Supreme Court: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा बनाए गए नए नियमों पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यूजीसी ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि वह नए विनियमों पर पुनर्विचार कर रहा है और इस प्रक्रिया को अंतिम रूप देने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने यूजीसी को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी अनिवार्य किया है कि दाखिल किए जाने वाले हलफनामे की प्रति याचिकाकर्ताओं और संबंधित पक्षों को भी उपलब्ध कराई जाए।
यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम 2026 को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था। इन नियमों के लागू होते ही इनके कई प्रावधानों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नियमों में शामिल कुछ प्रावधान मनमाने हैं और वे सामान्य वर्ग के छात्रों को संरक्षण से वंचित करते हैं। याचिकाओं में कहा गया है कि यह व्यवस्था संविधान के तहत प्राप्त समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों के प्रतिकूल है।

Supreme Court: अदालती कार्यवाही और अंतरिम आदेश की स्थिति

सुनवाई के दौरान यूजीसी की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को अवगत कराया कि संबंधित नियमों के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श जारी है। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने आयोग को चार हफ्ते की मोहलत दी। पीठ ने निर्देश दिया कि आगामी हलफनामे में पुनर्विचार प्रक्रिया के सभी तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में हुई सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने इन विनियमों पर अंतरिम रोक लगा दी थी। उस समय कोर्ट ने प्रावधानों की स्पष्टता पर सवाल उठाते हुए इनके दुरुपयोग की आशंका व्यक्त की थी। अदालत ने केंद्र सरकार व यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए वर्ष 2012 के पूर्ववर्ती नियमों को ही लागू रखने का आदेश दिया था। वर्तमान सुनवाई में भी यह व्यवस्था कायम रखी गई है।

विवाद की पृष्ठभूमि और परिभाषा पर असहमति

यूजीसी के इन नए नियमों की पृष्ठभूमि उच्च शिक्षण संस्थानों में हुई दुखद घटनाओं से जुड़ी है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं द्वारा दायर याचिकाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने परिसरों में भेदभाव रोकने हेतु सशक्त तंत्र बनाने के निर्देश दिए थे। इसके उपरांत आयोग ने नए दिशा-निर्देश तैयार किए थे।
हालांकि, नए नियमों में जातिगत भेदभाव की तय की गई परिभाषा को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया। याचिकाकर्ताओं का पक्ष है कि भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित कर दिया गया है। इससे अन्य वर्गों के छात्रों को शिकायत निवारण व्यवस्था से बाहर रखने की स्थिति उत्पन्न होती है। दूसरी ओर, समर्थकों का मानना है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को परिसरों में विशेष संरक्षण दिया जाना आवश्यक है।

Supreme Court: पुराने नियम प्रभावी और आगे का रोडमैप

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक बढ़ाए जाने के कारण फिलहाल देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में 2012 के नियम ही प्रभावी रहेंगे। इन नियमों में भेदभाव के खिलाफ व्यापक शिकायत निवारण और समान अवसर प्रकोष्ठ (Equal Opportunity Cell) स्थापित करने के प्रावधान शामिल हैं।
यूजीसी द्वारा चार सप्ताह बाद दाखिल किए जाने वाले हलफनामे के आधार पर ही न्यायालय आगामी कार्यवाही की दिशा तय करेगा। यदि आयोग नियमों में संशोधनों का प्रस्ताव रखता है, तो अदालत उन पर सभी पक्षों की बहस सुनकर अंतिम फैसला सुनाएगी।

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