संयुक्त राज्य अमेरिका में आज महत्वपूर्ण मिडटर्म चुनाव आयोजित किए जा रहे हैं जो देश की राजनीतिक दिशा को अगले दो वर्षों के लिए निर्धारित करेंगे। ये चुनाव न केवल अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत का फैसला करेंगे, बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वर्तमान लोकप्रियता की भी कड़ी परीक्षा लेंगे। वर्तमान राजनीतिक माहौल में महंगाई, स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती लागत और ईरान के साथ जारी संघर्ष जैसे गंभीर मुद्दे मतदाताओं के निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं। इन चुनावों के परिणामों से यह स्पष्ट होगा कि आने वाले समय में अमेरिका की विधायिका किस प्रकार कार्य करेगी और कैपिटल हिल पर निगरानी की जिम्मेदारी किस दल के पास होगी।

अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में मिडटर्म चुनावों का महत्व
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के ठीक दो साल बाद आयोजित किए जाते हैं। इन चुनावों का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि ये सीधे तौर पर लेजिस्लेटिव ब्रांच यानी विधायिका के स्वरूप को तय करते हैं। इस बार के चुनाव यह तय करेंगे कि हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी अपना नियंत्रण बनाए रख पाएगी या डेमोक्रेट्स सत्ता में वापसी करेंगे। विधायिका के कामकाज की दिशा इन्हीं चुनावों के नतीजों पर निर्भर करती है। यदि राष्ट्रपति की पार्टी संसद में बहुमत खो देती है, तो उनके लिए अपनी नीतियों और कानूनों को पारित कराना अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसलिए इन चुनावों को राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता के जनमत संग्रह के रूप में भी देखा जाता है। इस बार का मुकाबला विशेष रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घटती लोकप्रियता और रिपब्लिकन पार्टी की पकड़ के बीच एक बड़े संघर्ष के रूप में उभर रहा है।
आर्थिक चुनौतियां और विदेश नीति का चुनावी प्रभाव
अमेरिकी मतदाताओं के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता आर्थिक स्थिति और महंगाई है। राष्ट्रपति ट्रंप को इस उम्मीद के साथ चुना गया था कि वे महंगाई पर नियंत्रण पाएंगे, लेकिन वर्तमान में हालात चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। गैस की कीमतें पहले के मुकाबले दोगुनी हो चुकी हैं और डीजल की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके अलावा, लोगों के लिए घर खरीदना और किराया देना भी अब पहले से कहीं अधिक मुश्किल हो गया है। खाने-पीने की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने आम जनता की क्रय शक्ति को प्रभावित किया है। आर्थिक मुद्दों के साथ-साथ विदेश नीति भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गई है। फरवरी में ईरान के साथ शुरू हुआ युद्ध अब तक समाप्त नहीं हुआ है, जिससे जनता में असंतोष बढ़ रहा है। डेमोक्रेट्स इस मुद्दे पर रिपब्लिकन पार्टी को लगातार घेर रहे हैं और लोगों का मानना है कि अमेरिका गलत दिशा में आगे बढ़ रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता और जनमत का रुझान
चुनावों से पहले आए आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है। उनकी जॉब अप्रूवल रेटिंग वर्तमान में लगभग 39 प्रतिशत के स्तर पर है, जबकि 61 प्रतिशत लोग उनके प्रशासन के कामकाज को नापसंद कर रहे हैं। यह असंतोष मुख्य रूप से महंगाई को कम करने में विफलता और ईरान युद्ध के जारी रहने के कारण है। पूर्व में जब भी जनता ने ट्रंप के पक्ष में मतदान किया है, रिपब्लिकन पार्टी को उसका सीधा लाभ मिला है, लेकिन इस बार स्थिति बदली हुई नजर आ रही है। जनता का एक बड़ा वर्ग यह महसूस कर रहा है कि प्रशासन बुनियादी समस्याओं का समाधान करने में प्रभावी साबित नहीं हुआ है। इस गिरती रेटिंग का सीधा असर रिपब्लिकन पार्टी की सीटों पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है, जिससे उनके हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में बहुमत खोने का खतरा पैदा हो गया है।
