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अलसी की खेती: रबी में बुवाई का सही समय, बीज दर, कतार की दूरी, धान के खेत में उतेरा खेती और कली मक्खी से बचाव

कम पानी और कम लागत में होने वाली अलसी तेल और रेशे दोनों के लिए उगाई जाती है। सही समय पर बुवाई से अच्छी उपज मिल सकती है।

नीले फूलों वाली अलसी की फसल का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • अलसी रबी मौसम की एक पुरानी तिलहन फसल है, जिसे कई इलाकों में तीसी भी कहा जाता है।
  • अलसी के लिए दोमट और मटियार दोमट मिट्टी अच्छी रहती है, जिसमें पानी न रुकता हो।
  • अलसी की कली मक्खी इस फसल का प्रमुख कीट है, जो फूल की कलियों में अंडे देती है और कलियां सूख जाती हैं।
  • कई इलाकों में अलसी को चना, मसूर या सरसों के साथ अंतरवर्ती फसल के रूप में बोया जाता है।

अलसी रबी मौसम की एक पुरानी तिलहन फसल है, जिसे कई इलाकों में तीसी भी कहा जाता है। इसके बीज से तेल निकलता है और कुछ किस्मों के तने से रेशा मिलता है, जिससे लिनन कपड़ा बनता है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र में इसकी खेती होती है। अलसी कम पानी में भी अच्छी हो जाती है, इसलिए बारानी इलाकों और धान के बाद खाली खेतों के लिए यह अच्छा विकल्प है। इस लेख में जानिए अलसी की खेती का पूरा तरीका।

अलसी की खासियत

अलसी के बीज में तेल के साथ ओमेगा 3 फैटी एसिड, रेशा और प्रोटीन होता है। इसलिए सेहत से जुड़े उत्पादों में इसकी मांग बढ़ी है। अलसी का तेल पेंट, वार्निश और छपाई की स्याही बनाने में भी इस्तेमाल होता है। खली पशुओं के चारे में काम आती है। यह फसल ठंडे और सूखे मौसम को पसंद करती है।

मुख्य बातें: नीले फूलों वाली अलसी की फसल का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

बुवाई का सही समय

सिंचित इलाकों में अलसी की बुवाई अक्टूबर के आखिर से नवंबर के पहले पखवाड़े तक करना अच्छा माना जाता है। बारानी यानी असिंचित इलाकों में मिट्टी की नमी का फायदा लेने के लिए अक्टूबर की शुरुआत से मध्य अक्टूबर तक बुवाई की जाती है। देर से बोने पर फसल में रोग और कीट का खतरा बढ़ता है और उपज घटती है।

मिट्टी और खेत की तैयारी

अलसी के लिए दोमट और मटियार दोमट मिट्टी अच्छी रहती है, जिसमें पानी न रुकता हो। खेत की दो से तीन जुताई कर मिट्टी भुरभुरी बना लें और पाटा लगाकर समतल करें। अलसी का बीज छोटा होता है, इसलिए खेत में बड़े ढेले नहीं रहने चाहिए। खाद की मात्रा मिट्टी जांच के आधार पर तय करें।

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बीज और बुवाई

अलसी के लिए आम तौर पर 25 से 30 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। उतेरा खेती में बीज की मात्रा थोड़ी ज्यादा रखी जाती है। कतार से कतार की दूरी लगभग 25 से 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 5 से 7 सेंटीमीटर रखें। बीज 2 से 3 सेंटीमीटर से ज्यादा गहरा न डालें। बुवाई से पहले कृषि विभाग की सलाह के अनुसार फफूंदनाशक से बीज उपचार करें। अपने इलाके के लिए उपयुक्त किस्म का चुनाव राज्य कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह से करें।

उतेरा खेती

धान उगाने वाले इलाकों, खासकर छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में अलसी की उतेरा खेती की जाती है। इसमें धान की फसल कटने से कुछ दिन पहले खड़ी फसल में अलसी का बीज छिटक दिया जाता है। धान के खेत की नमी में बीज अंकुरित हो जाता है और धान कटने के बाद अलसी की फसल बढ़ती है। इससे खेत खाली नहीं रहता और बिना अतिरिक्त सिंचाई के दूसरी फसल मिल जाती है।

सिंचाई

अलसी को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। अगर सिंचाई की सुविधा है, तो पहली सिंचाई फूल आने के समय और दूसरी दाना बनते समय करें। ज्यादा पानी देने से फसल गिर सकती है और रोग बढ़ सकते हैं।

कीट और रोग

अलसी की कली मक्खी इस फसल का प्रमुख कीट है, जो फूल की कलियों में अंडे देती है और कलियां सूख जाती हैं। इसके अलावा रतुआ यानी गेरुई, उकठा और चूर्णिल आसिता जैसे रोग भी लगते हैं। समय पर बुवाई, रोगरोधी किस्में और फसल चक्र अपनाने से इनका असर कम होता है। जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही दवा का छिड़काव करें।

कटाई और भंडारण

अलसी की फसल आम तौर पर 120 से 140 दिन में तैयार हो जाती है। जब पौधे और फलियां सूखकर भूरे हो जाएं, तो कटाई करें। कटाई के बाद फसल को धूप में सुखाकर मड़ाई करें। बीज को अच्छी तरह सुखाकर नमी रहित जगह पर रखें।

मंडी भाव और बिक्री

अलसी सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली रबी फसलों की सूची में शामिल नहीं है, इसलिए इसका दाम पूरी तरह बाजार पर निर्भर रहता है। बेचने से पहले Agmarknet और e-NAM पर अपनी नजदीकी मंडी के ताजा भाव जरूर देखें। तेल मिलों और सेहत उत्पाद बनाने वाली कंपनियों से सीधे जुड़कर भी किसान बेहतर दाम पा सकते हैं।

अलसी के साथ अंतरवर्ती खेती

कई इलाकों में अलसी को चना, मसूर या सरसों के साथ अंतरवर्ती फसल के रूप में बोया जाता है। तय अनुपात में कतारें रखने से एक ही खेत से दो फसलें मिलती हैं और जोखिम घटता है। कृषि विज्ञान केंद्र अपने इलाके के हिसाब से सही अनुपात की सलाह देते हैं।

रेशे वाली अलसी

कुछ किस्में खास तौर पर रेशे के लिए उगाई जाती हैं, जबकि कुछ दोहरे उपयोग वाली होती हैं, जिनसे बीज और रेशा दोनों मिलते हैं। रेशा निकालने के लिए तनों को पानी में सड़ाकर रेशे अलग किए जाते हैं। इस रेशे से लिनन कपड़ा बनता है, जिसकी बाजार में अच्छी मांग है।

अलसी की बुवाई कब करें

सिंचित इलाकों में अक्टूबर के आखिर से नवंबर के पहले पखवाड़े तक।

अलसी का बीज दर कितना है

लगभग 25 से 30 किलो प्रति हेक्टेयर।

उतेरा खेती क्या है

धान कटने से पहले खड़ी फसल में अलसी का बीज छिटकने की विधि।

क्या अलसी पर MSP मिलता है

नहीं, अलसी MSP वाली फसलों की सूची में नहीं है।

स्रोत: ICAR-भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, ICAR, Agmarknet मंडी भाव

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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