संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन यानी UNFCCC के सदस्य देशों का 31वां सालाना सम्मेलन, जिसे COP31 कहा जाता है, इस बार तुर्किये के भूमध्यसागरीय शहर अंताल्या में होगा। UNFCCC के मुताबिक मुख्य सम्मेलन 9 से 20 नवंबर 2026 तक चलेगा। इससे पहले 2 से 8 नवंबर के बीच तैयारी बैठकें होंगी और 11-12 नवंबर को राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों का सत्र रखा गया है। सम्मेलन की अध्यक्षता तुर्किये के पर्यावरण, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री मूरत कुरुम करेंगे।
COP क्या होता है
COP का मतलब है कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज, यानी उन देशों का सम्मेलन जिन्होंने 1992 में अपनाए गए UNFCCC पर हस्ताक्षर किए हैं। यह संधि रियो डी जनेरियो के पृथ्वी सम्मेलन में तैयार हुई थी और इसका पहला सम्मेलन 1995 में बर्लिन में हुआ। तब से हर साल दुनिया के लगभग सभी देश इसमें मिलकर तय करते हैं कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कैसे घटाया जाए और जलवायु परिवर्तन के असर से कैसे निपटा जाए।

अब तक के बड़े पड़ाव
- 1997, क्योटो: विकसित देशों के लिए उत्सर्जन घटाने के बाध्यकारी लक्ष्य वाला क्योटो प्रोटोकॉल
- 2015, पेरिस: पेरिस समझौता, जिसमें वैश्विक तापमान बढ़ोतरी को 2 डिग्री से काफी नीचे रखने और 1.5 डिग्री तक सीमित करने की कोशिश का लक्ष्य तय हुआ
- 2021, ग्लासगो: कोयले के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से घटाने पर सहमति
- 2023, दुबई: पहला ग्लोबल स्टॉकटेक, जीवाश्म ईंधन से दूर जाने की बात पहली बार फैसले में आई
- 2024, बाकू: जलवायु वित्त का नया सामूहिक लक्ष्य
- 2025, बेलेम: ब्राजील के अमेजन क्षेत्र में COP30
इस बार किन मुद्दों पर नजर
राष्ट्रीय योजनाएं
पेरिस समझौते के तहत हर देश को अपने उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान यानी NDC कहा जाता है, समय-समय पर अपडेट करने होते हैं। COP31 में इन योजनाओं की महत्वाकांक्षा और उन पर अमल की समीक्षा अहम रहेगी।
जलवायु वित्त
विकासशील देश लगातार कहते रहे हैं कि उत्सर्जन घटाने और जलवायु के असर से बचाव के लिए उन्हें विकसित देशों से पर्याप्त पैसा और तकनीक चाहिए। वित्त का वादा और उसकी असल डिलीवरी हर COP का सबसे विवादित मुद्दा रहता है।
अनुकूलन और नुकसान
बाढ़, सूखा, लू और समुद्र स्तर बढ़ने जैसे खतरों से निपटने के लिए अनुकूलन पर वैश्विक लक्ष्य और जलवायु आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई के लिए बने कोष पर भी बात होगी।
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फैसले कैसे होते हैं
COP में फैसले आम तौर पर सर्वसम्मति से होते हैं, यानी लगभग 200 देशों को किसी एक मसौदे पर सहमत होना पड़ता है। इसी वजह से वार्ताएं अक्सर तय समय से आगे खिंच जाती हैं और आखिरी रात तक शब्दों पर खींचतान चलती है। देश अपने हितों के हिसाब से समूह बनाकर बात करते हैं, जैसे विकासशील देशों का G77 और चीन समूह, छोटे द्वीपीय देशों का समूह और समान सोच वाले विकासशील देशों का समूह। भारत इन मंचों के जरिए भी अपनी बात रखता है। सम्मेलन के दौरान सरकारी प्रतिनिधियों के अलावा वैज्ञानिक, कारोबारी, नागरिक संगठन और युवा कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
आयोजन की खास व्यवस्था
COP की मेजबानी क्षेत्रीय समूहों के बीच बारी-बारी से घूमती है। 2026 की मेजबानी के लिए तुर्किये और ऑस्ट्रेलिया दोनों दावेदार थे। समझौते के तहत तुर्किये को मेजबानी और अध्यक्षता मिली, जबकि वार्ताओं के संचालन में ऑस्ट्रेलिया की अहम भूमिका तय हुई और प्रशांत क्षेत्र के देशों से जुड़ा एक प्री-COP कार्यक्रम रखा गया। यह व्यवस्था अपने आप में अनोखी मानी जा रही है।
भारत का रुख
भारत COP वार्ताओं में विकासशील देशों की प्रमुख आवाज रहा है। भारत का कहना रहा है कि जलवायु संकट के लिए ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार विकसित देशों को उत्सर्जन घटाने में आगे रहना चाहिए और विकासशील देशों को वित्त व तकनीक देनी चाहिए। यह सिद्धांत साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारी के नाम से जाना जाता है। भारत ने 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया है और अपनी NDC में गैर-जीवाश्म स्रोतों से बिजली क्षमता बढ़ाने जैसे लक्ष्य रखे हैं। इंटरनेशनल सोलर अलायंस और मिशन लाइफ यानी पर्यावरण के लिए जीवनशैली जैसी पहल भी भारत ने आगे बढ़ाई हैं।
आम लोगों के लिए क्यों मायने रखता है
जलवायु परिवर्तन का असर अब रोजमर्रा की जिंदगी में दिखने लगा है। बेमौसम बारिश से फसल खराब होना, गर्मियों में लू के दिन बढ़ना और पहाड़ों में भूस्खलन की घटनाएं इसकी मिसाल हैं। COP में होने वाले फैसले आगे चलकर ऊर्जा, परिवहन, खेती और उद्योग से जुड़ी नीतियों पर असर डालते हैं, जिसका सीधा संबंध बिजली के दाम, रोजगार और खाद्य सुरक्षा से है।
COP31 कहां और कब हो रहा है
COP31 तुर्किये के अंताल्या में 9 से 20 नवंबर 2026 तक होगा।
COP32 कहां होगा
अगले सम्मेलनों की मेजबानी के फैसले UNFCCC की प्रक्रिया से होते हैं। ताजा जानकारी के लिए UNFCCC की आधिकारिक वेबसाइट देखें।
स्रोत: UNFCCC: COP31, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय





