भारतीय राजनीति में आया राम, गया राम का मुहावरा 1967 में हरियाणा के एक विधायक के एक ही दिन में कई बार पार्टी बदलने के बाद मशहूर हुआ। उस दौर में बड़े पैमाने पर दल-बदल से कई राज्य सरकारें गिरीं। इसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए 1985 में संविधान का 52वां संशोधन किया गया और संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसे आम बोलचाल में दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं, दोनों पर लागू होता है।
किन हालात में सदस्यता जाती है
दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुने गए सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है अगर:
- वह अपनी मर्जी से उस दल की सदस्यता छोड़ देता है
- सदन में मतदान के समय दल के निर्देश यानी व्हिप के खिलाफ वोट देता है या वोटिंग से गैरहाजिर रहता है, और दल 15 दिन के भीतर इसे माफ नहीं करता
अदालतों ने साफ किया है कि पार्टी छोड़ना सिर्फ इस्तीफा देने तक सीमित नहीं है। सदस्य का आचरण, जैसे विरोधी दल के मंच पर जाकर उसका प्रचार करना, भी इस बात का सबूत माना जा सकता है कि उसने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ दी।

निर्दलीय और मनोनीत सदस्य
- निर्दलीय चुना गया सदस्य अगर चुनाव के बाद किसी दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य हो जाता है
- मनोनीत सदस्य सदन में सीट लेने के छह महीने के भीतर किसी दल में शामिल हो सकता है, इसके बाद शामिल होने पर वह अयोग्य हो जाता है
विलय का नियम
मूल कानून में यह प्रावधान था कि किसी दल के एक तिहाई सदस्य अलग होकर नया गुट बनाएं, तो उसे टूट मानकर अयोग्यता से छूट मिलेगी। इस प्रावधान का भारी दुरुपयोग हुआ। इसलिए 2003 में 91वें संविधान संशोधन से टूट वाला यह प्रावधान हटा दिया गया। अब छूट सिर्फ विलय की स्थिति में मिलती है, जब किसी विधायक दल के कम से कम दो तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय के लिए सहमत हों। इसी संशोधन में मंत्रिपरिषद का आकार भी सदन की कुल संख्या के 15 प्रतिशत तक सीमित किया गया और दल-बदल कर अयोग्य हुए सदस्य के मंत्री बनने पर रोक लगाई गई।
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फैसला कौन करता है
दल-बदल के मामलों में फैसला लोकसभा या विधानसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा या विधान परिषद के सभापति करते हैं। मूल कानून में यह भी कहा गया था कि उनका फैसला अंतिम होगा और अदालतें इसमें दखल नहीं देंगी।
किहोतो होलोहन फैसला
1992 में किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हु मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दसवीं अनुसूची को वैध ठहराया। अदालत ने कहा कि यह कानून राजनीतिक नैतिकता को मजबूत करता है और सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता। लेकिन अदालत ने अदालतों को दखल से रोकने वाला हिस्सा खारिज कर दिया और कहा कि अध्यक्ष इन मामलों में एक न्यायाधिकरण की तरह काम करते हैं, इसलिए उनके फैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
समय सीमा का सवाल
कानून में अध्यक्ष के लिए फैसला करने की कोई समय सीमा तय नहीं है। इस वजह से कई बार दल-बदल की याचिकाएं महीनों या सालों तक लंबित रहीं। 2020 में कीशम मेघचंद्र सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अध्यक्ष को ऐसी याचिकाओं पर उचित समय में, आम तौर पर तीन महीने के भीतर फैसला करना चाहिए, जब तक कोई असाधारण परिस्थिति न हो।
राज्यसभा चुनाव और व्हिप
राज्यसभा चुनाव में विधायक खुली मतपत्र प्रणाली से वोट देते हैं और उन्हें अपना मतपत्र पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाना होता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप नैयर मामले में कहा था कि राज्यसभा चुनाव सदन की कार्यवाही नहीं है, इसलिए पार्टी लाइन के खिलाफ वोट देने पर दसवीं अनुसूची के तहत सीधे अयोग्यता नहीं होती, हालांकि पार्टी अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है।
आलोचना और सुझाव
- आलोचकों का कहना है कि व्हिप की बाध्यता से सांसद-विधायक अपनी अंतरात्मा या अपने क्षेत्र के हित में स्वतंत्र वोट नहीं दे पाते
- अध्यक्ष खुद किसी दल से आते हैं, इसलिए उनके फैसले की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं
- कई विशेषज्ञ समितियों और विधि आयोग ने सुझाव दिया है कि अयोग्यता का फैसला चुनाव आयोग की सलाह से राष्ट्रपति या राज्यपाल करें, या व्हिप सिर्फ अविश्वास प्रस्ताव और धन विधेयक जैसे अहम मतदानों तक सीमित हो
- इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने के रास्ते से भी कानून की भावना कमजोर होने की बात कही जाती है
क्या दल-बदल कानून राष्ट्रपति चुनाव में लागू होता है
दसवीं अनुसूची सदन के भीतर मतदान पर लागू होती है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में पार्टियां व्हिप जारी नहीं करतीं और यह चुनाव गुप्त मतदान से होता है।
अयोग्य सदस्य दोबारा चुनाव लड़ सकता है क्या
हां, दल-बदल के आधार पर अयोग्यता सदन की उस सदस्यता के लिए होती है। ऐसा सदस्य उपचुनाव या अगले चुनाव में दोबारा उम्मीदवार बन सकता है।





