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मन्ना डे: शास्त्रीय संगीत की पक्की नींव, पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई से ऐ मेरी जोहरा जबीं तक और फाल्के सम्मान

शास्त्रीय संगीत पर पकड़ वाले मन्ना डे ने कठिन से कठिन गीतों को भी सहज बना दिया।

पुराने रेडियो और माइक्रोफोन का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • हिंदी फिल्म संगीत के सुनहरे दौर में मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार के साथ एक और नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है, मन्ना डे।
  • 1940 के दशक की शुरुआत में मन्ना डे चाचा के साथ बंबई आए। यहां उन्होंने पहले चाचा के सहायक और फिर संगीतकार सचिन देव बर्मन के सहायक के तौर पर काम किया।
  • बांग्ला भाषा में मन्ना डे के आधुनिक गीत और फिल्मी गीत बेहद लोकप्रिय हुए।
  • जीवन के आखिरी वर्षों में मन्ना डे बेंगलुरु में रहे। उनकी पत्नी सुलोचना कुमारन केरल से थीं।

हिंदी फिल्म संगीत के सुनहरे दौर में मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार के साथ एक और नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है, मन्ना डे। शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि संगीतकार कठिन रागों पर आधारित गीतों के लिए अक्सर उन्हें ही चुनते थे। उन्होंने हिंदी, बांग्ला और कई दूसरी भाषाओं में हजारों गीत गाए। उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस लेख में जानिए मन्ना डे के जीवन, संगीत सफर और यादगार गीतों के बारे में।

जन्म और परिवार

मन्ना डे का जन्म 1 मई 1919 को कोलकाता में हुआ। उनका असली नाम प्रबोध चंद्र डे था। उनके चाचा कृष्ण चंद्र डे, जिन्हें के सी डे के नाम से जाना जाता है, अपने समय के मशहूर गायक और संगीतकार थे। मन्ना डे ने संगीत की शुरुआती शिक्षा चाचा से ही ली। बाद में उन्होंने उस्ताद दबीर खान और दूसरे गुरुओं से शास्त्रीय संगीत सीखा। कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से उन्होंने पढ़ाई की।

मुख्य बातें: पुराने रेडियो और माइक्रोफोन का प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

बंबई का सफर

1940 के दशक की शुरुआत में मन्ना डे चाचा के साथ बंबई आए। यहां उन्होंने पहले चाचा के सहायक और फिर संगीतकार सचिन देव बर्मन के सहायक के तौर पर काम किया। 1943 की फिल्म तमन्ना में उन्होंने सुरैया के साथ गीत गाया। 1950 में फिल्म मशाल के गीत ऊपर गगन विशाल से उन्हें पहचान मिली। शुरुआती सालों में उन्हें अक्सर भजन या शास्त्रीय गीतों तक सीमित रखा गया, लेकिन धीरे धीरे उन्होंने हर तरह के गीत गाए।

यादगार गीत

मन्ना डे के गाए कई गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं:

  • पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई, फिल्म मेरी सूरत तेरी आंखें।
  • लागा चुनरी में दाग, फिल्म दिल ही तो है।
  • ऐ मेरी जोहरा जबीं, फिल्म वक्त।
  • कसमे वादे प्यार वफा, फिल्म उपकार।
  • ऐ भाई जरा देख के चलो, फिल्म मेरा नाम जोकर।
  • यारी है ईमान मेरा, फिल्म जंजीर।
  • ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, फिल्म शोले, किशोर कुमार के साथ।
  • एक चतुर नार, फिल्म पड़ोसन, किशोर कुमार के साथ।

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राज कपूर और शंकर जयकिशन

राज कपूर की फिल्मों में मन्ना डे की आवाज खूब इस्तेमाल हुई। श्री 420 का प्यार हुआ इकरार हुआ और चोरी चोरी का ये रात भीगी भीगी जैसे गीत लता मंगेशकर के साथ उनके मशहूर युगल गीत हैं। संगीतकार शंकर जयकिशन, सलिल चौधरी और एस डी बर्मन के साथ उनकी जोड़ी बहुत सफल रही।

