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अविश्वास प्रस्ताव क्या है: लोकसभा में कैसे लाया जाता है, 50 सांसदों का समर्थन क्यों जरूरी, अब तक का इतिहास

संसदीय लोकतंत्र में सरकार तभी तक टिकी रहती है जब तक उसे लोकसभा का भरोसा हासिल है। जानिए अविश्वास प्रस्ताव की पूरी प्रक्रिया और अहम ऐतिहासिक उदाहरण।

संसद भवन का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • भारत में संसदीय शासन प्रणाली है। इसका मतलब है कि सरकार यानी मंत्रिपरिषद तभी तक सत्ता में रह सकती है जब तक उसे लोकसभा के बहुमत का भरोसा हासिल हो।
  • अविश्वास प्रस्ताव में सरकार के खिलाफ कोई कारण बताना जरूरी नहीं होता।
  • निंदा प्रस्ताव में सरकार या किसी मंत्री की किसी खास नीति या काम की निंदा की जाती है और इसके कारण बताने होते हैं।
  • विधानसभाओं में अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया उनकी अपनी नियमावली के अनुसार होती है।

भारत में संसदीय शासन प्रणाली है। इसका मतलब है कि सरकार यानी मंत्रिपरिषद तभी तक सत्ता में रह सकती है जब तक उसे लोकसभा के बहुमत का भरोसा हासिल हो। यह भरोसा परखने के दो बड़े संसदीय औजार हैं, अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव। अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष का सबसे ताकतवर हथियार माना जाता है, क्योंकि इसके पास होने पर पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है।

संवैधानिक आधार

संविधान के अनुच्छेद 75(3) में कहा गया है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति जिम्मेदार होगी। इसी सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत से अविश्वास प्रस्ताव की व्यवस्था निकलती है। संविधान में अविश्वास प्रस्ताव शब्द नहीं लिखा है। इसकी पूरी प्रक्रिया लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली के नियम 198 में दी गई है।

मुख्य बातें: संसद भवन का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

अविश्वास प्रस्ताव कैसे लाया जाता है

  1. कोई भी सांसद अविश्वास प्रस्ताव का लिखित नोटिस लोकसभा महासचिव को देता है
  2. स्पीकर सदन में प्रस्ताव पढ़कर सुनाते हैं और पूछते हैं कि इसके समर्थन में कौन-कौन है
  3. अगर कम से कम 50 सांसद अपनी जगह पर खड़े होकर समर्थन करें, तो स्पीकर प्रस्ताव पेश करने की अनुमति देते हैं
  4. अनुमति मिलने के बाद 10 दिन के भीतर चर्चा के लिए तारीख तय की जाती है
  5. चर्चा के बाद मतदान होता है
  6. अगर प्रस्ताव साधारण बहुमत से पास हो जाए, तो प्रधानमंत्री समेत पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना होता है

अविश्वास प्रस्ताव में सरकार के खिलाफ कोई कारण बताना जरूरी नहीं होता। यह बात इसे निंदा प्रस्ताव से अलग करती है।

50 सांसदों की शर्त क्यों

यह शर्त इसलिए रखी गई है ताकि कोई अकेला सदस्य बार-बार प्रस्ताव लाकर सदन का समय बर्बाद न करे। 50 सदस्यों का समर्थन दिखाता है कि सदन के एक ठीक-ठाक हिस्से को सरकार पर गंभीर सवाल हैं।

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केवल लोकसभा में ही क्यों

मंत्रिपरिषद संविधान के अनुसार केवल लोकसभा के प्रति जिम्मेदार है, क्योंकि लोकसभा सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है। राज्यसभा में अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता। राज्यों में इसी तरह मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति जिम्मेदार होती है और वहां अविश्वास प्रस्ताव विधानसभा में लाया जाता है।

अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव में अंतर

  • अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष लाता है, विश्वास प्रस्ताव सरकार खुद लाती है
  • अविश्वास प्रस्ताव के लिए नियम 198 की प्रक्रिया है, विश्वास प्रस्ताव आम तौर पर राष्ट्रपति के निर्देश या सरकार की पहल पर आता है
  • अविश्वास प्रस्ताव पास होने पर सरकार गिरती है, विश्वास प्रस्ताव गिरने पर भी सरकार गिरती है
  • गठबंधन टूटने या समर्थन वापसी के बाद अक्सर सरकार से विश्वास मत हासिल करने को कहा जाता है

निंदा प्रस्ताव से अंतर

निंदा प्रस्ताव में सरकार या किसी मंत्री की किसी खास नीति या काम की निंदा की जाती है और इसके कारण बताने होते हैं। इसके पास होने पर सरकार को इस्तीफा देना जरूरी नहीं होता, पर सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह जल्द सदन का विश्वास हासिल करे। अविश्वास प्रस्ताव पूरी मंत्रिपरिषद के खिलाफ होता है।

इतिहास के अहम पड़ाव

  • पहला अविश्वास प्रस्ताव अगस्त 1963 में आचार्य जेबी कृपलानी ने जवाहरलाल नेहरू सरकार के खिलाफ पेश किया था। 1962 के चीन युद्ध के बाद आए इस प्रस्ताव के पक्ष में 62 और विरोध में 347 वोट पड़े और यह गिर गया
  • अप्रैल 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार AIADMK के समर्थन वापस लेने के बाद विश्वास मत केवल एक वोट से हार गई थी। मतदान 269 के मुकाबले 270 रहा। यह अविश्वास प्रस्ताव नहीं, बल्कि सरकार की ओर से लाया गया विश्वास प्रस्ताव था
  • कई प्रधानमंत्रियों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आए, पर ज्यादातर गिर गए क्योंकि सरकार के पास बहुमत था

इतिहास बताता है कि अविश्वास प्रस्ताव से सरकार कम ही गिरती है। फिर भी विपक्ष इसका इस्तेमाल सरकार को सदन में जवाब देने के लिए मजबूर करने और बड़े मुद्दों पर बहस कराने के लिए करता है।

प्रस्ताव पर बहस क्यों अहम है

अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान विपक्ष सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है और प्रधानमंत्री आम तौर पर बहस का जवाब देते हैं। यह एक ऐसा मौका होता है जब पूरी सरकार के कामकाज की सार्वजनिक समीक्षा होती है।

राज्यों में व्यवस्था

विधानसभाओं में अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया उनकी अपनी नियमावली के अनुसार होती है। समर्थन के लिए जरूरी सदस्यों की संख्या अलग-अलग विधानसभाओं में अलग हो सकती है।

क्या अविश्वास प्रस्ताव एक सत्र में दोबारा लाया जा सकता है

आम संसदीय परंपरा के अनुसार एक ही सत्र में एक जैसे प्रश्न को दोबारा नहीं उठाया जाता, पर इस पर अंतिम निर्णय स्पीकर का होता है।

प्रस्ताव पास होने के बाद क्या होता है

प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपते हैं। राष्ट्रपति नई सरकार बनाने की संभावना देखते हैं या लोकसभा भंग करने का विकल्प सामने आ सकता है।

स्रोत: Lok Sabha Digital Library: Motions of Confidence, Constitution of India: Article 75

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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