Tata Trusts vs Tata Sons: भारत के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक व्यावसायिक घराने टाटा समूह के शीर्ष नेतृत्व को लेकर छिड़ा आंतरिक विवाद अब अभूतपूर्व विधिक और कॉरपोरेट संकट में तब्दील हो गया है। समूह की परोपकारी शाखा और मूल प्रवर्तक ‘टाटा ट्रस्ट्स’ ने होल्डिंग कंपनी ‘टाटा संस’ के कार्यकारी चेयरमैन पद पर एन. चंद्रशेखरन के पांच साल के नए कार्यकाल के लिए किए गए पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव की वैधता को औपचारिक रूप से चुनौती दे दी है। टाटा ट्रस्ट्स का स्पष्ट तर्क है कि 17 सितंबर 2026 को आयोजित बोर्ड बैठक में लिया गया फैसला कंपनी के अंतर्नियमों यानी आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AoA) में निर्धारित विशेष विधिक शर्तों का खुला उल्लंघन करता है।
विवाद का केंद्र 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में हुआ 4-1 का मतदान परिणाम है। बोर्ड के चार निदेशकों ने चंद्रशेखरन को 20 फरवरी 2027 से अगले पांच वर्षों के लिए पुनः कमान सौंपने के पक्ष में मतदान किया, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष और बोर्ड सदस्य नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया। टाटा संस प्रबंधन जहां इसे सामान्य बोर्ड बहुमत का वैध निर्णय मान रहा है, वहीं टाटा ट्रस्ट्स का विधिक पक्ष यह है कि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के तहत ट्रस्ट द्वारा नामित निदेशकों की पृथक और अनिवार्य सहमति के बिना यह प्रस्ताव विधि सम्मत नहीं हो सकता।
Tata Trusts vs Tata Sons: टाटा ट्रस्ट्स की 66 प्रतिशत हिस्सेदारी और वीटो का अधिकार
इस समूचे विवाद में टाटा ट्रस्ट्स की विधिक स्थिति असाधारण रूप से मजबूत मानी जाती है क्योंकि समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस में ट्रस्ट्स की सम्मिलित हिस्सेदारी लगभग 66 प्रतिशत है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के तत्वावधान में संचालित यह ट्रस्ट केवल सामान्य शेयरधारक नहीं हैं, बल्कि उनके पास कंपनी के प्रमुख नीतिगत, वित्तीय और नेतृत्व संबंधी निर्णयों में वीटो अधिकार (Affirmative Voting Rights) निहित हैं।
टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुच्छेद 104बी और 121 के तहत बोर्ड में ट्रस्ट द्वारा नामित निदेशकों (Trust-Nominated Directors) की विशेष भूमिका निर्धारित की गई है। वर्तमान में नौ सदस्यीय बोर्ड में ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशक मौजूद हैं। ट्रस्ट का तर्क है कि चेयरमैन के चयन, नियुक्ति या सेवा विस्तार से जुड़े किसी भी प्रस्ताव के पारित होने के लिए संपूर्ण बोर्ड के बहुमत के साथ-साथ ट्रस्ट के दोनों नामित निदेशकों की सहमति अनिवार्य है। जब दो में से एक नामित निदेशक—नोएल टाटा—ने विरोध में वोट दिया, तो विधिक रूप से नामित निदेशकों का बहुमत शून्य हो गया क्योंकि दो सदस्यों की समिति में सर्वसम्मत या दोनों की सहमति ही प्रभावी मानी जा सकती है।
अगस्त में त्यागपत्र की घोषणा और सितंबर का नाटकीय यू-टर्न
एन. चंद्रशेखरन का वर्तमान दूसरा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होने वाला है। इस पृष्ठभूमि में अगस्त 2026 में चंद्रशेखरन ने स्वयं बोर्ड और ट्रस्ट को सूचित किया था कि वह अपना वर्तमान कार्यकाल पूर्ण होने के पश्चात सेवा विस्तार के इच्छुक नहीं हैं और सेवानिवृत्ति लेना चाहते हैं। 12 अगस्त को टाटा ट्रस्ट्स ने उनके इस व्यक्तिगत निर्णय को स्वीकार करते हुए समूह के सुचारु संचालन हेतु उत्तराधिकारी चयन समिति (Selection Committee) गठित करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी थी।
घटनाक्रम में अप्रत्याशित मोड़ तब आया जब सितंबर के प्रथम पखवाड़े में टाटा संस की नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति (NRC) ने चंद्रशेखरन से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने का विशेष आग्रह किया। समिति ने समूह के व्यापारिक विस्तार, सेमीकंडक्टर, एयर इंडिया के एकीकरण और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उनके रणनीतिक योगदान की दुहाई देते हुए उन्हें पद पर बने रहने की सिफारिश की। इसके उपरांत 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में अचानक पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव पटल पर रख दिया गया, जिस पर नोएल टाटा ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।
