Difference Between National Anthem and National Song: हम भारतीय जब भी अपना राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत सुनते हैं, तो हमारे भीतर देशभक्ति की भावना स्वतः ही जाग उठती है। दुनिया के कई देशों में राष्ट्रगीत का कोई अलग कॉन्सेप्ट नहीं होता है, जिसकी वजह से आम लोग अक्सर जन गण मन और वंदे मातरम को एक ही मान लेते हैं। हालांकि, इन दोनों ही महान रचनाओं के बीच ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, शाब्दिक अर्थ और संवैधानिक दर्जे के मामले में बहुत बड़ा अंतर मौजूद है। इस साल मनाए जा रहे अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस के खास मौके पर यह जानना बेहद दिलचस्प है कि हमारे राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का सफर कैसा रहा है और दोनों में क्या बुनियादी फर्क है।

Difference Between National Anthem and National Song: जन गण मन का ऐतिहासिक सफर और राष्ट्रगान के रूप में इसकी स्वीकार्यता

भारत का राष्ट्रगान देश के समृद्ध इतिहास, सांस्कृतिक विविधता और भौगोलिक एकता का जीता-जागता प्रमाण माना जाता है। इसे महान कवि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ग्यारह दिसंबर उन्नीस सौ ग्यारह को मूल रूप से बंगाली भाषा में ‘भारोतो भाग्यो बिधाता’ के रूप में रचा था। सबसे पहले इसे सत्ताईस दिसंबर उन्नीस सौ ग्यारह को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दौरान गाया गया था। इसके बाद चौबीस जनवरी उन्नीस सौ पचास को इसे आधिकारिक तौर पर देश के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया था। इस गान की समयानुसार अवधि बावन सेकंड तय की गई है और इसकी धुन राग अल्हैया बिलावल पर आधारित है, जिसे गाते समय इसके सटीक उच्चारण का कड़ाई से पालन करना जरूरी होता है।

राष्ट्रगान के नियम और संविधान के तहत नागरिकों के लिए इसका महत्व

भारतीय संविधान के अनुच्छेद इकतावन ए के तहत राष्ट्रगान का सम्मान करना देश के हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताया गया है। संसद ने भी कुछ विशेष अवसरों पर इसके गायन को अनिवार्य बना दिया है ताकि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उचित सम्मान बना रहे। टैगोर ने इस रचना में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों जैसे पंजाब, सिंध, गुजरात, बंगाल और द्रविड़ के साथ-साथ हमारी पवित्र नदियों और पर्वतों का भी सुंदर जिक्र किया है। यह गान देश की अनेकता में एकता का जश्न मनाता है और नागरिकों को ही देश का असली भाग्यविधाता मानता है। इसके नियमों का पालन करते हुए हर भारतीय इसके प्रति अपनी गहरी निष्ठा और सम्मान प्रकट करता है।

वंदे मातरम का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और राष्ट्रगीत का गौरवशाली इतिहास

दूसरी तरफ, वंदे मातरम हमारे महान स्वतंत्रता संग्राम की वास्तविक आत्मा रहा है, जिससे देश के आम नागरिकों का एक बहुत गहरा भावनात्मक जुड़ाव है। इस अमर गीत को बंकिम चंद्र चटर्जी ने अठारह सौ सत्तर के दशक में संस्कृत और बंगाली भाषा के मिश्रण से लिखा था, जो उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा था। वर्ष उन्नीस सौ पांच में कांग्रेस द्वारा इसे राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया गया था और बंगाल विभाजन तथा गांधी जी के आंदोलनों के दौरान यह विरोध का सबसे बड़ा स्वर बना। राष्ट्रगान के उलट, राष्ट्रगीत को अलग-अलग संगीत शैलियों और सांस्कृतिक विविधताओं के अनुसार विभिन्न तरीकों से गाया जा सकता है, और संविधान में इसे गाना अनिवार्य नहीं किया गया है।

वंदे मातरम राष्ट्रगान क्यों नहीं बन पाया और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भूमिका

यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि वंदे मातरम को राष्ट्रगान क्यों नहीं बनाया गया, जिसका जवाब इतिहास के पन्नों में छिपा है। वर्ष उन्नीस सौ इकतालीस में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस बर्लिन गए, तब उनकी आजाद हिंद टीम की बैठक में इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई थी। टीम के सदस्यों का यह तर्क था कि वंदे मातरम के बोल आम जनता के लिए थोड़ा कठिन हैं, जबकि जन गण मन देश की विविधता का अधिक सटीक प्रतिनिधित्व करता है। नेताजी ने इस विचार से सहमति जताई और इसी ऐतिहासिक फैसले के बाद जन गण मन को वैश्विक मंच पर भारत की पहचान के रूप में स्थापित किया गया।
राष्ट्रीय प्रतीकों के रूप में जन गण मन और वंदे मातरम दोनों ही देशवासियों के दिलों में एक विशेष और सर्वोच्च स्थान रखते हैं। जहां एक ओर जन गण मन हमारे संवैधानिक अनुशासन, एकता और आधिकारिक राष्ट्रगान का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर वंदे मातरम हमारे स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों और सांस्कृतिक चेतना की याद दिलाता है। दोनों ही रचनाएं भारत की गरिमा को बढ़ाती हैं और देश के हर नागरिक को देशभक्ति के सूत्र में बांधती हैं। इन दोनों के बीच के बुनियादी अंतर को समझकर हम अपनी राष्ट्रीय विरासत के प्रति और अधिक जागरूक बन सकते हैं और अपने महान इतिहास पर गर्व महसूस कर सकते हैं।

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