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उपचुनाव कब होता है: धारा 151A का 6 महीने वाला नियम, किन हालात में नहीं होता उपचुनाव और नए सदस्य का कार्यकाल

किसी सांसद या विधायक के इस्तीफे, निधन या अयोग्यता पर सीट खाली होती है। जानिए उपचुनाव के नियम।

मतदान केंद्र और मतदाताओं का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • लोकसभा या विधानसभा की कोई सीट कई वजहों से बीच कार्यकाल में खाली हो सकती है।
  • पहले अपवाद का मतलब है कि अगर सदन का कार्यकाल खत्म होने में एक साल से कम समय बचा है, तो आम तौर पर उपचुनाव नहीं कराया जाता, क्योंकि जल्द ही आम चुनाव होने वाले होते हैं।
  • उपचुनाव की प्रक्रिया आम चुनाव जैसी ही होती है। चुनाव आयोग कार्यक्रम घोषित करता है, अधिसूचना जारी होती है, नामांकन, जांच और नाम वापसी होती है, फिर मतदान और मतगणना होती है।
  • एक अलग नियम यह है कि कोई व्यक्ति सदन का सदस्य न होते हुए भी मंत्री बन सकता है, लेकिन उसे 6 महीने के भीतर सदन का सदस्य बनना होता है।

लोकसभा या विधानसभा की कोई सीट कई वजहों से बीच कार्यकाल में खाली हो सकती है। सांसद या विधायक का इस्तीफा, निधन, अयोग्य घोषित होना या किसी दूसरे सदन के लिए चुना जाना इसकी आम वजहें हैं। ऐसी खाली सीट को भरने के लिए जो चुनाव होता है, उसे उपचुनाव कहते हैं। इस लेख में जानिए उपचुनाव से जुड़ा कानून, 6 महीने का नियम और इसके अपवाद।

कानून क्या कहता है

उपचुनाव से जुड़ा मुख्य प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 151A में है। इसके अनुसार संसद के किसी सदन या राज्य विधानमंडल में खाली हुई सीट को भरने के लिए उपचुनाव सीट खाली होने की तारीख से 6 महीने के भीतर कराया जाना चाहिए। यह जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग की है।

मुख्य बातें: मतदान केंद्र और मतदाताओं का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

किन हालात में उपचुनाव नहीं होता

धारा 151A में दो अपवाद दिए गए हैं:

  • अगर खाली सीट से जुड़े सदस्य का बचा हुआ कार्यकाल एक साल से कम है।
  • अगर चुनाव आयोग केंद्र सरकार से सलाह करके यह प्रमाणित करे कि तय अवधि में उपचुनाव कराना मुश्किल है।

पहले अपवाद का मतलब है कि अगर सदन का कार्यकाल खत्म होने में एक साल से कम समय बचा है, तो आम तौर पर उपचुनाव नहीं कराया जाता, क्योंकि जल्द ही आम चुनाव होने वाले होते हैं। दूसरा अपवाद प्राकृतिक आपदा, सुरक्षा हालात या महामारी जैसी स्थितियों के लिए है।

एक साल की गणना कैसे होती है

बचे हुए कार्यकाल की गणना पर अदालत में बहस हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के एक फैसले में बचे हुए कार्यकाल को सीट खाली होने की तारीख से गिनने की बात कही थी। लाइवलॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार 2026 में सुप्रीम कोर्ट में इस धारा की व्याख्या से जुड़ा एक और मामला आया, जिसमें अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा। इसलिए इस विषय पर अंतिम स्थिति के लिए अदालत के ताजा फैसले देखें।

यह भी पढ़ें: आदर्श आचार संहिता क्या है: कब लागू होती है, किन कामों पर रोक रहती है और उल्लंघन पर क्या होता है | चिराग पासवान ने कहा, बिहार में लोग सेफ फील नहीं कर रहे, सहयोगी सरकार पर शर्मिंदगी

