भारत का संविधान दुनिया के सबसे लंबे लिखित संविधानों में गिना जाता है। संविधान निर्माताओं ने इसे ऐसा बनाया कि समय के साथ जरूरत के हिसाब से इसमें बदलाव किया जा सके, लेकिन इतनी आसानी से भी नहीं कि कोई भी सरकार मनमाने ढंग से इसे बदल दे। संविधान में बदलाव की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गई है। 1950 से अब तक संविधान में सौ से ज्यादा संशोधन हो चुके हैं। यह लेख एक व्याख्या है, जिसमें आसान भाषा में बताया गया है कि संशोधन कैसे होता है और इसकी सीमाएं क्या हैं।
संशोधन के तीन तरीके
संविधान के अलग अलग हिस्सों को बदलने के लिए अलग अलग तरह के बहुमत की जरूरत होती है।
- साधारण बहुमत: कुछ प्रावधान संसद साधारण कानून की तरह बदल सकती है, जैसे नए राज्य बनाना या राज्यों की सीमा बदलना, जो अनुच्छेद 2, 3 और 4 के तहत होता है। तकनीकी रूप से इन्हें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन नहीं माना जाता।
- विशेष बहुमत: संविधान के ज्यादातर हिस्सों में बदलाव के लिए हर सदन में विशेष बहुमत चाहिए।
- विशेष बहुमत और राज्यों की मंजूरी: संघीय ढांचे से जुड़े प्रावधानों के लिए विशेष बहुमत के साथ कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी भी जरूरी है।

विशेष बहुमत क्या है
विशेष बहुमत का मतलब है दो शर्तें एक साथ पूरी होना। पहली, सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत यानी आधे से ज्यादा सदस्य विधेयक के पक्ष में हों। दूसरी, सदन में उपस्थित और वोट देने वाले सदस्यों का कम से कम दो तिहाई हिस्सा पक्ष में वोट दे। यह शर्त लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में अलग अलग पूरी करनी होती है।
किन विषयों पर राज्यों की मंजूरी चाहिए
अनुच्छेद 368 के अनुसार कुछ विषयों में बदलाव के लिए आधे राज्यों का अनुमोदन जरूरी है। इनमें राष्ट्रपति का चुनाव, केंद्र और राज्यों की कार्यपालिका शक्तियों का दायरा, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से जुड़े प्रावधान, केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का बंटवारा, सातवीं अनुसूची, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व और खुद अनुच्छेद 368 शामिल हैं। राज्यों की मंजूरी विधानसभा में साधारण बहुमत से दी जाती है।
यह भी पढ़ें: राष्ट्रपति की शक्तियां: चुनाव कैसे होता है, अध्यादेश, क्षमादान, आपातकाल और संविधान की सीमाएं | लोकसभा चुनाव कैसे होता है: 543 सीटें, 272 का बहुमत, नामांकन से मतगणना और सरकार गठन तक पूरी प्रक्रिया
प्रक्रिया क्या है
संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है, लेकिन राज्य विधानसभाओं में नहीं। इसे मंत्री भी पेश कर सकते हैं और निजी सदस्य भी। विधेयक पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पहले से अनुमति जरूरी नहीं होती। दोनों सदनों से अलग अलग पास होने के बाद, और जरूरत हो तो राज्यों की मंजूरी के बाद, विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है।
संयुक्त बैठक का रास्ता नहीं
साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में मतभेद हो तो राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकते हैं। लेकिन संविधान संशोधन विधेयक के लिए यह रास्ता नहीं है। अगर एक सदन संशोधन विधेयक को पास कर दे और दूसरा उसे नामंजूर कर दे, तो विधेयक गिर जाता है। इसका मतलब है कि संविधान बदलने के लिए दोनों सदनों की अलग अलग सहमति अनिवार्य है।
राष्ट्रपति की भूमिका
1971 के 24वें संशोधन के बाद यह तय हुआ कि संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति को अपनी सहमति देनी ही होगी। वे इसे रोक कर नहीं रख सकते और न ही दोबारा विचार के लिए लौटा सकते हैं। सहमति मिलते ही यह संविधान संशोधन अधिनियम बन जाता है।
मूल ढांचे का सिद्धांत
क्या संसद संविधान के किसी भी हिस्से को बदल सकती है, इस पर लंबी कानूनी बहस हुई। 1973 के केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की पीठ ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसके मूल ढांचे को नष्ट या कमजोर नहीं कर सकती। अदालत ने मूल ढांचे की कोई पूरी सूची नहीं दी, लेकिन बाद के फैसलों में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, न्यायिक समीक्षा, शक्तियों का बंटवारा और कानून का शासन जैसे तत्वों को इसका हिस्सा माना गया। 1980 के मिनर्वा मिल्स फैसले में भी इस सिद्धांत को मजबूत किया गया।
कुछ अहम संशोधन
- पहला संशोधन, 1951: नौवीं अनुसूची जोड़ी गई।
- 42वां संशोधन, 1976: प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े गए।
- 44वां संशोधन, 1978: संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाया गया।
- 73वां और 74वां संशोधन, 1992: पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा।
- 101वां संशोधन, 2016: GST लागू करने का रास्ता।
- 106वां संशोधन, 2023: लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान।
लचीला भी, कठोर भी
भारतीय संविधान को अक्सर लचीला और कठोर दोनों कहा जाता है। कुछ हिस्से आसानी से बदले जा सकते हैं, तो कुछ के लिए राज्यों की सहमति भी चाहिए। अमेरिका जैसे देशों में संविधान संशोधन बहुत कठिन है, जबकि ब्रिटेन में लिखित संविधान ही नहीं है। भारत ने बीच का रास्ता अपनाया है।
संविधान संशोधन किस अनुच्छेद में है
अनुच्छेद 368 में।
क्या संशोधन विधेयक पर संयुक्त बैठक हो सकती है
नहीं।
मूल ढांचे का सिद्धांत किस फैसले से आया
1973 के केशवानंद भारती मामले से।
स्रोत: Legislative Department: Constitution of India, Legislative Department: Constitution amendment acts, Wikipedia: Amendment of the Constitution of India





