किसी राज्य में विधानसभा चुनाव के नतीजे आते हैं और कोई भी पार्टी या चुनाव से पहले बना गठबंधन बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंचता। ऐसी स्थिति को त्रिशंकु विधानसभा कहा जाता है। इस नाम की प्रेरणा पौराणिक राजा त्रिशंकु की कथा से ली गई है, जो न धरती पर रहे और न स्वर्ग पहुंच सके, बल्कि बीच में लटके रह गए। ठीक वैसे ही जनादेश किसी एक ओर साफ नहीं होता। ऐसे में सरकार कौन बनाएगा, यह फैसला काफी हद तक राज्यपाल और फिर सदन में होने वाले शक्ति परीक्षण पर निर्भर करता है। यह लेख एक व्याख्या है, जिसमें संविधान, अदालत के फैसलों और आयोगों की सिफारिशों के आधार पर पूरी प्रक्रिया समझाई गई है।
बहुमत का गणित
किसी विधानसभा में बहुमत के लिए कुल सीटों के आधे से एक ज्यादा सदस्य चाहिए। जैसे 224 सीटों वाली विधानसभा में 113 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। अगर किसी दल या पहले से बने गठबंधन को इतनी सीटें मिल जाएं, तो सरकार बनाना आसान होता है। लेकिन जब सबसे बड़ी पार्टी भी इस आंकड़े से पीछे रह जाए, तब छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों का समर्थन अहम हो जाता है।

राज्यपाल की भूमिका
संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं। आम तौर पर वे बहुमत वाले दल के नेता को बुलाते हैं, इसलिए यहां उनका विवेक कम होता है। लेकिन त्रिशंकु विधानसभा में राज्यपाल को यह तय करना होता है कि किसे सरकार बनाने का पहला मौका दिया जाए। संविधान में इसके लिए कोई तय क्रम नहीं लिखा है, इसलिए आयोगों की सिफारिशें और अदालत के फैसले मार्गदर्शन करते हैं।
सरकारिया आयोग की सलाह
केंद्र और राज्यों के संबंधों पर बने सरकारिया आयोग ने त्रिशंकु स्थिति के लिए एक क्रम सुझाया था। पहले उस गठबंधन को बुलाया जाए जो चुनाव से पहले बना हो और जिसके पास बहुमत हो। फिर सबसे बड़ी पार्टी को, अगर वह दूसरों के समर्थन से बहुमत का दावा कर सके। उसके बाद चुनाव के बाद बने गठबंधन को, जिसमें सभी दल सरकार में शामिल हों। आखिर में ऐसे गठबंधन को, जिसमें कुछ दल सरकार में शामिल हों और कुछ बाहर से समर्थन दें। बाद में पुंछी आयोग ने भी कुछ ऐसी ही सलाह दी। ये सिफारिशें कानूनन बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन इन्हें अच्छी परंपरा माना जाता है।
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बोम्मई फैसला और फ्लोर टेस्ट
1994 में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने एसआर बोम्मई मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया। अदालत ने कहा कि किसी सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका फैसला राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर होना चाहिए। इसे फ्लोर टेस्ट या शक्ति परीक्षण कहा जाता है। इस फैसले के बाद राज्यपाल किसी को मुख्यमंत्री बनाते समय उसे तय समय के भीतर सदन में बहुमत साबित करने को कहते हैं।
फ्लोर टेस्ट कैसे होता है
फ्लोर टेस्ट में मुख्यमंत्री सदन में विश्वास प्रस्ताव रखते हैं। विधायक ध्वनि मत, हाथ उठाकर, विभाजन यानी डिवीजन या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग से मतदान करते हैं। मतदान की प्रक्रिया स्पीकर या प्रोटेम स्पीकर की देखरेख में होती है। अगर प्रस्ताव पास हो जाए तो सरकार बनी रहती है, वरना मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में जल्दी और पारदर्शी फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश दिए हैं, ताकि विधायकों की खरीद फरोख्त की गुंजाइश कम हो।
दल बदल कानून का असर
त्रिशंकु विधानसभा में दल बदल कानून यानी दसवीं अनुसूची की भूमिका भी अहम हो जाती है। किसी दल के टिकट पर चुना गया विधायक अगर पार्टी के व्हिप के खिलाफ वोट करे, तो उसकी सदस्यता जा सकती है। इसलिए सरकार बनाने के लिए अक्सर पूरे दल का समर्थन लिया जाता है, न कि अलग अलग विधायकों का। निर्दलीय विधायक इस कानून के तहत अपनी मर्जी से समर्थन दे सकते हैं, लेकिन वे किसी पार्टी में शामिल हों तो सदस्यता पर सवाल उठ सकता है।
अगर कोई सरकार न बन पाए
अगर कोई भी दल या गठबंधन बहुमत साबित न कर सके, तो राज्यपाल केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेज सकते हैं। इसके आधार पर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। राष्ट्रपति शासन के दौरान विधानसभा को निलंबित रखा जा सकता है या भंग किया जा सकता है। भंग होने पर नए चुनाव कराए जाते हैं। बोम्मई फैसले के बाद राष्ट्रपति शासन की घोषणा की अदालत में समीक्षा हो सकती है।
गठबंधन सरकारों का दौर
भारत में राज्यों और केंद्र दोनों स्तर पर कई बार त्रिशंकु नतीजे आए हैं। केंद्र में 1989 से 2014 तक के कई चुनावों में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला और गठबंधन सरकारें बनीं। राज्यों में भी कई बार सबसे बड़ी पार्टी को पहले मौका मिला, लेकिन वह बहुमत साबित नहीं कर सकी और बाद में दूसरे गठबंधन की सरकार बनी। ऐसे मौकों पर राज्यपाल के फैसलों पर अक्सर राजनीतिक बहस भी होती है।
त्रिशंकु विधानसभा का मतलब क्या है
जब किसी दल या चुनाव पूर्व गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिले।
मुख्यमंत्री को कौन नियुक्त करता है
राज्यपाल, अनुच्छेद 164 के तहत।
फ्लोर टेस्ट क्यों जरूरी है
बोम्मई फैसले के अनुसार बहुमत का फैसला सदन में ही होना चाहिए।
सरकार न बने तो क्या होता है
राष्ट्रपति शासन लग सकता है या नए चुनाव हो सकते हैं।
स्रोत: Legislative Department: Constitution of India, Inter State Council: Sarkaria Commission Report, Supreme Court of India





