दिवाली, भाई दूज और छठ के आसपास घर के आंगन और दरवाजे पर रंगोली बनाना हमारी पुरानी परंपरा है। अलग-अलग राज्यों में इसे अलग नामों से जाना जाता है, जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में चौक पूरना, राजस्थान में मांडणा, महाराष्ट्र में रंगोली, तमिलनाडु में कोलम और बंगाल में अल्पना। पहले ये रंग घर की ही चीजों से बनते थे, जैसे चावल का आटा, हल्दी, कुमकुम और फूल। आजकल बाजार में मिलने वाले कई चमकीले रंगों में सिंथेटिक डाई मिली होती है, जिससे कुछ लोगों के हाथों में जलन हो सकती है और बच्चों व पालतू जानवरों के लिए भी ये ठीक नहीं होते।
अच्छी बात यह है कि थोड़ी मेहनत से घर पर ही सुरक्षित और सुंदर रंग तैयार हो जाते हैं। इस साल दिल्ली के पंचांग के अनुसार दिवाली 8 नवंबर को है, यानी रंग बनाने के लिए अभी पूरा समय है।
आधार के लिए क्या चाहिए
ज्यादातर प्राकृतिक रंगों का आधार चावल का आटा, बारीक सूजी या सफेद रेत होता है। चावल का आटा सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि यह बारीक होता है, आसानी से फैलता है और पारंपरिक मान्यता है कि इससे चींटियों और चिड़ियों को भी दाना मिलता है।

पीला रंग
- दो कप चावल के आटे में दो से तीन चम्मच हल्दी मिलाएं
- हल्के हाथ से पानी के छींटे देकर मसलें, ताकि रंग पूरी तरह आटे में चढ़ जाए
- इसे अखबार पर फैलाकर छांव में सुखाएं और फिर छलनी से छान लें
- गहरा पीला चाहिए, तो हल्दी की मात्रा बढ़ाएं, गेंदे की सूखी पंखुड़ियां पीसकर मिलाने से नारंगी झलक आती है
लाल और गुलाबी रंग
चुकंदर को कद्दूकस करके उसका रस निकालें और चावल के आटे में मिलाकर सुखाएं। इससे गुलाबी से गहरा लाल रंग मिलता है। गुड़हल यानी जासुदा के लाल फूलों की पंखुड़ियां धूप में सुखाकर पीस लें, यह भी लाल रंग देती हैं। कुमकुम और रोली भी पारंपरिक लाल रंग हैं, लेकिन खरीदते समय अच्छी गुणवत्ता वाले ही लें।
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हरा रंग
पालक, धनिया या पुदीने की पत्तियों को पीसकर उनका रस निकालें और आटे में मिलाकर सुखाएं। दूसरा आसान तरीका है शुद्ध मेहंदी पाउडर को आटे में मिलाना। इससे हल्का हरा रंग बनता है। सूखी तुलसी या नीम की पत्तियों का बारीक पाउडर भी काम आता है।
नीला और बैंगनी रंग
- नीले रंग के लिए अपराजिता के नीले फूल सबसे अच्छे हैं, इन्हें पानी में उबालकर गाढ़ा अर्क बनाएं और आटे में मिलाएं
- बैंगनी रंग के लिए लाल पत्तागोभी को उबालें, उसका पानी गहरा बैंगनी हो जाता है
- अपराजिता के अर्क में नींबू की कुछ बूंदें डालने पर रंग बैंगनी की ओर बदल जाता है, बच्चों को यह प्रयोग अच्छा लगता है
भूरा और काला रंग
कॉफी पाउडर या कत्था आटे में मिलाने से भूरा रंग बनता है। काले रंग के लिए नारियल की जली हुई जटा या दीये की कालिख का इस्तेमाल पहले होता था, लेकिन इसे संभालना थोड़ा मुश्किल है। रंगोली की बाहरी रेखा के लिए गहरे भूरे रंग से भी अच्छा उभार मिल जाता है।
फूलों की रंगोली
अगर रंग बनाने का समय न हो, तो ताजे फूलों से रंगोली सबसे आसान विकल्प है। गेंदा, गुलाब, सेवंती और आम या अशोक की पत्तियों से कुछ ही देर में सुंदर डिजाइन बन जाता है। फूलों की रंगोली पर हल्के पानी के छींटे देते रहें, तो यह पूरे दिन ताजा रहती है। त्योहार के बाद इन फूलों को खाद के गड्ढे में डाल सकते हैं।
रंगों को सुखाने और रखने का तरीका
- गीले रंग को हमेशा छांव में सुखाएं, तेज धूप में प्राकृतिक रंग फीके पड़ जाते हैं
- पूरी तरह सूखने के बाद ही डिब्बे में भरें, वरना फफूंद लग सकती है
- हर रंग को अलग कांच या स्टील के डिब्बे में रखें और ढक्कन कसकर बंद करें
- ये रंग आम तौर पर कुछ हफ्ते तक ठीक रहते हैं, इसलिए त्योहार से कुछ दिन पहले ही बनाएं
रंगोली बनाने के आसान टिप्स
- पहले चॉक से हल्की रेखाएं खींच लें, फिर रंग भरें
- रंग को अंगूठे और तर्जनी के बीच लेकर धीरे-धीरे गिराएं, इससे रेखा पतली और साफ बनती है
- बीच में दीया रखने की जगह छोड़ें, लेकिन दीये को कपड़े, पर्दे और पटाखों से दूर रखें
- बच्चों को डिजाइन भरने का काम दें, इससे उनका मन भी लगता है और वे परंपरा से जुड़ते हैं
किन बातों का ध्यान रखें
प्राकृतिक चीजें भी किसी को एलर्जी दे सकती हैं। जिन्हें हल्दी या किसी फूल से त्वचा पर परेशानी होती है, वे दस्ताने पहनकर रंग बनाएं। रंगोली में कांच का बुरादा या चमकीले प्लास्टिक कण न मिलाएं, ये पैरों में चुभ सकते हैं और पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह हैं।
प्राकृतिक रंग कितने दिन चलते हैं
ठीक से सुखाकर बंद डिब्बे में रखे जाएं, तो ये रंग कुछ हफ्ते तक इस्तेमाल किए जा सकते हैं। नमी लगने पर इनमें गांठें बन जाती हैं।
क्या ये रंग बच्चों के लिए सुरक्षित हैं
रसोई की चीजों से बने होने के कारण ये बाजार के सिंथेटिक रंगों की तुलना में कम नुकसानदेह माने जाते हैं, फिर भी छोटे बच्चों को इन्हें मुंह में डालने से रोकें।





