नए नियम उन ट्रांजेक्शन आईडी पर भी लागू होंगे जो योजना के पोर्टल पर जनरेट होती हैं। फोटो में मरीज का बिस्तर और उसके पीछे लगा मॉनिटर साफ दिखना जरूरी है, ताकि पल्स रेट, ऑक्सीजन स्तर और अन्य निगरानी आंकड़े पढ़े जा सकें। डे-केयर श्रेणी में रेडियोथेरेपी ले रहे कैंसर मरीज, डायलिसिस करा रहे गुर्दे के रोगी और न्यूरो संबंधी डे-केयर उपचार वाले मरीज शामिल हैं। इनकी फोटो भी चिकित्सक के साथ जियो-टैग करके अपलोड करनी होगी। नीचे इस आदेश की शर्तों, विरोध और संभावित असर को प्रश्न रूप में समझाया गया है।
Rajasthan MAA Yojana 2026: मां योजना के तहत हर आठ घंटे फोटो अपलोड करने का नियम क्या कहता है?
एजेंसी के आदेश के अनुसार निजी अस्पताल की आईसीयू में भर्ती मरीज और उसका उपचार कर रहे डॉक्टर की फोटो हर आठ घंटे में पोर्टल पर डालनी होगी। फोटो जियो-टैग होनी चाहिए, ताकि स्थान और समय की पुष्टि हो सके। मॉनिटर पर मरीज की पल्स, ऑक्सीजन और अन्य रीडिंग स्पष्ट दिखनी अनिवार्य है। यह शर्त केवल भर्ती तक सीमित नहीं है। योजना से जुड़ी ट्रांजेक्शन आईडी के लिए भी यही प्रक्रिया अपनानी होगी। डे-केयर मामलों में कैंसर की रेडियोथेरेपी, डायलिसिस और न्यूरो डे-केयर शामिल किए गए हैं। एजेंसी का मत है कि नियमित फोटो से मरीज की वास्तविक उपस्थिति और इलाज की निरंतरता साबित होगी तथा गलत क्लेम की गुंजाइश घटेगी। अस्पतालों को 30 सितंबर से इस व्यवस्था का पालन करना है।
निजी अस्पताल और चिकित्सक संघ इस आदेश का विरोध क्यों कर रहा है?
राजस्थान निजी अस्पताल एवं चिकित्सक संघ के अध्यक्ष डॉ. विजय कपूर ने निर्देश को अव्यावहारिक और हास्यास्पद बताया है। उनके अनुसार इसका मतलब यह निकलता है कि वरिष्ठ चिकित्सकों को हर आठ घंटे मरीज के साथ अपनी उपस्थिति प्रमाणित करनी होगी। इससे अप्रत्यक्ष रूप से डॉक्टरों से चौबीस घंटे उपलब्ध रहने की अपेक्षा बनती है। कपूर ने कहा कि अदालतें और मानवाधिकार संस्थाएं रेजिडेंट डॉक्टरों के लंबे कार्य घंटों पर चिंता जताती रही हैं, जबकि ऐसा आदेश अतिरिक्त दबाव बढ़ाता है। संघ का रुख है कि मरीज की सही चिकित्सा और डॉक्टर की जवाबदेही जरूरी है, पर निगरानी के नाम पर चिकित्सकों को लगातार बंधक बनाना उचित नहीं। संघ जल्द औपचारिक प्रतिवेदन देगा और आदेश वापसी के लिए एक सप्ताह का समय मांगेगा।
आदेश वापस न लेने पर संघ कौन-सा कानूनी कदम उठा सकता है?
