खो खो भारत के सबसे पुराने और लोकप्रिय पारंपरिक खेलों में से एक है। इसके लिए किसी महंगे सामान की जरूरत नहीं होती, बस एक समतल मैदान, दो खंभे और फुर्तीले खिलाड़ी चाहिए। इसी वजह से यह गांवों और स्कूलों में खूब खेला जाता है। जनवरी 2025 में नई दिल्ली में पहला खो खो विश्व कप हुआ, जिसमें भारत की पुरुष और महिला दोनों टीमों ने खिताब जीता। इसके बाद इस खेल की चर्चा और बढ़ी है। इस लेख में आसान भाषा में जानिए खो खो कैसे खेला जाता है और इसके मुख्य नियम क्या हैं।
मैदान कैसा होता है
खो खो का मैदान आयताकार होता है। भारतीय खो खो महासंघ के नियमों में मैदान की लंबाई 27 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर बताई गई है। मैदान के दोनों सिरों पर लकड़ी का एक एक खंभा गाड़ा जाता है। दोनों खंभों के बीच एक केंद्रीय पट्टी होती है, जिस पर आठ छोटे वर्ग बने होते हैं। इन्हीं वर्गों में पीछा करने वाली टीम के खिलाड़ी बैठते हैं।

टीम और खिलाड़ी
हर टीम में 12 खिलाड़ी होते हैं, जिनमें से 9 मैदान पर उतरते हैं। एक टीम पीछा करती है और दूसरी टीम बचाव करती है। पीछा करने वाली टीम के आठ खिलाड़ी केंद्रीय पट्टी के वर्गों में एक दूसरे से उल्टी दिशा में मुंह करके बैठते हैं। नौवां खिलाड़ी सक्रिय पीछा करने वाला होता है, जो दौड़ कर बचाव करने वाले खिलाड़ियों को छूने की कोशिश करता है। बचाव करने वाली टीम के खिलाड़ी आम तौर पर तीन तीन के समूह में मैदान में आते हैं।
खो क्या होता है
सक्रिय पीछा करने वाला खिलाड़ी केंद्रीय पट्टी को पार नहीं कर सकता। उसे एक ही दिशा में दौड़ना होता है। अगर उसे दिशा बदलनी हो या पट्टी के दूसरी तरफ जाना हो, तो वह बैठे हुए अपने किसी साथी की पीठ छूकर जोर से खो बोलता है। खो मिलते ही बैठा हुआ खिलाड़ी उठ कर पीछा शुरू करता है और पहले वाला खिलाड़ी उसकी खाली जगह पर बैठ जाता है। इसी तेज अदला बदली से खेल का नाम खो खो पड़ा। सही तरीके से खो न देने पर रेफरी फाउल दे सकता है।
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खिलाड़ी कब आउट होता है
- जब सक्रिय पीछा करने वाला खिलाड़ी नियम के मुताबिक बचाव करने वाले खिलाड़ी को हाथ से छू ले।
- जब बचाव करने वाला खिलाड़ी मैदान की सीमा से बाहर चला जाए।
- जब बचाव करने वाला खिलाड़ी देर से मैदान में आए।
हर आउट होने वाले खिलाड़ी पर पीछा करने वाली टीम को अंक मिलता है।
पारी और समय
मैच में दोनों टीमों को पीछा करने और बचाव करने के मौके बारी बारी से मिलते हैं। हर पारी का समय नियमों में तय होता है और अलग अलग टूर्नामेंट के प्रारूप में यह अलग हो सकता है। जिस टीम के कुल अंक ज्यादा होते हैं, वह जीतती है। बराबरी की स्थिति के लिए भी नियम तय हैं।
खेल में क्या जरूरी है
खो खो में फुर्ती, तेज दिमाग और टीम वर्क सबसे जरूरी है। बचाव करने वाले खिलाड़ी तेजी से दिशा बदलकर और खंभे के आसपास घूम कर पीछा करने वाले को छकाते हैं। पीछा करने वाली टीम सही समय पर खो देकर बचाव करने वाले खिलाड़ी को घेरती है। कई खिलाड़ी हवा में डाइव लगाकर छूने की कोशिश करते हैं, जिसे पोल डाइव और स्काई डाइव जैसे नाम दिए जाते हैं।
खो खो विश्व कप 2025
पहला खो खो विश्व कप जनवरी 2025 में नई दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम परिसर में हुआ। इसमें कई देशों की टीमें शामिल हुईं। फाइनल में भारत की पुरुष और महिला टीमों ने नेपाल को हराकर खिताब जीते। इससे यह संदेश गया कि भारत का यह पारंपरिक खेल अब दूसरे देशों में भी फैल रहा है।
बच्चों के लिए फायदेमंद
स्कूलों में खो खो बच्चों की फिटनेस, संतुलन और तालमेल बढ़ाने का आसान तरीका माना जाता है। इसके लिए किसी खास किट की जरूरत नहीं होती, इसलिए इसे कम खर्च में खेला जा सकता है।
भारत में खो खो का इतिहास
खो खो को महाराष्ट्र से जुड़ा पारंपरिक खेल माना जाता है। बीसवीं सदी की शुरुआत में पुणे के डेक्कन जिमखाना जैसे क्लबों में इसके नियम लिखे गए। बाद में भारतीय खो खो महासंघ बना, जो देश में इस खेल का संचालन करता है। राष्ट्रीय खेलों और स्कूल खेलों में भी खो खो शामिल है। हाल के वर्षों में फ्रेंचाइजी लीग आने से खिलाड़ियों को नई पहचान मिली है।
खो खो का मैदान कितना बड़ा होता है
27 मीटर लंबा और 16 मीटर चौड़ा।
मैदान पर कितने खिलाड़ी होते हैं
हर टीम के 9 खिलाड़ी।
पहला खो खो विश्व कप किसने जीता
भारत की पुरुष और महिला दोनों टीमों ने, जनवरी 2025 में।
स्रोत: Kho Kho Federation of India, PIB: India wins Kho Kho World Cup 2025, Wikipedia: Kho kho





