चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद भी कई बार विवाद खत्म नहीं होता। हारने वाला उम्मीदवार या कोई मतदाता मान सकता है कि जीतने वाले उम्मीदवार ने नियम तोड़े या चुनाव प्रक्रिया में ऐसी गड़बड़ी हुई जिससे नतीजा बदल गया। ऐसी स्थिति में कानून एक रास्ता देता है, जिसे चुनाव याचिका कहते हैं। इस लेख में जानिए चुनाव याचिका क्या है, कौन दायर कर सकता है, समय सीमा क्या है और किन आधारों पर चुनाव रद्द हो सकता है।
चुनाव याचिका क्या है
चुनाव याचिका एक कानूनी याचिका है, जिसके जरिए लोकसभा या विधानसभा के किसी चुनाव को अदालत में चुनौती दी जाती है। संविधान के अनुच्छेद 329 के अनुसार संसद और राज्य विधानमंडल के चुनाव को केवल चुनाव याचिका के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है। इसकी प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के भाग 6 में दी गई है।

किस अदालत में दायर होती है
लोकसभा और विधानसभा चुनाव से जुड़ी चुनाव याचिका संबंधित राज्य के हाईकोर्ट में दायर की जाती है। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव से जुड़े विवाद सीधे सुप्रीम कोर्ट सुनता है।
कौन दायर कर सकता है
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 81 के अनुसार चुनाव याचिका उस चुनाव का कोई भी उम्मीदवार या उस निर्वाचन क्षेत्र का कोई भी मतदाता दायर कर सकता है। यानी केवल हारा हुआ उम्मीदवार ही नहीं, बल्कि आम मतदाता भी चुनाव को चुनौती दे सकता है।
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45 दिन की समय सीमा
धारा 81 के अनुसार चुनाव याचिका जीते हुए उम्मीदवार के चुनाव की तारीख से 45 दिन के भीतर दायर करनी होती है। यहां चुनाव की तारीख का मतलब वह दिन है जब रिटर्निंग ऑफिसर उम्मीदवार को विजेता घोषित करता है। अगर एक से ज्यादा उम्मीदवार चुने गए हों और तारीखें अलग हों, तो बाद वाली तारीख मानी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2000 के तरुण प्रसाद चटर्जी मामले में कहा था कि नतीजे वाले दिन ही दायर याचिका भी समय सीमा के भीतर मानी जाएगी। समय सीमा निकल जाने के बाद याचिका आम तौर पर स्वीकार नहीं होती।
चुनाव रद्द होने के आधार
धारा 100 में वे आधार बताए गए हैं जिन पर हाईकोर्ट किसी विजेता का चुनाव रद्द घोषित कर सकता है। मोटे तौर पर ये हैं:
- चुनाव के दिन जीते उम्मीदवार में सदस्य बनने की योग्यता न होना या वह अयोग्य हो।
- जीते उम्मीदवार या उसके चुनाव एजेंट ने भ्रष्ट आचरण किया हो, या उसकी सहमति से किसी और ने किया हो।
- किसी नामांकन पत्र को गलत तरीके से खारिज किया गया हो।
- गलत तरीके से नामांकन स्वीकार होने, किसी और के भ्रष्ट आचरण, वोटों को गलत तरीके से स्वीकार या खारिज करने, या संविधान और कानून के उल्लंघन से नतीजे पर गंभीर असर पड़ा हो।
भ्रष्ट आचरण क्या है
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 में भ्रष्ट आचरण की परिभाषा है। इसमें रिश्वत देना, अनुचित दबाव डालना, धर्म या जाति के नाम पर वोट मांगना, तय सीमा से ज्यादा खर्च करना और विरोधी उम्मीदवार के बारे में झूठे बयान फैलाना जैसे काम शामिल हैं। भ्रष्ट आचरण साबित होने पर चुनाव रद्द होने के साथ उम्मीदवार कुछ समय के लिए अयोग्य भी हो सकता है।
याचिका में क्या जरूरी है
चुनाव याचिका में आरोपों का ठोस विवरण, तथ्यों और सबूतों के साथ देना होता है। अगर भ्रष्ट आचरण का आरोप है, तो उसका पूरा ब्योरा और समर्थन में हलफनामा भी लगाना होता है। अदालतें अस्पष्ट और सामान्य आरोपों वाली याचिकाओं को शुरुआती चरण में ही खारिज कर सकती हैं।
फैसले का असर
अगर हाईकोर्ट चुनाव रद्द कर देता है, तो वह सीट खाली हो सकती है और वहां उपचुनाव होता है। कुछ मामलों में अदालत याचिकाकर्ता या किसी दूसरे उम्मीदवार को विजेता घोषित भी कर सकती है, अगर कानून में दी गई शर्तें पूरी हों। कानून में चुनाव याचिका का निपटारा छह महीने में करने की कोशिश की बात कही गई है, लेकिन व्यवहार में कई मामले लंबे खिंच जाते हैं।
इतिहास का चर्चित उदाहरण
1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज नारायण की चुनाव याचिका पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से चुनाव रद्द कर दिया था। यह भारत के राजनीतिक इतिहास के सबसे चर्चित फैसलों में से एक है।
चुनाव याचिका कहां दायर होती है
संबंधित राज्य के हाईकोर्ट में।
चुनाव याचिका दायर करने की समय सीमा क्या है
नतीजे की तारीख से 45 दिन।
चुनाव याचिका कौन दायर कर सकता है
कोई भी उम्मीदवार या उस क्षेत्र का कोई भी मतदाता।
चुनाव रद्द होने के आधार किस धारा में हैं
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 100 में।
स्रोत: Indian Kanoon: Section 81, RP Act 1951, India Code: Section 100, RP Act 1951, Indian Kanoon: Tarun Prasad Chatterjee vs Dinanath Sharma, 2000, Wikipedia: State of Uttar Pradesh v. Raj Narain





