Himalayan Rivers Floods: हर वर्ष मॉनसून का मौसम आते ही उत्तर भारत और हिमालयी राज्यों की शांत, स्वच्छ और कल-कल बहने वाली नदियां अचानक रौद्र और प्रलयंकारी रूप धारण कर लेती हैं। जो नदियां वर्ष के अधिकांश महीनों में जीवनदायिनी बनकर करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं, सिंचाई का साधन बनती हैं और सभ्यता का पोषण करती हैं, वही नदियां जुलाई से सितंबर के दौरान मौत और विनाश का तांडव मचाने लगती हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर से लेकर नेपाल और सिक्किम तक के पहाड़ी इलाकों में पहाड़ दरकने लगते हैं, सड़कें बह जाती हैं, पुल तिनके की तरह बिखर जाते हैं और बस्तियों का नामोनिशान मिट जाता है। जब यह उफनता हुआ जल प्रवाह पहाड़ों से निकलकर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे मैदानी राज्यों में प्रवेश करता है, तो वहां विशाल बाढ़ की विभीषिका खड़ी हो जाती है। लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसलें जलमग्न हो जाती हैं और लाखों लोग बेघर होने पर मजबूर हो जाते हैं।
भू-वैज्ञानिकों, जल-विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के अनुसार यह केवल एक सामान्य मौसमी आपदा नहीं है, बल्कि इसके पीछे हिमालय की जटिल भौगोलिक संरचना, ग्लेशियरों का व्यवहार, मॉनसूनी बादलों की भौतिकी, तीव्र ढलान और इंसानी दखल का एक ऐसा खतरनाक वैज्ञानिक चक्र काम करता है जो बरसात के मौसम में इन नदियों को अकल्पनीय रूप से विनाशकारी बना देता है।
Himalayan Rivers Floods: मॉनसून और ग्लेशियरों के पिघलने का घातक दोहरा संगम
हिमालय से निकलने वाली नदियों की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वे दोहरी जल आपूर्ति प्रणाली पर निर्भर करती हैं। जहां प्रायद्वीपीय भारत की नदियां केवल वर्षा जल पर निर्भर होती हैं, वहीं गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, तीस्ता, कोसी, गंडक और सतलुज जैसी हिमालयी नदियों को जल की प्राप्ति दो अलग-अलग स्रोतों से होती है। पहला स्रोत दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून की मानसूनी बारिश है, जो नदियों को कुल वार्षिक जल का लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सा प्रदान करती है। दूसरा स्रोत ऊंचे हिमालयी शिखरों पर जमे विशाल हिमनद यानी ग्लेशियर हैं।
गर्मियों के मौसम में जब तापमान में भारी वृद्धि होती है, तो ग्लेशियर तेजी से पिघलना शुरू होते हैं और नदियों में जल का स्तर पहले से ही बढ़ा रहता है। जैसे ही जुलाई का महीना शुरू होता है, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की नमी से लदी मानसूनी हवाएं हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से टकराती हैं। इसके परिणामस्वरूप ग्लेशियरों के पिघलने से पहले से ही उफन रही नदियों में मूसलाधार बारिश का अरबों क्यूसेक पानी एक साथ समाहित हो जाता है। इस दोहरे जल संगम के कारण नदियों की जल वहन क्षमता अपनी चरम सीमा को पार कर जाती है और वे किनारों को तोड़ते हुए जलप्रलय का रूप धारण कर लेती हैं।
हिमालय की युवा पर्वत श्रृंखला, संकरी घाटियां और अत्यधिक तीव्र ढलान
भू-वैज्ञानिक दृष्टि से हिमालय दुनिया की सबसे युवा वलित पर्वत श्रृंखलाओं (Young Fold Mountains) में से एक है। इसका निर्माण यूरेशियन और भारतीय टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से हुआ है, जिसके कारण यह क्षेत्र आज भी भूगर्भीय रूप से अत्यधिक अस्थिर और संवेदनशील माना जाता है। हिमालयी नदियां अत्यंत संकरी ‘वी-आकार’ की घाटियों (V-shaped valleys) और तीव्र ढलानों से होकर नीचे की ओर उतरती हैं। जब पानी बहुत अधिक ऊंचाई से खड़े ढलान पर गिरता है, तो गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसके प्रवाह का वेग सामान्य मैदानी नदियों की तुलना में दस से बीस गुना अधिक तीव्र हो जाता है।
