भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट के माध्यम से एनवीएस-03 उपग्रह का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया है, जो देश की स्वदेशी नाविक नेविगेशन प्रणाली को और अधिक सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हुए चंडीगढ़ की ऑर्डनेंस फैक्टरी में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है। ये दोनों ही घटनाक्रम भारत की सैन्य और तकनीकी क्षमताओं में व्यापक सुधार लाने के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

नाविक प्रणाली और एनवीएस-03 का महत्व
इसरो द्वारा लॉन्च किया गया एनवीएस-03 उपग्रह भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली, जिसे नाविक के नाम से जाना जाता है, को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। यह प्रणाली भारत को वैश्विक पोजिशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस पर अपनी निर्भरता को चरणबद्ध तरीके से कम करने में सहायता प्रदान करेगी। युद्ध जैसी चुनौतीपूर्ण स्थितियों में यह स्वदेशी तकनीक भारतीय सेना के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण साबित होगी। नाविक प्रणाली की सटीकता और उपलब्धता को निरंतर सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एनवीएस श्रृंखला के उपग्रहों का प्रक्षेपण निरंतर जारी रखा गया है। यह उपग्रह न केवल तकनीकी स्वायत्तता को बढ़ावा देता है, बल्कि रणनीतिक रूप से भी देश की स्थिति को मजबूत करता है।
चंडीगढ़ में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का निर्माण
रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया पहल के अंतर्गत चंडीगढ़ स्थित ऑर्डनेंस फैक्टरी में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम सिग्मा-30 एन का निर्माण किया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली इंडियन ऑप्टिकल लिमिटेड और फ्रांसीसी कंपनी सफ्रान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड डिफेंस के बीच हुए एक महत्वपूर्ण समझौते के बाद ही इस परियोजना को धरातल पर उतारा जाना संभव हुआ है। इस परियोजना के लिए आवश्यक तकनीक फ्रांस से ली गई है, लेकिन इसका उत्पादन पूरी तरह से भारत के भीतर ही किया जा रहा है। यह आधुनिक तकनीक अब भारतीय सेना के टैंकों, तोपों और मिसाइलों जैसे महत्वपूर्ण सैन्य उपकरणों में उपयोग की जाएगी।
आत्मनिर्भरता और भविष्य की राह
अब तक भारतीय सेना को इस प्रकार के विशिष्ट नेविगेशन सिस्टम के लिए पूरी तरह से विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। 22 दिसंबर 2025 को हुए समझौते के बाद चंडीगढ़ की ऑर्डनेंस फैक्टरी ने अब तक 24 आईएनएस इकाइयां तैयार कर ली हैं। इन प्रणालियों की पहली खेप सूरत स्थित अत्याधुनिक रक्षा विनिर्माण और इंजीनियरिंग इकाई को भेजी जा चुकी है। समझौते के प्रावधानों के अनुसार, अगले 15 वर्षों तक इस सिस्टम के उत्पादन का विशेष अधिकार चंडीगढ़ की इस फैक्टरी के पास सुरक्षित रहेगा। यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है, जो भविष्य में अन्य रक्षा उपकरणों के स्वदेशी निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी।
सैन्य क्षमताओं में व्यापक बदलाव
स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम और नाविक की बढ़ती पहुंच से भारतीय सेना की मारक क्षमता और सटीक लक्ष्य भेदने की शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। मिसाइलों और टैंकों में इन प्रणालियों के एकीकरण से युद्ध के समय भारतीय सेना को एक रणनीतिक बढ़त प्राप्त होगी। इसरो और रक्षा उत्पादन इकाइयों का यह तालमेल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को और अधिक स्वायत्त और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है। भविष्य में इस प्रकार के और भी स्वदेशी रक्षा उपकरणों के निर्माण से भारत की वैश्विक स्थिति और अधिक मजबूत होगी, जिससे देश किसी भी आपात स्थिति के लिए पूरी तरह तैयार रह सकेगा। यह स्वदेशीकरण न केवल लागत में कमी लाएगा, बल्कि तकनीक के मामले में भारत की आत्मनिर्भरता को भी सिद्ध करेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और रक्षा मंत्रालय का यह संयुक्त प्रयास आने वाले समय में रक्षा क्षेत्र में भारत को एक अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में सहायक सिद्ध होगा। इन प्रणालियों का स्वदेशी निर्माण न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह किसी भी विदेशी प्रतिबंध या असहयोग की स्थिति में देश की सुरक्षा को अक्षुण्ण बनाए रखने में मदद करेगा।
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स्रोत: Amar Ujala, Amar Ujala





