फ्रांस में बढ़ती महंगाई और सरकारी सेवाओं में गिरावट के विरोध में शनिवार को देश भर में लगभग 3.2 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से मार्च का रास्ता बदल दिया, जिस पर सर्वोच्च प्रशासनिक अदालत ने भी अपनी मुहर लगाई और ट्रेड यूनियनों की याचिका खारिज कर दी। प्रदर्शन के दौरान ल्योन और टूलूज में पुलिस को भीड़ हटाने के लिए आंसू गैस के गोले दागने पड़े, जबकि छात्रों ने अगले हफ्ते स्कूल और विश्वविद्यालय बंद करने की चेतावनी दी है। दूसरी तरफ, अमेरिका के अटलांटा में जी-20 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक भी रूस और यूक्रेन युद्ध पर उपजे मतभेदों के चलते बिना किसी संयुक्त बयान के खत्म हो गई।

महंगाई और सरकारी सेवाओं के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन
फ्रांस के विभिन्न हिस्सों में शनिवार को आम नागरिकों ने बढ़ती महंगाई और खराब होती सार्वजनिक सेवाओं को लेकर बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। सरकारी स्तर पर जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन में लगभग 3.2 लाख लोगों ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई। यह प्रदर्शन जनता के बीच बढ़ती आर्थिक चिंताओं और नागरिक सुविधाओं की स्थिति को लेकर आयोजित किया गया था। हालांकि आधिकारिक आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि पिछले दो हफ्तों की तुलना में इस बार सड़कों पर उतरने वाले प्रदर्शनकारियों की संख्या में कमी देखी गई है।
प्रदर्शनकारियों की संख्या के संबंध में सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 17 अक्टूबर को देश भर में आयोजित प्रदर्शन में 5 लाख से अधिक नागरिक शामिल हुए थे। इसके बाद 24 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों में यह संख्या घटकर 4.1 लाख रह गई थी, और अब शनिवार को यह आंकड़ा घटकर 3.2 लाख पर आ गया। दूसरी ओर, आंदोलन के आयोजकों ने सरकारी आंकड़ों को स्वीकार नहीं किया है। आयोजकों का कहना है कि प्रदर्शन में भाग लेने वाले लोगों की वास्तविक संख्या सरकार द्वारा जारी आंकड़ों की तुलना में कहीं अधिक थी।
पेरिस में मार्च के रास्ते पर कानूनी विवाद और अदालत का रुख
फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी प्रदर्शन का व्यापक असर देखने को मिला, जहां गृह मंत्रालय के अनुसार लगभग 70 हजार लोग मार्च में शामिल हुए। राजधानी में मार्च के मार्ग को लेकर प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच अंतिम समय तक अदालत में कानूनी लड़ाई चलती रही। पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन मार्च को शहर के मुख्य केंद्र से दूर रखने का फैसला किया था। ट्रेड यूनियनों ने इस प्रशासनिक निर्णय का विरोध किया और इसके खिलाफ देश की शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
ट्रेड यूनियनें पेरिस के दो प्रमुख और ऐतिहासिक चौकों, नेशन और बास्टिल के बीच पारंपरिक रास्ते पर मार्च निकालना चाहती थीं। हालांकि, फ्रांस की सर्वोच्च प्रशासनिक अदालत ने ट्रेड यूनियनों की अपील को खारिज कर दिया और दोनों चौकों के बीच मार्च पर लगी रोक को पूरी तरह बरकरार रखा। अदालत के इस फैसले के बाद प्रशासन ने मार्च के लिए पेरिस के पूर्वी इलाके से गुजरने वाले मार्ग को मंजूरी प्रदान की। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य यह था कि सरकारी भवनों, प्रमुख पर्यटन स्थलों और बड़े बाजारों के पास किसी भी प्रकार के तनाव अथवा हिंसा के खतरे को रोका जा सके।
सुरक्षाबलों की तैनाती, ल्योन और टूलूज में आंसू गैस का प्रयोग
फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान कई जगहों पर दंगे और लूटपाट की घटनाएं सामने आई थीं। उसी घटनाक्रम से सबक लेते हुए शनिवार को प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए थे। पूरे देश में संवेदनशील स्थानों और प्रदर्शन वाले मार्गों पर भारी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई थी ताकि कानून व्यवस्था बनी रहे। अधिकांश शहरों में शनिवार दोपहर तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ते रहे, लेकिन कुछ स्थानों पर स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
ल्योन और टूलूज शहरों में पुलिस को भीड़ को हटाने और तितर बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागने पड़े। इसके साथ ही मार्सिले शहर में भी मार्च के अंतिम चरण में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। महंगाई के खिलाफ यह आक्रोश केवल फ्रांस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पड़ोसी देश इटली में भी हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। इटली में भी महंगाई के विरोध में हुए इन प्रदर्शनों के दौरान आगजनी की घटनाएं हुईं और पुलिस के साथ प्रदर्शनकारियों की झड़प देखने को मिली।
छात्रों की तालाबंदी की चेतावनी और जी-20 में गतिरोध
पेरिस के मुख्य केंद्र से मार्च को दूर रखे जाने के प्रशासनिक फैसले से छात्र समुदाय में गहरा रोष फैल गया। छात्र प्रदर्शनकारियों ने अदालत और प्रशासन के इस रुख की कड़ी निंदा की। छात्रों ने अपने असंतोष को आगे बढ़ाते हुए घोषणा की है कि वे अगले हफ्ते देश भर के हाई स्कूलों और विश्वविद्यालयों को बंद कराएंगे और रास्तों को जाम करने की दिशा में कदम उठाएंगे। छात्रों की इस चेतावनी के बाद आने वाले दिनों में शैक्षणिक संस्थानों में व्यापक असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
एक ओर जहां फ्रांस में आंतरिक सामाजिक और आर्थिक असंतोष का माहौल दिखा, वहीं दूसरी ओर वैश्विक कूटनीति के मोर्चे पर भी गतिरोध सामने आया। अमेरिका के अटलांटा शहर में जी-20 देशों के विदेश मंत्रियों का एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित किया गया था। यह अंतरराष्ट्रीय बैठक बिना किसी संयुक्त बयान के ही समाप्त हो गई। सदस्य देशों के बीच रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध तथा अन्य प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर गहरे मतभेद बने रहे, जिसके कारण किसी साझा सहमति पर नहीं पहुंचा जा सका।
स्रोत: Amar Ujala, Aaj Tak