मतदान सर्वेक्षण और डेमोक्रेट्स की संभावित नीली लहर
विभिन्न चुनावी सर्वेक्षणों और पोल्स में डेमोक्रेट्स के पक्ष में एक बड़ी चुनावी लहर, जिसे ब्लू वेव कहा जा रहा है, दिखाई दे रही है। कुछ विश्वसनीय पोल्स का अनुमान है कि डेमोक्रेट्स हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 250 सीटों तक का आंकड़ा छू सकते हैं। सीनेट में भी उनकी स्थिति पहले की तुलना में काफी मजबूत होती दिख रही है। कुछ महीने पहले तक यह माना जा रहा था कि डेमोक्रेट्स केवल 50 या 51 सीटें ही जीत पाएंगे, लेकिन अब यह अनुमान बढ़कर 53 से 54 सीटों तक पहुंच गया है। हालांकि, इन सर्वेक्षणों के साथ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी जुड़ा है कि रिपब्लिकन समर्थक अक्सर पोल्स में अपनी राय साझा नहीं करते हैं। वे सर्वेक्षणों के दौरान फोन नहीं उठाते या अपनी पसंद गुप्त रखते हैं, जबकि डेमोक्रेट्स समर्थक बड़ी संख्या में इन सर्वेक्षणों में भाग लेते हैं। इसलिए अंतिम परिणामों तक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं कही जा सकती।
रिपब्लिकन पार्टी की विचारधारा और ट्रंप समर्थकों का आधार
रिपब्लिकन पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसकी रूढ़िवादी विचारधारा और अमेरिका फर्स्ट की नीति रही है। पार्टी का स्पष्ट मानना है कि सरकार को व्यापार और कारोबार में न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहिए। इसी एजेंडे के आधार पर उन्होंने 2024 के चुनावों में बड़ी जीत हासिल की थी और व्हाइट हाउस के साथ-साथ संसद के दोनों सदनों में बहुमत प्राप्त किया था। पार्टी के पास आज भी मागा (MAGA) समर्थकों का एक वफादार आधार है जो डोनाल्ड ट्रंप पर अटूट विश्वास रखते हैं। इन समर्थकों का मानना है कि ट्रंप ही अमेरिका की स्थिति में सुधार कर सकते हैं। हालांकि, वर्तमान आर्थिक संकट और रोजगार की कमी ने पार्टी के सामने बड़ी चुनौती पेश की है। जो कीमतें पिछले कार्यकाल में बढ़ी थीं, वे कम नहीं हुई हैं और यही रिपब्लिकन पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरी है।
डेमोक्रेट्स की रणनीति और भविष्य की चुनौतियां
डेमोक्रेट्स इस समय सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने की है। 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के अनुभव से पार्टी ने सीखा है कि केवल सर्वेक्षणों में जीत का अनुमान पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उस समय हिलेरी क्लिंटन के पक्ष में माहौल होने के बावजूद उनके समर्थक वोट डालने नहीं निकले थे। इस बार डेमोक्रेट्स स्वतंत्र मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए अपनी कुछ पुरानी नीतियों में बदलाव करते दिख रहे हैं। पूर्व में ओपन बॉर्डर, इमिग्रेशन और ट्रांसजेंडर नीतियों को लेकर उनकी काफी आलोचना हुई थी, लेकिन इस बार वे इन मुद्दों पर अधिक उदार रुख अपनाने के बजाय सतर्कता बरत रहे हैं। पार्टी को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके समर्थक सर्वेक्षणों के भरोसे घर न बैठें और वास्तविक मतदान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें ताकि वे बहुमत हासिल कर सकें।
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स्रोत: Aaj Tak





