JNU PG Admission: देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में शुमार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के नए सत्र के दाखिले इस वक्त भारी असमंजस के दौर से गुजर रहे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अहम अंतरिम आदेश पारित करते हुए जेएनयू प्रशासन को ‘डिप्रिवेशन पॉइंट्स’ के जरिए प्रवेश प्रक्रिया को अंतिम रूप देने पर रोक लगा दी है। अदालत का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब देश भर के तमाम छात्र अपनी काउंसलिंग और एडमिशन के अगले चरणों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। क्या इस कानूनी विवाद के चलते यूनिवर्सिटी का पूरा एकेडमिक शेड्यूल प्रभावित होगा या फिर प्रशासन अदालत में कोई नया और मजबूत पक्ष रखेगा? यह सवाल इस समय शिक्षा जगत के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।

JNU PG Admission: क्या हैं डिप्रिवेशन पॉइंट्स और कैसे तय होती है व्यवस्था

इस पूरे विवाद के केंद्र में जेएनयू के प्रॉस्पेक्टस के सेक्शन V में दिया गया ‘डिप्रिवेशन पॉइंट्स’ का वह प्रावधान है, जो लंबे समय से यूनिवर्सिटी की प्रवेश नीति का अहम हिस्सा रहा है। इसके तहत उन उम्मीदवारों को अतिरिक्त अंक या वंचना अंक दिए जाते हैं जिनके पिछले शैक्षणिक संस्थान या स्कूल-कॉलेज भौगोलिक रूप से पिछड़े, ग्रामीण या वंचित क्षेत्रों में स्थित रहे हैं। मौजूदा नियमों के मुताबिक, किसी भी छात्र को अधिकतम 12 डिप्रिवेशन पॉइंट्स मिल सकते हैं, जहां प्रत्येक पॉइंट को 3 अंकों के बराबर माना जाता है। इस गणित के हिसाब से किसी भी उम्मीदवार के राष्ट्रीय स्तर के प्रवेश परीक्षा स्कोर में अधिकतम 36 अतिरिक्त अंक तक जुड़ सकते हैं। इसी पुरानी व्यवस्था को अब अदालत में चुनौती दी गई है, जिसके बाद से यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है।

छात्र की याचिका और अदालत की सख्त टिप्पणियां

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब अमित मेहरा नामक एक छात्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जेएनयू की इस चयन नीति को चुनौती दी। याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट यानी CUET जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा में छात्र द्वारा प्राप्त किए गए मूल अंकों में इस तरह बाद में अंक जोड़ना पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगाता है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जस्मीत सिंह की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रथम दृष्टया विश्वविद्यालय प्रशासन की दलीलों पर अपनी असहमति जताई और साफ कहा कि परीक्षा के बाद इस तरह स्कोर में संशोधन करना निष्पक्षता की मूल भावना को प्रभावित करता है।

JNU PG Admission: अचानक बदला कानूनी रुख और विश्वविद्यालय का बचाव

अदालत की इस सख्ती के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से भी अपनी नीति के समर्थन में दलीलें पेश की गईं। जेएनयू के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य देश के दूरदराज और पिछड़े इलाकों से आने वाले मेधावी छात्रों को समान अवसर प्रदान करना है ताकि वे मुख्यधारा की उच्च शिक्षा से वंचित न रह जाएं। इसके समर्थन में साल 1966 के जेएनयू अधिनियम और अकादमिक काउंसिल द्वारा स्वीकृत प्रावधानों का हवाला दिया गया। यूनिवर्सिटी ने यह भी दलील दी कि इस प्रक्रिया के तहत कई छात्रों को पहले ही प्रवेश के ऑफर लेटर जारी किए जा चुके हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दाखिलों को यूं ही आगे बढ़ने दिया गया और बाद में यह नियम अवैध पाया गया, तो ऐसी स्थिति बन जाएगी जिसे संभालना बहुत मुश्किल होगा।
इस बीच यह भी देखने वाली बात है कि राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं और संस्थानों की अपनी आंतरिक नीतियों के बीच का यह टकराव आने वाले दिनों में देश के अन्य विश्वविद्यालयों की चयन प्रक्रियाओं को किस हद तक प्रभावित करता है। जेएनयू प्रशासन के लिए अपने सामाजिक समावेश के इस पारंपरिक मॉडल को अदालत में सही साबित करना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
दिल्ली हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद अब अगली कानूनी सुनवाई 24 अगस्त 2026 को तय की गई है। अदालत के इस फैसले पर देश भर के हजारों छात्रों और शिक्षाविदों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इस पर आने वाला अंतिम निर्णय कई विश्वविद्यालयों की प्रवेश नीतियों की दिशा तय कर सकता है। मामले की आगे की जानकारी अभी आनी बाकी है, और अब सबकी नजर इस बात पर है कि अगली तारीख पर अदालत क्या रुख अपनाती है।

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