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कॉलेजियम सिस्टम क्या है: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति, 1993 और 1998 के फैसले और NJAC विवाद

देश की बड़ी अदालतों में जज कैसे चुने जाते हैं? समझिए कॉलेजियम व्यवस्था और इससे जुड़ी बहस।

सुप्रीम कोर्ट भवन और न्याय के तराजू का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर अक्सर सरकार और न्यायपालिका के बीच बहस की खबरें आती हैं।
  • 1993 के फैसले को आम तौर पर दूसरा जज मामला कहा जाता है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को प्राथमिकता मिलेगी, और यह राय वरिष्ठ जजों…
  • 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 99वें संशोधन और NJAC अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
  • 1993 से पहले जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका ज्यादा मानी जाती थी और मुख्य न्यायाधीश की राय केवल परामर्श के रूप में देखी जाती थी।

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर अक्सर सरकार और न्यायपालिका के बीच बहस की खबरें आती हैं। इस बहस के केंद्र में है कॉलेजियम सिस्टम। यह व्यवस्था क्या है, कैसे बनी और इस पर सवाल क्यों उठते हैं, इस लेख में आसान भाषा में समझिए।

कॉलेजियम सिस्टम क्या है

कॉलेजियम सिस्टम वह व्यवस्था है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश वरिष्ठ जजों का एक समूह करता है। इस समूह को कॉलेजियम कहा जाता है। खास बात यह है कि संविधान में कॉलेजियम शब्द का सीधा उल्लेख नहीं है। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से विकसित हुई है।

मुख्य बातें: सुप्रीम कोर्ट भवन और न्याय के तराजू का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

संविधान क्या कहता है

संविधान के अनुच्छेद 124 में सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 217 में हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति का प्रावधान है। इनके अनुसार नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन इसके लिए परामर्श की बात कही गई है। परामर्श का मतलब क्या है और किसकी राय अंतिम होगी, इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले आए।

दूसरा जज मामला, 1993

1993 के फैसले को आम तौर पर दूसरा जज मामला कहा जाता है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को प्राथमिकता मिलेगी, और यह राय वरिष्ठ जजों से सलाह के बाद बनी सामूहिक राय होगी। यहीं से कॉलेजियम व्यवस्था की नींव पड़ी।

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तीसरा जज मामला, 1998

1998 में राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी, जिसे तीसरा जज मामला कहा जाता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम का दायरा तय हुआ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जज शामिल होते हैं। यही ढांचा आज भी सुप्रीम कोर्ट की नियुक्तियों के लिए अपनाया जाता है।

नियुक्ति की प्रक्रिया

आम तौर पर प्रक्रिया इस तरह चलती है:

  1. कॉलेजियम किसी नाम पर विचार कर सरकार को सिफारिश भेजता है।
  2. सरकार नाम की जांच करती है और जरूरत हो तो आपत्ति या टिप्पणी के साथ फाइल वापस भेज सकती है।
  3. कॉलेजियम दोबारा विचार करता है। अगर वह नाम को फिर से भेजता है, तो परंपरा के अनुसार सरकार को उसे मानना होता है।
  4. इसके बाद राष्ट्रपति नियुक्ति का आदेश जारी करते हैं।

इस प्रक्रिया की बारीकियां मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर यानी MoP में दर्ज हैं, जिसे लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से चर्चा चलती रही है।

NJAC क्या था

कॉलेजियम की जगह लेने के लिए संसद ने 2014 में संविधान का 99वां संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम पारित किया। द हिंदू के अनुसार लोकसभा ने इसे 13 अगस्त 2014 और राज्यसभा ने 14 अगस्त 2014 को पास किया। 16 राज्यों की विधानसभाओं ने इसकी पुष्टि की और 31 दिसंबर 2014 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। दोनों कानून 13 अप्रैल 2015 से लागू हुए। NJAC में न्यायपालिका के साथ सरकार और नामित प्रतिष्ठित लोगों को भी जजों की नियुक्ति में भूमिका दी गई थी।

NJAC क्यों रद्द हुआ

16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 99वें संशोधन और NJAC अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने माना कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर पड़ता है, जो संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। इसके बाद कॉलेजियम व्यवस्था फिर से लागू हो गई।

कॉलेजियम पर बहस

कॉलेजियम के समर्थक कहते हैं कि इससे जजों की नियुक्ति में सरकार का दखल कम रहता है और न्यायपालिका स्वतंत्र रहती है। वहीं आलोचक कहते हैं कि इसमें पारदर्शिता की कमी है और फैसलों के कारण सार्वजनिक नहीं होते। सरकार की ओर से सिफारिशों पर देरी को लेकर भी अदालत सवाल उठाती रही है।

आम नागरिक के लिए क्यों अहम

अदालतों में जजों की संख्या और उनकी समय पर नियुक्ति का सीधा असर मुकदमों के निपटारे पर पड़ता है। जज के पद खाली रहने से मामलों की सुनवाई में देरी होती है। इसलिए नियुक्ति की व्यवस्था पारदर्शी, तेज और निष्पक्ष होना हर नागरिक के हित में है।

पहले क्या व्यवस्था थी

1993 से पहले जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका ज्यादा मानी जाती थी और मुख्य न्यायाधीश की राय केवल परामर्श के रूप में देखी जाती थी। 1993 और 1998 के फैसलों के बाद इसमें बड़ा बदलाव आया और नियुक्ति की प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका निर्णायक हो गई।

कॉलेजियम सिस्टम क्या है

वरिष्ठ जजों का समूह, जो जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करता है।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में कौन होते हैं

भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जज।

NJAC कब रद्द हुआ

16 अक्टूबर 2015 को।

क्या कॉलेजियम का उल्लेख संविधान में है

नहीं, यह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से बनी व्यवस्था है।

स्रोत: The Hindu: NJAC vs collegium, the debate decoded, SCC Online: NJAC Act and 99th Amendment declared unconstitutional, ThePrint: What is Memorandum of Procedure

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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