Black Hole Math: स्टीफन हॉकिंग ने 1974 में एक पेपर में छोटे ब्लैक होल के खत्म होने पर रेडियो ऊर्जा के विस्फोट की भविष्यवाणी की थी। ऑस्ट्रेलियाई इंजीनियर जॉन ओ सुलिवन ने उस विस्फोट को खोजने की कोशिश की। खोज खाली हाथ लौटी लेकिन उस दौरान विकसित सिग्नल प्रोसेसिंग तकनीक बाद में घरों के अंदर तेज वायरलेस नेटवर्क की समस्या हल करने में काम आई।
ऑस्ट्रेलिया की वैज्ञानिक एजेंसी सीएसआईआरओ ने इसे यूएस पेटेंट 5,487,069 में बदला। इस पेटेंट से 430 मिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर से ज्यादा रॉयल्टी मिली। आज हर राउटर में इसी गणित का वंशज चलता है।
Black Hole Math: हॉकिंग की 1974 की भविष्यवाणी
हॉकिंग के दो पेज के पेपर में कहा गया कि छोटे ब्लैक होल क्वांटम प्रभाव से कण लीक करते हैं और सिकुड़ते जाते हैं। सूर्य जितने द्रव्यमान वाले ब्लैक होल को ब्रह्मांड की उम्र से ज्यादा समय लगेगा। बहुत छोटे वाले पहले ही खत्म हो चुके होंगे। अंत में रेडियो तरंगों सहित ऊर्जा का विस्फोट होगा। यह खगोलीय पैमाने पर छोटा लेकिन रेडियो पैमाने पर संकेत जैसा था।
रेडियो पल्स क्यों बिखर जाती है
ब्लैक होल से निकलने वाली पल्स अंतरिक्ष में गैस और धूल के कारण अलग-अलग आवृत्तियों पर अलग गति से चलती है। इससे साफ स्पाइक फैलकर कमजोर हो जाता है। खगोलविद इसे डिस्पर्शन कहते हैं। ओ सुलिवन को इसी बिखरी हुई पल्स को शोर से निकालना था। फास्ट फूरियर ट्रांसफॉर्म से आवृत्तियों को अलग करके देरी उलट दी जाती है। इसे डीडिस्पर्शन कहा जाता है।
खोज असफल रही लेकिन टूलकिट बचा
ओ सुलिवन ने 1974 में सिडनी विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट पूरा किया और नीदरलैंड्स में रेडियो एस्ट्रोनॉमी पर काम किया। 1978 में टीम ने माइक्रोसेकंड रेडियो ट्रांजिएंट्स की सर्वे रिपोर्ट प्रकाशित की। विस्फोट आज तक नहीं मिला। आधी सदी की खोजों से सिर्फ ऊपरी सीमाएं ही मिलीं। जो बचा वह सिग्नल प्रोसेसिंग का तरीका था।
इंडोर वायरलेस की समस्या
घर के अंदर रेडियो सिग्नल दीवारों और फर्नीचर से टकराकर कई रास्तों से पहुंचता है। अलग-अलग समय पर आने वाले सिग्नल ओवरलैप हो जाते हैं। इसे मल्टीपाथ कहते हैं। तेज स्पीड पर एक सिंबल का इको अगले पर चढ़ जाता है। इसे इंटरसिंबल इंटरफेरेंस कहा जाता है। इससे इंडोर स्पीड सीमित हो जाती थी।
Black Hole Math: सीएसआईआरओ का पेटेंट क्या कहता है
1996 में मिला यूएस पेटेंट तीन तकनीकों को जोड़ता है। पैरलल सब-चैनल्स यानी ओएफडीएम से डेटा कई धीमी कैरियर पर बांटा जाता है। फॉरवर्ड एरर करेक्शन से नुकसान ठीक होता है। बिट इंटरलीविंग से गड़बड़ी फैल जाती है। ये तीनों मिलकर इंडोर वायरलेस को तेज बनाते हैं। 802.11ए और 802.11जी में यही फिजिकल लेयर बनी।
रॉयल्टी और कानूनी लड़ाई
सीएसआईआरओ ने 2005 में टेक्सास में मुकदमे शुरू किए। 2009 में 14 कंपनियों से 205 मिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर का समझौता हुआ। 2012 में दूसरे राउंड में 220 मिलियन से ज्यादा मिले। कुल 430 मिलियन से ऊपर पहुंच गया। सिस्को मामले में भी नुकसान का फैसला आया। पेटेंट 2013 में खत्म हो गया।
Black Hole Math: भारत में 6 गीगाहर्ट्ज बैंड का मतलब
20 जनवरी 2026 को भारत ने 5925 से 6425 मेगाहर्ट्ज बैंड को लाइसेंस फ्री कर दिया। इससे 500 मेगाहर्ट्ज साफ स्पेक्ट्रम वाई-फाई के लिए उपलब्ध हुआ। वाई-फाई 6ई और 7 हार्डवेयर को गिगाबिट स्पीड के लिए चौड़े चैनल मिल सकते हैं। पुराने डिवाइस में यह बैंड नहीं दिखेगा।
घर के नेटवर्क के लिए सबक
एक्सेस पॉइंट अलग चैनल पर रखें। स्थिर डिवाइस को ईथरनेट से जोड़ें। मांग वाले काम के लिए 5 या 6 गीगाहर्ट्ज इस्तेमाल करें। चौड़े चैनल सावधानी से चुनें। राउटर खुली जगह पर रखें। ये उपाय मल्टीपाथ के प्रभाव को कम करते हैं।
Black Hole Math: आगे की राह
वाई-फाई 8 विश्वसनीयता बढ़ाने पर फोकस करेगा। ओएफडीएम और चौड़े चैनल वैसे ही रहेंगे। हॉकिंग का विस्फोट अभी भी नहीं मिला है। खोज जारी है। ऑस्ट्रेलियाई टैक्सपेयर्स की फंडिंग वाली असफल खोज ने साइड डोर से करोड़ों कमाए और आज हर राउटर में वही गणित चल रहा है।
स्टीफन हॉकिंग की ब्लैक होल भविष्यवाणी से शुरू हुई खोज असफल रही लेकिन जॉन ओ सुलिवन के सिग्नल प्रोसेसिंग तरीके ने इंडोर वाई-फाई को संभव बनाया। सीएसआईआरओ के 1996 पेटेंट ने 430 मिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर से ज्यादा कमाए। ओएफडीएम, एरर करेक्शन और इंटरलीविंग आज भी आधार हैं। भारत में 6 गीगाहर्ट्ज बैंड खुलने से नई स्पीड संभव हुई है। पेटेंट खत्म हो चुका है लेकिन तकनीक हर घर में काम कर रही है
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