दिवाली पर घर के मुख्य द्वार पर, नए बही खाते के पहले पन्ने पर, गृह प्रवेश या किसी भी शुभ काम की शुरुआत में स्वस्तिक का चिह्न बनाया जाता है। यह भारत के सबसे प्राचीन और लोकप्रिय शुभ प्रतीकों में से एक है। इस लेख में जानिए स्वस्तिक का अर्थ, इसका इतिहास और अलग अलग परंपराओं में इसका महत्व।
स्वस्तिक शब्द का अर्थ
विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार स्वस्तिक संस्कृत शब्द है। यह सु और अस्ति से मिलकर बना है। सु का अर्थ है अच्छा या शुभ और अस्ति का अर्थ है है या होना। यानी स्वस्तिक का भाव है कल्याण हो, शुभ हो। वेदों और प्राचीन साहित्य में स्वस्ति शब्द स्वास्थ्य, सौभाग्य, सफलता और समृद्धि के अर्थ में बार बार आता है और इसका इस्तेमाल अभिवादन के रूप में भी होता था।

सबसे पुराना उल्लेख
विकिपीडिया के अनुसार स्वस्तिक शब्द का सबसे पुराना ज्ञात उपयोग पाणिनि की अष्टाध्यायी में मिलता है। वहां इसका जिक्र संस्कृत व्याकरण का एक नियम समझाने के लिए गाय के कान पर लगाए जाने वाले पहचान चिह्न के संदर्भ में हुआ है। पाणिनि ईसा पूर्व चौथी सदी या उससे पहले हुए।
सूर्य का प्रतीक
19वीं सदी के संस्कृत विद्वान मोनियर मोनियर विलियम्स के अनुसार ज्यादातर विद्वान मानते हैं कि स्वस्तिक मूल रूप से सूर्य का प्रतीक था। यह कल्याण, सौभाग्य और शुभता का संकेत देता है।
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हिंदू परंपरा में स्वस्तिक
हिंदू परंपरा में दाईं ओर मुड़ी भुजाओं वाला स्वस्तिक शुभता, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। पूजा, विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और दिवाली जैसे अवसरों पर इसे रोली, कुमकुम या हल्दी से बनाया जाता है। व्यापारी नए साल के बही खाते की शुरुआत स्वस्तिक बनाकर करते हैं। कई जगह स्वस्तिक की चारों भुजाओं के बीच चार बिंदु भी बनाए जाते हैं।
जैन धर्म में स्वस्तिक
जैन परंपरा में स्वस्तिक का खास स्थान है। विकिपीडिया के अनुसार यह जैन ध्वज का हिस्सा है और सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का प्रतीक चिह्न है। जैन मंदिरों में पूजा के दौरान चावल से स्वस्तिक बनाने की परंपरा भी है।
बौद्ध धर्म में स्वस्तिक
बौद्ध प्रतीकों में स्वस्तिक भगवान बुद्ध के शुभ पदचिह्नों का प्रतीक माना जाता है। एशिया के कई देशों में बौद्ध मंदिरों और कलाकृतियों में यह चिह्न दिखाई देता है।
दुनिया भर में स्वस्तिक
विकिपीडिया के अनुसार स्वस्तिक यूरेशिया की कई संस्कृतियों और धर्मों में हजारों साल से इस्तेमाल होता रहा है, और अफ्रीका तथा अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। 1930 के दशक तक पश्चिमी दुनिया में भी इसे शुभ और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता था। बाद में जर्मनी की नाजी पार्टी ने इसके एक रूप को अपना प्रतीक बना लिया, जिसके कारण पश्चिमी देशों में इसकी छवि बदल गई। भारत और एशिया की धार्मिक परंपराओं में यह आज भी शुभता का प्रतीक है।
स्वस्तिक कैसे बनाएं
प्रचलित परंपरा के अनुसार:
- पहले एक धन का चिह्न बनाएं, जिसकी खड़ी और पड़ी रेखाएं बराबर हों।
- हर भुजा के सिरे से एक ही दिशा में घड़ी की सुई की तरह रेखा मोड़ें।
- चारों खानों में एक एक बिंदु लगाएं।
- इसे रोली, कुमकुम, हल्दी या चावल से बनाया जा सकता है।
कहां बनाया जाता है
- घर के मुख्य द्वार पर
- पूजा स्थान और कलश पर
- नए बही खाते और तिजोरी पर
- वाहन और नई खरीदी गई चीजों पर
- विवाह और दूसरे संस्कारों के मंडप में
दिवाली और बही खाता
दिवाली के आसपास व्यापारी वर्ग में नए बही खाते की पूजा की परंपरा है। इसमें बही के पहले पन्ने पर रोली से स्वस्तिक बनाया जाता है और शुभ लाभ लिखा जाता है। कई परिवार दिवाली पर घर की चौखट, तिजोरी और पूजा स्थल पर भी स्वस्तिक बनाते हैं। इसे नए काम की शुभ शुरुआत का संकेत माना जाता है।
स्वस्तिक और गणेश पूजा
लोक परंपरा में स्वस्तिक को भगवान गणेश से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि किसी भी शुभ काम की शुरुआत में गणेश पूजा की जाती है और उसी समय स्वस्तिक भी बनाया जाता है। कलश स्थापना के समय कलश पर स्वस्तिक बनाना भी आम परंपरा है।
सही दिशा का ध्यान
हिंदू परंपरा में शुभ कामों के लिए दाईं ओर मुड़ी भुजाओं वाला स्वस्तिक बनाया जाता है। विकिपीडिया के अनुसार बाईं ओर मुड़ी भुजाओं वाले रूप को कभी कभी सौवस्तिक कहा जाता है, जिसे कुछ परंपराओं में रात्रि या तांत्रिक पक्ष से जोड़ा जाता है।
स्वस्तिक शब्द का अर्थ क्या है
सु यानी अच्छा और अस्ति यानी है, यानी कल्याण हो।
जैन धर्म में स्वस्तिक किसका प्रतीक है
सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का।
स्वस्तिक का सबसे पुराना उल्लेख कहां मिलता है
पाणिनि की अष्टाध्यायी में।
स्वस्तिक किससे बनाया जाता है
रोली, कुमकुम, हल्दी या चावल से।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। डेमोक्रेटिक भारत लाइव इनकी पुष्टि नहीं करता।





