Nagchandreshwar Temple Mystery: मध्य प्रदेश के धार्मिक नगर उज्जैन स्थित प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में सावन के तीसरे सोमवार और नाग पंचमी के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। इसी दौरान महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर में भी दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगा रहा। हालांकि मंदिर परिसर में भारी भीड़ बढ़ने के कारण कुछ समय के लिए वहां दबाव जैसी स्थिति बनने की खबरें भी सामने आईं। लेकिन इन सबके बीच एक बार फिर से नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट से जुड़ा रहस्य देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। क्या आप जानते हैं कि दुनिया का यह इकलौता ऐसा मंदिर क्यों है जिसके कपाट पूरे साल बंद रहते हैं और साल में केवल एक बार नाग पंचमी के दिन ही खोले जाते हैं।

Nagchandreshwar Temple Mystery: पौराणिक कथा और तक्षक नाग की तपस्या का रहस्य

नागचंद्रेश्वर मंदिर के साल में केवल एक बार खुलने के पीछे एक बेहद दिलचस्प और प्राचीन पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नागराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर और कठोर तपस्या की थी। उनकी इस कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें अमरता का वरदान दे दिया था। वरदान मिलने के बाद नागराज तक्षक ने महादेव से इच्छा जताई कि वे हमेशा भगवान शिव के सानिध्य में ही निवास करना चाहते हैं। उन्होंने महाकाल वन में रहने की अनुमति मांगी, जिसे भगवान शिव ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। ऐसा माना जाता है कि शिवजी ने तक्षक नाग को यह आशीर्वाद भी दिया था कि उनकी साधना और एकांत में कभी किसी प्रकार का विघ्न नहीं आना चाहिए। इसी वजह से आज भी नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट साल में केवल एक दिन के लिए खोले जाते हैं और बाकी पूरे साल मंदिर बंद रखकर नागराज तक्षक के एकांत की परंपरा का पूरी निष्ठा से पालन किया जाता है।

नाग पंचमी पर होने वाली त्रिकाल पूजा का विशेष विधान

नागचंद्रेश्वर मंदिर में नाग पंचमी के दिन मंदिर के कपाट खुलने के बाद एक विशेष त्रिकाल पूजा का पूरा विधान निभाया जाता है। त्रिकाल पूजा का मतलब दिन के तीन अलग-अलग समय पर होने वाले विशेष पूजन से है, जो इस पर्व की पवित्रता को और बढ़ा देता है। सबसे पहले नाग पंचमी की मध्य रात्रि ठीक बारह बजे मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, जिसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े के संतों की ओर से प्रथम पूजा संपन्न की जाती है। यह परंपरा मंदिर के पट खुलने के साथ ही शुरू हो जाती है। इसके बाद दिन में ठीक बारह बजे दूसरी पूजा होती है, जिसमें शासकीय प्रशासन की ओर से अधिकारी शामिल होकर विधि-विधान से पूजन करते हैं। अंत में शाम को करीब साढ़े सात बजे महाकाल मंदिर समिति की ओर से पुरोहित और पुजारी तीसरी संध्या आरती संपन्न कराते हैं।

Nagchandreshwar Temple Mystery: काल सर्प दोष से मुक्ति और भक्तों की अटूट आस्‍था

इस मंदिर को लेकर श्रद्धालुओं के मन में गहरी धार्मिक मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करता है, उसे काल सर्प दोष और अन्य नाग जनित समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। यही मुख्य कारण है कि नाग पंचमी के दिन देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। मध्य रात्रि जब मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो सबसे पहले शैव परंपरा के अनुसार नारियल बांधकर पूजन किया जाता है। इसके बाद जय श्री महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के जयघोष से पूरा परिसर गूंज उठता है और आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है।
सदियों पुरानी यह परंपरा और अनूठी पूजा पद्धति इस स्थान को दुनिया भर के शिव भक्तों के लिए बेहद खास बनाती है। साल के केवल चौबीस घंटे मिलने वाले इस दुर्लभ अवसर पर भगवान शिव और नागराज तक्षक के दर्शन करना हर श्रद्धालु अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। जैसे ही नाग पंचमी के चौबीस घंटे पूरे होते हैं, रात को बारह बजे विशेष महाआरती के बाद मंदिर के कपाट फिर से एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं। अब सभी भक्तों की नजरें अगले साल आने वाले नाग पंचमी के पर्व पर टिकी हैं।

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