डॉ. कपूर ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में उचित कार्रवाई नहीं हुई तो संघ सक्षम न्यायालय में रिट याचिका दायर करेगा। उनका तर्क है कि निगरानी के वैकल्पिक तरीके हो सकते हैं, जैसे ऑडिट, रैंडम जांच या डिजिटल लॉग, जिनसे डॉक्टरों को हर शिफ्ट फोटो खिंचवाने की जरूरत न पड़े। संघ का कहना है कि आईसीयू में पहले से स्टाफ की कमी और आपात स्थिति रहती है। हर आठ घंटे फोटो अपलोड करने की प्रक्रिया इलाज के समय को प्रभावित कर सकती है। यदि अदालत में मामला गया तो आदेश की व्यावहारिकता, डॉक्टरों के कार्य घंटे और मरीज की गोपनीयता जैसे बिंदु उठाए जा सकते हैं। फिलहाल संघ संवाद का रास्ता खुला रखना चाहता है।
इस नियम से मरीजों के क्लेम और अस्पताल के कामकाज पर क्या असर पड़ सकता है?
एजेंसी की तरफ से नियम को क्लेम की सत्यता जांचने का साधन बताया जा रहा है। नियमित जियो-टैग फोटो से यह देखा जा सकता है कि मरीज वाकई आईसीयू या डे-केयर में है और मॉनिटर सक्रिय है। इससे फर्जी भर्ती या खाली बिस्तर पर क्लेम की शिकायतों पर अंकुश लग सकता है। अस्पतालों को όμως अतिरिक्त स्टाफ और समय लगाना होगा, क्योंकि हर आठ घंटे फोटो खींचना, जियो-टैग करना और पोर्टल पर अपलोड करना ऑपरेशन का हिस्सा बन जाएगा। रात की शिफ्ट में वरिष्ठ डॉक्टर की मौजूदगी हर बार सुनिश्चित करना छोटे निजी अस्पतालों के लिए मुश्किल हो सकता है। मरीज के परिजनों को भी बार-बार फोटो प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। नियम का अंतिम असर इस पर निर्भर करेगा कि पोर्टल कितना सुचारू रहता है और एजेंसी अपवादों को कैसे संभालती है।
डे-केयर मरीजों और ट्रांजेक्शन आईडी पर नियम कैसे लागू होगा?
डे-केयर श्रेणी में वे मरीज आएंगे जो रात भर भर्ती नहीं रहते, पर नियमित उपचार लेते हैं। रेडियोथेरेपी, डायलिसिस और न्यूरो डे-केयर सत्रों के दौरान मरीज तथा चिकित्सक की जियो-टैग फोटो अपलोड करनी होगी। ट्रांजेक्शन आईडी उन दावों से जुड़ी है जो योजना के पोर्टल पर दर्ज होते हैं। हर ऐसी आईडी के लिए भी फोटो शर्त अनिवार्य कर दी गई है। इसका मतलब है कि केवल लंबी भर्ती ही नहीं, छोटे सत्र वाले इलाज भी फोटो निगरानी के दायरे में आ गए हैं। अस्पतालों को सत्र शुरू होने और चलने के दौरान समय का रिकॉर्ड रखना होगा। संघ का कहना है कि डे-केयर में मरीज कम समय रुकते हैं, इसलिए हर आठ घंटे की आवृत्ति यहां और अधिक अव्यावहारिक हो सकती है। एजेंसी ने अभी इन श्रेणियों को नियम से बाहर नहीं किया है।
राजस्थान स्टेट हेल्थ एश्योरेंस एजेंसी का यह आदेश मां योजना के निजी अस्पतालों में क्लेम निगरानी को सख्त करने की दिशा में है। हर आठ घंटे जियो-टैग फोटो की शर्त से गंभीर मरीजों की उपस्थिति और इलाज का डिजिटल प्रमाण जुड़ सकता है। चिकित्सक संघ इसे डॉक्टरों के कार्य घंटों पर अतिरिक्त बोझ मानते हुए विरोध कर रहा है और एक सप्ताह में समाधान न होने पर रिट याचिका की तैयारी में है। आगे का रुख एजेंसी और संघ के बीच संवाद तथा किसी संभावित अदालती सुनवाई पर निर्भर करेगा।
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