भौतिकी के गतिज ऊर्जा सिद्धांत के अनुसार, जब पानी का वेग दोगुना होता है, तो उसकी चट्टानों और किनारों को काटने की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। तीव्र ढलान होने के कारण बारिश का पानी जमीन में रिसने या ठहरने का अवसर नहीं पाता और कुछ ही मिनटों के भीतर सारा सतही बहाव मुख्य नदी की धारा में एकत्र हो जाता है। यही कारण है कि हिमालयी घाटियों में पानी का स्तर कुछ ही घंटों में कई मीटर ऊपर चढ़ जाता है, जिससे निचली बस्तियों में रहने वाले लोगों को संभलने या सुरक्षित स्थानों पर जाने का तनिक भी समय नहीं मिल पाता।
मलबे, सिल्ट और विशाल चट्टानों का घातक डेब्रिस फ्लो
बरसात के दिनों में हिमालय की नदियां केवल जल की धाराएं नहीं होतीं, बल्कि वे भारी मलबे, गाद (Silt), बोल्डर और कीचड़ का एक विशालकाय और ठोस गाढ़ा प्रवाह बन जाती हैं। मूसलाधार बारिश के कारण पहाड़ों की ऊपरी कमजोर परत संतृप्त हो जाती है और जगह-जगह बड़े पैमाने पर भूस्खलन होने लगता है। लाखों टन मिट्टी, पेड़ और बड़ी चट्टानें टूटकर सीधे उफनती नदियों में गिरती हैं। जब तेज वेग से बहते पानी में यह भारी मलबा मिश्रित होता है, तो इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘डेब्रिस फ्लो’ (Debris Flow) कहा जाता है।
यह गाढ़ा कीचड़ और पत्थरों का मिश्रण कंक्रीट मिक्सर की तरह काम करता है, जो रास्ते में आने वाले बड़े से बड़े आरसीसी पुलों, बहुमंजिला इमारतों, हाइड्रोइलेक्ट्रिक बांधों और पक्की सड़कों को जड़ से उखाड़ फेंकता है। फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली जिले में घटी ऋषिगंगा और धौलीगंगा त्रासदी इसका सबसे ज्वलंत और भयावह उदाहरण थी। उस समय रौंठी पीक से लगभग 5600 मीटर की ऊंचाई से एक विशाल चट्टान और लटकता हुआ ग्लेशियर टूटकर नीचे रौंठी गाड़ में गिरा था। उस भारी मलबे ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह रोक दिया और कुछ ही क्षणों में लगभग 300 फीट ऊंची मलबे की दीवार खड़ी हो गई। जब यह प्राकृतिक बांध पानी के भारी दबाव से टूटा, तो नीचे स्थित तपोवन और ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट्स सेकंडों में मलबे के ढेर में तब्दील हो गए थे और सैकड़ों जिंदगियां काल के गाल में समा गई थीं।
जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक वर्षा और ओरोग्राफिक क्लाउडबर्स्ट का आतंक
ग्लोबल वार्मिंग और तेजी से बदलते वैश्विक जलवायु पैटर्न ने हिमालयी क्षेत्र के मौसम विज्ञान को पूरी तरह से असंतुलित कर दिया है। पिछले कुछ दशकों में यह देखा गया है कि मॉनसून के दौरान होने वाली बारिश का कुल समय घट गया है, लेकिन बारिश की तीव्रता अत्यधिक बढ़ गई है। यानी जो पानी पहले पूरे महीने भर में धीमी गति से बरसता था, वह अब कुछ ही घंटों के भीतर मूसलाधार रूप में गिर जाता है। जब बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठने वाली अत्यधिक नमी युक्त गर्म हवाएं हिमालय की ठंडी और ऊंची चोटियों से तेजी से ऊपर उठती हैं, तो उनका संघनन बहुत तीव्र गति से होता है।
इस प्रक्रिया को मौसम विज्ञान में ओरोग्राफिक लिफ्टिंग कहा जाता है। जब बादल नमी के अत्यधिक भार को वहन करने में असमर्थ हो जाते हैं, तो एक बहुत छोटे भौगोलिक दायरे (लगभग 20 से 30 वर्ग किलोमीटर) में एक घंटे के भीतर 100 मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की जाती है, जिसे आमतौर पर ‘बादल फटना’ (Cloudburst) कहा जाता है। हालांकि हर तीव्र वर्षा तकनीकी रूप से बादल फटना नहीं होती, लेकिन इस तरह की अत्यधिक वर्षा (Extreme Rainfall Events) पहाड़ों की जल निकासी व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है। अचानक आई इस ‘फ्लैश फ्लड’ के कारण सूखी पड़ी छोटी बरसाती नदियां और नाले भी विकराल सुरसा की तरह मुंह बाए सब कुछ लील लेते हैं।
नदी घाटियों में अनियोजित निर्माण, अवैज्ञानिक विकास और इंसानी गलतियां
प्राकृतिक और भौगोलिक कारणों के अलावा मानवीय गतिविधियां भी हिमालयी नदियों के विनाशकारी स्वभाव को कई गुना बढ़ाने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। पहाड़ों में बुनियादी ढांचे का विस्तार करते समय नदियों के प्राकृतिक ‘फ्लडप्लेन्स’ (बाढ़ क्षेत्र) का ध्यान नहीं रखा गया है। रिवरफ्रंट, होटल, रिजॉर्ट, आवासीय कॉलोनियां और व्यवसायिक परिसर सीधे नदियों के संवेदनशील किनारों और बहाव क्षेत्र पर खड़े कर दिए गए हैं। जब नदी का प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र अवरुद्ध हो जाता है, तो जल स्तर में मामूली वृद्धि भी व्यापक विनाश का कारण बनती है।