बांग्ला संगीत

बांग्ला भाषा में मन्ना डे के आधुनिक गीत और फिल्मी गीत बेहद लोकप्रिय हुए। कॉफी हाउस नाम का उनका बांग्ला गीत आज भी बंगाल में पीढ़ियों का पसंदीदा है। उन्होंने रवींद्र संगीत और भक्ति गीत भी गाए। गुजराती, मराठी, मलयालम, कन्नड़ और दूसरी भाषाओं में भी उनके गीत रिकॉर्ड हुए। मलयालम फिल्म चेम्मीन का एक गीत भी उनकी आवाज में प्रसिद्ध है।

गायकी की खासियत

मन्ना डे की आवाज में शास्त्रीय संगीत की गहराई और भाव की सहजता दोनों थे। वे हास्य गीत भी उतनी ही आसानी से गाते थे जितना गंभीर शास्त्रीय गीत। पड़ोसन के एक चतुर नार में उनकी और किशोर कुमार की जुगलबंदी आज भी संगीत प्रेमियों को हंसा देती है। हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला को भी उन्होंने अपनी आवाज दी।

सम्मान

  • पद्मश्री: 1971।
  • पद्म भूषण: 2005।
  • दादासाहेब फाल्के पुरस्कार: 2007 के लिए।

उन्हें सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्व गायक के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिले। मध्य प्रदेश सरकार के राष्ट्रीय लता मंगेशकर सम्मान समेत कई राज्य सम्मान भी उन्हें मिले।

आखिरी साल

जीवन के आखिरी वर्षों में मन्ना डे बेंगलुरु में रहे। उनकी पत्नी सुलोचना कुमारन केरल से थीं। 24 अक्टूबर 2013 को बेंगलुरु में 94 साल की उम्र में उनका निधन हुआ। उनकी आत्मकथा बांग्ला में जिबोनेर जलसाघोरे नाम से और अंग्रेजी में मेमोरीज कम अलाइव नाम से प्रकाशित हुई।

विरासत

आज के कई शास्त्रीय और फिल्मी गायक मन्ना डे को अपना आदर्श मानते हैं। रियलिटी शो में भी उनके गीत अक्सर गायकों की परीक्षा के तौर पर चुने जाते हैं, क्योंकि उन्हें गाना आसान नहीं है।

संगीतकारों की पसंद

संगीतकार अक्सर कहते थे कि जिस गीत में शास्त्रीय संगीत की बारीकियां हों, उसके लिए मन्ना डे से बेहतर कोई नहीं। फिल्म बसंत बहार में भीमसेन जोशी के साथ गाया गया केतकी गुलाब जूही गीत इसका बड़ा उदाहरण है। यह गीत शास्त्रीय संगीत की एक जुगलबंदी के रूप में दिखाया गया था और आज भी संगीत के छात्र इसे सुनते हैं। फिल्म काबुलीवाला का ऐ मेरे प्यारे वतन भी उनकी आवाज में बेहद भावुक गीत माना जाता है।

मन्ना डे का असली नाम क्या था

प्रबोध चंद्र डे।

उनके गुरु कौन थे

चाचा के सी डे, जो मशहूर गायक थे।

उनका निधन कब हुआ

24 अक्टूबर 2013 को बेंगलुरु में।

स्रोत: PIB: Dadasaheb Phalke Award to Manna Dey, Directorate of Film Festivals, Wikipedia: Manna Dey

लेखक

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी डेमोक्रेटिक भारत लाइव के संस्थापक, मालिक और संपादक हैं। डिजिटल मीडिया में 6 साल से अधिक के अनुभव के साथ वे मुख्य रूप से राजनीति और चुनाव की खबरें कवर करते हैं, साथ ही देश, कारोबार और खेल से जुड़ी अहम खबरों का संपादन करते हैं। वेबसाइट की संपादकीय नीति, तथ्य-जांच और प्रकाशित सामग्री की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की है।

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