमवीर चक्र विजेताओं या उनके परिवारों को केंद्र सरकार की ओर से हर महीने सम्मान राशि दी जाती है। कई राज्य सरकारें भी अपनी ओर से नकद पुरस्कार, जमीन, नौकरी और दूसरी सुविधाएं देती हैं। गणतंत्र दिवस परेड में जीवित विजेता खास सम्मान के साथ शामिल होते हैं। सेना के जवान, चाहे वे किसी भी रैंक के हों, परमवीर चक्र विजेता को सलामी देते हैं।
सम्मान की यादें
दिल्ली के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में परम योद्धा स्थल पर सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं की प्रतिमाएं लगी हैं। 2023 में अंडमान और निकोबार के 21 बड़े बेनाम द्वीपों का नाम इन विजेताओं के नाम पर रखा गया। कई स्कूलों की किताबों, फिल्मों और धारावाहिकों में भी इनकी कहानियां दिखाई गई हैं, ताकि नई पीढ़ी इनके बलिदान को जान सके।
परमवीर चक्र की स्थापना कब हुई
26 जनवरी 1950 को, लेकिन इसे 15 अगस्त 1947 से लागू माना गया।
पहला परमवीर चक्र किसे मिला
मेजर सोमनाथ शर्मा को, मरणोपरांत।
अब तक कितने लोगों को यह सम्मान मिला
21 सैनिकों को।
इसका डिजाइन किसने बनाया
सावित्री खानोलकर ने।
स्रोत: Indian Army: Gallantry Awards, Gallantry Awards Portal, MoD, Ministry of Defence





