हम रोज जिस सड़क से गुजरते हैं, घर का कूड़ा जिस गाड़ी में जाता है, नल में जो पानी आता है और बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र जहां से बनता है, इन सब कामों के पीछे शहर की स्थानीय सरकार होती है। बड़े शहरों में यह सरकार नगर निगम कहलाती है। संसद देश के लिए और विधानसभा राज्य के लिए कानून बनाती है, लेकिन शहर के रोजमर्रा के कामकाज की जिम्मेदारी नगर निगम की होती है। यह लेख एक व्याख्या है, जिसमें आसान भाषा में बताया गया है कि नगर निगम कैसे बनता है, कैसे चुना जाता है और क्या काम करता है।
संविधान में जगह कैसे मिली
भारत में नगर निकाय अंग्रेजों के समय से मौजूद थे। मद्रास नगर निगम 1688 में बना, जिसे देश का सबसे पुराना नगर निगम माना जाता है। लेकिन आजादी के बाद लंबे समय तक इन निकायों को संविधान में कोई पक्की जगह नहीं मिली थी। कई राज्यों में चुनाव सालों तक टलते रहे। इसे बदलने के लिए 1992 में 74वां संविधान संशोधन पारित हुआ, जो 1 जून 1993 से लागू हुआ। इससे संविधान में भाग 9क जोड़ा गया, जिसमें अनुच्छेद 243P से 243ZG तक शहरी स्थानीय निकायों के नियम हैं। साथ ही 12वीं अनुसूची जोड़ी गई।

तीन तरह के नगर निकाय
संविधान के अनुसार शहरी क्षेत्रों में तीन तरह के निकाय बनते हैं:
- नगर पंचायत: ऐसे इलाके के लिए जो गांव से शहर में बदल रहा हो।
- नगर पालिका परिषद: छोटे शहरों के लिए।
- नगर निगम: बड़े शहरों के लिए।
किस शहर में कौन सा निकाय होगा, यह राज्य सरकार आबादी, आमदनी और दूसरे आधारों पर तय करती है।
पार्षद और वार्ड
हर नगर निगम क्षेत्र को वार्डों में बांटा जाता है। हर वार्ड से जनता सीधे वोट देकर एक पार्षद चुनती है, जिसे कई राज्यों में कॉर्पोरेटर या सभासद भी कहते हैं। संविधान के अनुसार सीटों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण होता है। कुल सीटों में कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं। पिछड़े वर्गों के आरक्षण का फैसला राज्य कानून से होता है।
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मेयर कौन होता है
मेयर यानी महापौर नगर निगम का प्रमुख होता है। कुछ राज्यों में मेयर को जनता सीधे चुनती है, जैसे उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में। कई दूसरे राज्यों में पार्षद आपस में मेयर चुनते हैं। मेयर का कार्यकाल भी राज्य कानून से तय होता है। दिल्ली जैसे कुछ शहरों में मेयर का चुनाव हर साल होता है।
नगर आयुक्त की भूमिका
नगर निगम में चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ एक प्रशासनिक ढांचा भी होता है। इसका प्रमुख नगर आयुक्त होता है, जो आम तौर पर IAS या राज्य सेवा का अधिकारी होता है और राज्य सरकार उसे नियुक्त करती है। नीतियां और बजट सदन यानी पार्षदों की बैठक में पास होते हैं, जबकि उन्हें लागू करने का काम आयुक्त और उसके विभाग करते हैं।
कार्यकाल और चुनाव
संविधान के अनुसार नगर निकाय का कार्यकाल पहली बैठक से पांच साल का होता है। अगर किसी कारण से निकाय भंग हो जाए, तो छह महीने के भीतर चुनाव कराना जरूरी है। नगर निकाय के चुनाव भारत का चुनाव आयोग नहीं, बल्कि हर राज्य का राज्य निर्वाचन आयोग कराता है। वार्डों का परिसीमन और आरक्षण भी राज्य स्तर पर तय होता है।
नगर निगम के काम
12वीं अनुसूची में नगर निकायों के लिए 18 विषय बताए गए हैं। इनमें शहरी योजना, भूमि उपयोग, सड़कें और पुल, पीने का पानी, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई, ठोस कचरा प्रबंधन, आग से बचाव, झुग्गी सुधार, पार्क, स्ट्रीट लाइट, बस स्टॉप, श्मशान और कब्रिस्तान, जन्म और मृत्यु का पंजीकरण और पशु वधशालाओं का नियमन शामिल है। कौन सा काम कितना निगम को सौंपा जाएगा, यह राज्य सरकार तय करती है।
पैसा कहां से आता है
नगर निगम की आमदनी के मुख्य स्रोत संपत्ति कर यानी हाउस टैक्स, पानी और सीवर शुल्क, विज्ञापन शुल्क, लाइसेंस फीस और भवन नक्शा पास करने की फीस हैं। इसके अलावा राज्य और केंद्र सरकार से अनुदान मिलता है। संविधान के अनुसार हर पांच साल में राज्य वित्त आयोग बनता है, जो राज्य और नगर निकायों के बीच पैसों के बंटवारे पर सिफारिश करता है।
वार्ड समिति और नागरिक
तीन लाख या उससे ज्यादा आबादी वाले नगर निकायों में वार्ड समितियां बनाना जरूरी है। नागरिक अपने पार्षद से सीधे शिकायत कर सकते हैं और ज्यादातर नगर निगमों के ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और हेल्पलाइन भी हैं। हाउस टैक्स समय पर भरना और कचरा अलग अलग करके देना भी नागरिकों की जिम्मेदारी है।
नगर निगम किस संविधान संशोधन से जुड़ा है
74वें संविधान संशोधन, 1992 से।
नगर निगम का कार्यकाल कितना होता है
पांच साल।
नगर निगम के चुनाव कौन कराता है
राज्य निर्वाचन आयोग।
12वीं अनुसूची में कितने विषय हैं
18 विषय।
स्रोत: Legislative Department: Constitution of India, Part IXA, Ministry of Housing and Urban Affairs, Wikipedia: Municipal corporation (India)