इसके साथ ही चार धाम ऑल वेदर रोड जैसी विशाल सड़क परियोजनाओं और दर्जनों जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के दौरान पहाड़ों को काटने के लिए की जाने वाली भारी ब्लास्टिंग ने पहाड़ियों की आंतरिक संरचना को कमजोर और भुरभुरा बना दिया है। निर्माण कार्य के दौरान निकलने वाले लाखों टन मलबे को अक्सर नियमों को ताक पर रखकर सीधे नदियों के किनारों पर डंप कर दिया जाता है। बरसात के मौसम में यही डंप किया गया मलबा बहते पानी के साथ मिलकर नदियों की गहराई को उथला कर देता है और जलप्रलय के वेग को विस्फोटक बना देता है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई और अवैज्ञानिक खनन ने मिट्टी की जल सोखने की क्षमता को नष्ट कर दिया है, जिससे हर बारिश का पानी सीधे तबाही बनकर नीचे उतरता है।
पहाड़ों से मैदानों तक तबाही: गाद जमाव और तटबंधों का टूटना
हिमालयी नदियों का यह रौद्र रूप केवल पहाड़ों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि जब यह जलधारा मैदानी क्षेत्रों में पहुंचती है, तो इसका स्वरूप एक शांत लेकिन सर्वग्राही बाढ़ में बदल जाता है। पहाड़ों से अत्यधिक तीव्र ढलान के साथ नीचे उतरते समय नदियां अपने साथ करोड़ों टन सिल्ट, रेत और मिट्टी बहाकर लाती हैं। जैसे ही नदियां उत्तर प्रदेश, बिहार या पश्चिम बंगाल के समतल मैदानों में प्रवेश करती हैं, उनके पानी का वेग अचानक कम हो जाता है।
वेग कम होने के कारण पानी अपने साथ लाए गए भारी मलबे और गाद को आगे नहीं ले जा पाता और वह सारा मलबा नदी के तल (River Bed) में जमा होने लगता है। इस निरंतर गाद जमाव (Siltation) के कारण नदी का तल ऊंचा उठ जाता है और उसकी पानी समाने की क्षमता घट जाती है। नतीजतन, कोसी, घाघरा, शारदा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां अपने तटबंधों को तोड़कर नए रास्तों से बहने लगती हैं और हर साल लाखों लोगों को विस्थापित कर भारी आर्थिक व जनहानि का कारण बनती हैं।
Himalayan Rivers Floods: आपदा प्रबंधन, ग्लेशियर निगरानी और भविष्य की सुरक्षा का रोडमैप
हिमालयी नदियों के इस वैज्ञानिक और विनाशकारी चक्र को पूरी तरह से रोका तो नहीं जा सकता क्योंकि यह पृथ्वी की प्राकृतिक विकास यात्रा का हिस्सा है, लेकिन सटीक वैज्ञानिक प्रबंधन, तकनीकी निगरानी और प्रकृति-सम्मत नीतियों के माध्यम से जान-माल के नुकसान को न्यूनतम स्तर पर जरूर लाया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद हिमनद झीलों (Glacial Lakes) की चौबीसों घंटे उपग्रह आधारित रियल-टाइम निगरानी अनिवार्य है, ताकि ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) के खतरों को पहले ही भांपा जा सके।
इसके अतिरिक्त, प्रत्येक नदी घाटी के लिए ‘रिवर बेसिन मैनेजमेंट’ और सख्त ‘फ्लडप्लेन जोनिंग’ लागू की जानी चाहिए, जिसके तहत नदियों के उच्च जलस्तर वाले क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के पक्के निर्माण पर कानूनी प्रतिबंध हो। पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) और डॉप्लर वेदर रडार नेटवर्क को सुदूर पहाड़ी घाटियों तक मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि अत्यधिक वर्षा की चेतावनी स्थानीय प्रशासन और नागरिकों को समय रहते मिल सके। निर्माण परियोजनाओं में भारी विस्फोटकों के बजाय हरित इंजीनियरिंग और टनलिंग तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए तथा ढलानों पर सघन वनीकरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। हिमालय के साथ टकराव के बजाय उसके संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का सम्मान करते हुए सतत विकास का मार्ग अपनाना ही भावी पीढ़ियों को जलप्रलय से बचाने का एकमात्र स्थायी उपाय है।
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