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राज्य पुनर्गठन 1956: फजल अली आयोग, भाषा के आधार पर नए राज्य, पोट्टी श्रीरामुलु का अनशन और 1 नवंबर 1956 का नया नक्शा

1 नवंबर 1956 को भारत का राजनीतिक नक्शा बदल गया। जानिए राज्य पुनर्गठन की पूरी कहानी, आसान भाषा में।

भारत के पुराने नक्शे और दस्तावेजों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • आज भारत के ज्यादातर राज्यों की सीमाएं मोटे तौर पर भाषा के आधार पर बनी हैं।
  • आजादी से पहले ही कांग्रेस ने भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन का समर्थन किया था और 1920 के दशक में अपनी प्रांतीय समितियां भाषा के आधार पर बनाई थीं।
  • आंध्र के बाद दूसरे क्षेत्रों से भी ऐसी मांगें तेज हुईं। दिसंबर 1953 में केंद्र सरकार ने राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया।
  • इस पुनर्गठन में हैदराबाद रियासत के तेलुगु भाषी इलाके आंध्र राज्य से मिलाकर आंध्र प्रदेश बनाया गया।

आज भारत के ज्यादातर राज्यों की सीमाएं मोटे तौर पर भाषा के आधार पर बनी हैं। लेकिन आजादी के समय ऐसा नहीं था। तब देश में अंग्रेजों के दौर के प्रांत और सैकड़ों रियासतों से बने राज्य थे, जिनकी सीमाएं प्रशासनिक सुविधा या इतिहास के हिसाब से थीं। एक ही प्रांत में कई भाषाएं बोलने वाले लोग थे और एक ही भाषा बोलने वाले लोग कई प्रांतों में बंटे थे। इसी को बदलने के लिए 1956 में राज्य पुनर्गठन हुआ, जिसने 1 नवंबर 1956 को भारत का नक्शा बदल दिया। यह लेख एक व्याख्या है, जिसमें बताया गया है कि राज्य पुनर्गठन क्यों और कैसे हुआ।

आजादी के समय की स्थिति

संविधान लागू होने पर भारत के राज्यों को चार श्रेणियों में बांटा गया था। भाग A में पुराने ब्रिटिश प्रांत थे, जैसे बंबई, मद्रास और उत्तर प्रदेश। भाग B में बड़ी रियासतों से बने राज्य थे, जैसे हैदराबाद, मैसूर और राजस्थान। भाग C में छोटे राज्य थे, जिन्हें केंद्र से चलाया जाता था, जैसे दिल्ली, भोपाल और अजमेर। भाग D में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह थे। यह व्यवस्था जटिल थी और भाषा के आधार पर राज्यों की मांग लगातार उठ रही थी।

मुख्य बातें: भारत के पुराने नक्शे और दस्तावेजों का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

भाषाई राज्यों की मांग

आजादी से पहले ही कांग्रेस ने भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन का समर्थन किया था और 1920 के दशक में अपनी प्रांतीय समितियां भाषा के आधार पर बनाई थीं। लेकिन बंटवारे के बाद देश की एकता को लेकर चिंता बढ़ी। 1948 में बने एसके धर आयोग ने भाषा के आधार पर पुनर्गठन के खिलाफ राय दी। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया की जेवीपी समिति ने भी फिलहाल इसे टालने की सलाह दी।

पोट्टी श्रीरामुलु का अनशन

मद्रास प्रांत के तेलुगु भाषी इलाकों में अलग आंध्र राज्य की मांग सबसे तेज थी। गांधीवादी नेता पोट्टी श्रीरामुलु ने इस मांग के लिए अक्टूबर 1952 में आमरण अनशन शुरू किया। 58 दिन के अनशन के बाद 15 दिसंबर 1952 को उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद आंध्र क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। केंद्र सरकार ने अलग आंध्र राज्य बनाने की घोषणा की और 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य बना, जिसकी राजधानी कुरनूल थी। यह भाषा के आधार पर बना पहला बड़ा राज्य माना जाता है।

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फजल अली आयोग

आंध्र के बाद दूसरे क्षेत्रों से भी ऐसी मांगें तेज हुईं। दिसंबर 1953 में केंद्र सरकार ने राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया। इसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति सैयद फजल अली थे और सदस्य हृदयनाथ कुंजरू और केएम पणिक्कर थे। आयोग ने देश भर में घूमकर लोगों से राय ली और 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट दी। आयोग ने भाषा को राज्य बनाने का एक अहम आधार माना, लेकिन यह भी कहा कि देश की एकता, प्रशासनिक और आर्थिक सुविधा और राष्ट्रीय सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। आयोग ने ‘एक भाषा एक राज्य’ के सिद्धांत को पूरी तरह नहीं माना।

राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956

आयोग की रिपोर्ट के आधार पर संसद ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 पास किया, जो 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ। इसी के साथ संविधान का सातवां संशोधन भी लागू हुआ, जिसने भाग A, B, C और D की व्यवस्था खत्म कर दी। अब देश में सिर्फ दो तरह की इकाइयां रहीं, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश। कुल 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए।

क्या क्या बदला

इस पुनर्गठन में हैदराबाद रियासत के तेलुगु भाषी इलाके आंध्र राज्य से मिलाकर आंध्र प्रदेश बनाया गया। मालाबार और त्रावणकोर कोचीन को मिलाकर केरल बना। मैसूर राज्य में कन्नड़ भाषी इलाके जोड़े गए, जिसे 1973 में कर्नाटक नाम दिया गया। मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल और पुराने मध्य प्रदेश के हिस्सों को मिलाकर नया मध्य प्रदेश बना। बंबई राज्य को बड़ा किया गया, जिसमें मराठी और गुजराती दोनों भाषी इलाके शामिल थे।

बाद के बदलाव

बंबई राज्य को लेकर संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन और महागुजरात आंदोलन चले। आखिरकार 1 मई 1960 को बंबई राज्य को महाराष्ट्र और गुजरात में बांटा गया। 1966 में पंजाब को बांटकर हरियाणा बनाया गया और कुछ हिस्से हिमाचल प्रदेश में गए। बाद के दशकों में भी नए राज्य बने, जैसे पूर्वोत्तर के राज्य, 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ और 2014 में तेलंगाना। इनमें कई बार भाषा के अलावा क्षेत्रीय पहचान, विकास और प्रशासन भी आधार बने।

नए राज्य कैसे बनते हैं

संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद कानून बनाकर नए राज्य बना सकती है, राज्यों की सीमाएं और नाम बदल सकती है। ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश से ही पेश होता है और राष्ट्रपति संबंधित राज्य की विधानसभा की राय लेते हैं। लेकिन विधानसभा की राय मानना संसद के लिए जरूरी नहीं है। आज भी 1 नवंबर को कई राज्य अपना स्थापना दिवस मनाते हैं, जैसे कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पंजाब।

राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष कौन थे

न्यायमूर्ति सैयद फजल अली।

राज्य पुनर्गठन अधिनियम कब लागू हुआ

1 नवंबर 1956 को।

भाषा के आधार पर पहला बड़ा राज्य कौन सा बना

आंध्र राज्य, 1 अक्टूबर 1953 को।

नए राज्य किस अनुच्छेद से बनते हैं

अनुच्छेद 3 से।

स्रोत: Legislative Department: States Reorganisation Act 1956, National Archives of India, Ministry of Home Affairs

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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