सीट खाली होने की आम वजहें

  • सदस्य का इस्तीफा, जो अध्यक्ष या सभापति स्वीकार करते हैं।
  • सदस्य का निधन।
  • दल-बदल कानून या किसी आपराधिक मामले में सजा के कारण अयोग्यता।
  • चुनाव याचिका पर अदालत द्वारा चुनाव रद्द होना।
  • एक साथ दो सीटों से जीतने पर एक सीट छोड़ना।
  • विधायक का सांसद बनना या सांसद का विधायक बनना।

नए सदस्य का कार्यकाल

उपचुनाव में जीतने वाला सदस्य पूरे 5 साल के लिए नहीं चुना जाता। वह केवल उस सीट के बचे हुए कार्यकाल के लिए सदस्य बनता है। उदाहरण के लिए, अगर विधानसभा के कार्यकाल में दो साल बचे हैं, तो उपचुनाव जीतने वाला विधायक भी केवल दो साल ही सदस्य रहेगा और फिर उसे आम चुनाव लड़ना होगा।

उपचुनाव की प्रक्रिया

उपचुनाव की प्रक्रिया आम चुनाव जैसी ही होती है। चुनाव आयोग कार्यक्रम घोषित करता है, अधिसूचना जारी होती है, नामांकन, जांच और नाम वापसी होती है, फिर मतदान और मतगणना होती है। आदर्श आचार संहिता उस सीट वाले जिले या क्षेत्र में लागू होती है। आयोग अक्सर अलग-अलग राज्यों के कई उपचुनाव एक साथ कराता है।

राज्यसभा और विधान परिषद के उपचुनाव

राज्यसभा या विधान परिषद की खाली सीटें भी उपचुनाव से भरी जाती हैं। इनमें वोट विधायक डालते हैं, जनता नहीं। राज्यसभा उपचुनाव में जीतने वाला सदस्य भी केवल बचे कार्यकाल के लिए चुना जाता है।

उपचुनाव का राजनीतिक महत्व

उपचुनाव को अक्सर सरकार के कामकाज पर जनता की राय के संकेत के रूप में देखा जाता है। हालांकि एक या दो सीटों के नतीजे से पूरे राज्य या देश का मूड तय नहीं होता, फिर भी पार्टियां इन्हें गंभीरता से लेती हैं। कई बार उपचुनाव के नतीजे से सदन में सरकार के बहुमत पर भी असर पड़ता है।

मंत्री के लिए 6 महीने का नियम

एक अलग नियम यह है कि कोई व्यक्ति सदन का सदस्य न होते हुए भी मंत्री बन सकता है, लेकिन उसे 6 महीने के भीतर सदन का सदस्य बनना होता है। संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 में यह प्रावधान है। ऐसे में कई बार उस व्यक्ति के लिए कोई विधायक सीट खाली करता है और उपचुनाव होता है।

मतदाता क्या ध्यान रखें

उपचुनाव में भी वोट डालने के लिए नाम मतदाता सूची में होना जरूरी है। मतदाता अपना नाम चुनाव आयोग के पोर्टल या वोटर हेल्पलाइन ऐप पर जांच सकते हैं। मतदान के दिन वोटर आईडी या आयोग की ओर से मान्य दूसरे पहचान पत्र साथ ले जाएं।

उपचुनाव कितने समय में होना चाहिए

सीट खाली होने के 6 महीने के भीतर।

उपचुनाव किस धारा में है

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 151A में।

क्या उपचुनाव जीतने वाला 5 साल के लिए चुना जाता है

नहीं, केवल बचे हुए कार्यकाल के लिए।

उपचुनाव कब नहीं होता

जब बचा कार्यकाल एक साल से कम हो या आयोग कठिनाई प्रमाणित करे।

स्रोत: India Code: Section 151A, RP Act 1951, Supreme Court: Pramod Laxman Gudadhe vs ECI, 2018 (PDF), LiveLaw: When can ECI choose not to hold bye election

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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