चेयरमैन के कास्टिंग वोट और सामान्य बहुमत पर कानूनी टकराव
टाटा संस के बोर्ड ने बैठक में 4-1 के अंकगणित के आधार पर प्रस्ताव को पारित घोषित किया था और मत बराबर होने की स्थिति में चेयरमैन के निर्णायक मत (Casting Vote) के अधिकार का संदर्भ लिया था। इसके प्रत्युत्तर में टाटा ट्रस्ट्स ने कड़ा विधिक रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि चेयरमैन का कास्टिंग वोट केवल साधारण व्यावसायिक मामलों में और बोर्ड के समग्र स्तर पर टाई होने की स्थिति में ही उपयोग किया जा सकता है।
ट्रस्ट्स का कहना है कि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन द्वारा ट्रस्ट-नामित निदेशकों को प्रदत्त ‘सकारात्मक मतदान अधिकार’ (Affirmative Rights) एक स्वतंत्र सुरक्षात्मक व्यवस्था है। बोर्ड का कोई भी सामान्य संख्यात्मक बहुमत ट्रस्ट्स के इस अंतर्निहित अधिकार को निष्प्रभावी नहीं कर सकता। यदि दो नामित निदेशकों में से एक भी असहमति व्यक्त करता है, तो वह प्रस्ताव विधिक कसौटी पर विफल हो जाता है।
साइरस मिस्त्री विवाद और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय की नजीर
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने आधिकारिक पक्ष के समर्थन में ऐतिहासिक साइरस मिस्त्री विवाद का विशेष रूप से उल्लेख किया है। वर्ष 2016 में जब तत्कालीन चेयरमैन साइरस मिस्त्री को पद से हटाया गया था, तब टाटा संस ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय अधिकरण (NCLAT) और तत्पश्चात देश की सर्वोच्च अदालत में यही तर्क दिया था कि टाटा संस के आर्टिकल्स 104बी और 121 के तहत ट्रस्ट के नामित निदेशकों के विशेष अधिकार निरपेक्ष और सर्वोपरि हैं।
मार्च 2021 में उच्चतम न्यायालय ने टाटा संस के इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार करते हुए ट्रस्ट्स के विशेष अधिकारों और कंपनी के अंतर्नियमों की सर्वोच्चता पर मुहर लगाई थी। टाटा ट्रस्ट्स का वर्तमान विधिक तर्क यह है कि जिस न्यायिक व्यवस्था और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की धाराओं का उपयोग टाटा संस ने पहले अपने बचाव में किया था, आज उसी कंपनी का बोर्ड अपने ही अंतर्नियमों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित नियमों की अनदेखी नहीं कर सकता।
आरबीआई सीआईसी नियम और टाटा संस की संभावित लिस्टिंग का दबाव
शीर्ष नेतृत्व का यह घमासान ऐसे नाजुक मोड़ पर उभरा है जब टाटा संस पर विनियामक नियमों के अनुपालन की तलवार लटक रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के स्केल-बेस्ड रेगुलेशन के अंतर्गत टाटा संस को ‘अपर लेयर’ कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसके तहत कंपनी के लिए शेयर बाजारों में सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध (IPO) होना विधिक रूप से अनिवार्य माना गया है।
टाटा संस ने आरबीआई से सीआईसी पंजीकरण वापस लेने और अनलिस्टेड रहने की छूट मांगी थी, किंतु सितंबर 2026 में केंद्रीय बैंक ने इस आवेदन को खारिज कर दिया। इस विनियामक स्थिति के चलते टाटा संस के सम्मुख अपनी ऋण संरचना को पुनर्गठित करने अथवा आईपीओ लाने का कड़ा दबाव है। 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में भी लिस्टिंग दिशानिर्देशों पर चर्चा हुई थी। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर 66 प्रतिशत के मुख्य शेयरधारक ट्रस्ट्स और कार्यकारी बोर्ड के मध्य मतभेद समूह की भविष्य की रणनीतिक योजनाओं को अनिश्चितता के भंवर में डाल सकता है।
Tata Trusts vs Tata Sons: निष्कर्ष
टाटा संस में एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर उत्पन्न यह विवाद केवल एक व्यक्ति के पद पर बने रहने का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह कॉरपोरेट गवर्नेंस, अंतर्नियमों (AoA) की विधिक बाध्यता और 66 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले मुख्य प्रवर्तक ट्रस्ट्स के अधिकारों की पुनः परीक्षा है। बोर्ड के 4-1 बहुमत और ट्रस्ट-नामित निदेशकों के वीटो अधिकार के बीच का यह टकराव देश के सबसे प्रतिष्ठित व्यापारिक साम्राज्य को एक नए दोराहे पर ले आया है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि क्या यह विवाद वार्ता की मेज पर सुलझता है अथवा एक बार फिर देश की अदालतें टाटा समूह के सर्वोच्च नेतृत्व की दिशा तय करेंगी।
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