ताज़ा खबर
वोटर लिस्ट में नाम कैसे चेक करें: ऑनलाइन तरीका, वोटर हेल्पलाइन ऐप और नाम न मिलने पर फॉर्म 6 राज्यसभा चुनाव कैसे होता है: विधायकों की वोटिंग, कोटा फॉर्मूला और खुला मतदान, पूरी प्रक्रिया समझें प्रिस्क्रिप्शन दवा के विज्ञापन पर सख्ती का प्रस्ताव: रिटेलर और डिस्ट्रीब्यूटर को भी लेनी होगी केंद्र की मंजूरी Sugar Price Today 10 October 2026: चीनी का भाव ₹55.34 किलो, जानें थोक रेट और नया अपडेट सोने-चांदी के खरीदारी से पहले जानें 22 और 24 कैरेट गोल्ड का रेट त्योहारी सीजन से पहले योगी के निर्देश: हर शिकायत पर 24 घंटे में जवाब, 15 दिन में निपटें राजस्व मामले Petrol-Diesel Price 10 October 2026: दिल्ली से लखनऊ तक पेट्रोल-डीजल के भाव, जानें ताजा रेट यूपी कैबिनेट के 39 फैसले: भदोही का नया नाम, एआई मिशन और टैक्स ब्याज माफी योजना को मंजूरी
ट्रेंडिंग
धर्म

Aarti Rules: पूजा में आरती हमेशा 3, 5 या 7 की संख्या में ही क्यों की जाती है, इसके धार्मिक और शास्त्रीय नियम क्या है?

Aarti Rules: पूजा में आरती हमेशा 3, 5 या 7 की संख्या में ही क्यों की जाती है, इसके धार्मिक और शास्त्रीय नियम क्या है?
Aarti Rules
Aarti Rules: सनातन परंपरा में जब भी हम अपने आराध्य के सामने दीप जलाकर उनकी वंदना करते हैं, तो मन में एक अलौकिक शांति का अनुभव होता है। हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ, कथा या बड़े धार्मिक अनुष्ठान का समापन आरती के बिना अधूरा माना जाता है। आपने अक्सर अपने घरों में या फिर मंदिरों में लोगों को यह कहते हुए जरूर सुना होगा कि आरती हमेशा 3, 5, 7 या फिर 11 की संख्या में ही घुमानी चाहिए। लेकिन क्या कभी आपके मन में यह सवाल आया है कि इसे 2, 4 या 6 जैसी सम संख्याओं में क्यों नहीं उतारा जाता? इसके पीछे केवल कोई साधारण लोक परंपरा नहीं, बल्कि गहरा शास्त्रीय और आध्यात्मिक रहस्य छिपा है।

Aarti Rules: प्राचीन ग्रंथों में छिपे हैं आरती के कड़े नियम

हमारे शास्त्रों और पुराणों में पूजा-पाठ की हर एक विधि के पीछे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं। हिंदू धर्म के प्रसिद्ध हरिभक्तिविलास ग्रंथ में इस बात का बड़ा सुंदर और तार्किक वर्णन मिलता है कि भगवान के किस अंग के सामने दीपक कितनी बार घुमाया जाना चाहिए। ग्रंथ में बताए गए श्लोक के अनुसार भगवान के श्रीचरणों यानी पैरों में चार बार आरती की लौ घुमाने का विधान है। इसके ठीक बाद प्रभु की नाभि के समक्ष दो बार और उनके मुखारविंद यानी चेहरे के सामने एक बार दीपक घुमाया जाता है। इसके अलावा भगवान के संपूर्ण शरीर यानी सिर से लेकर पैर तक सात बार दीपक घुमाने की परंपरा है। यह पूरा क्रम एक निश्चित विधि से आगे बढ़ता है, जो व्यक्ति को आंतरिक ऊर्जा से भर देता है।

त्रिदेव और पंचतत्व का अद्भुत संतुलन

सनातन संस्कृति में विषम संख्याओं का सीधा संबंध ब्रह्मांडीय ऊर्जा और दिव्यता से माना गया है। अंक तीन का सीधा अर्थ हमारे त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश से है, जो इस सृष्टि के संचालनकर्ता हैं। इसके अलावा यह संख्या प्रकृति के तीन प्रमुख गुणों—सत्व, रज और तम को भी दर्शाती है। वहीं, संख्या पांच का महत्व हमारे जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है क्योंकि हमारा शरीर और यह पूरा संसार पांच तत्वों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिलकर बना है। पूजा के दौरान इस्तेमाल होने वाला पंचदीप इन्हीं पांचों तत्वों को शांत और संतुलित करने का काम करता है। सात अंक का महत्व भी हमारे सप्तऋषि, सात लोकों और शरीर के सात मुख्य ऊर्जा चक्रों से जुड़ा है।

गतिशीलता और सकारात्मकता का अदृश्य चक्र

अंकशास्त्र के जानकारों का मानना है कि सम संख्याएं जैसे दो, चार या छह एक तरह के ठहराव और स्थिरता का प्रतीक होती हैं। इसके विपरीत, विषम संख्याएं यानी तीन, पांच और सात गतिशीलता, निरंतरता और आगे बढ़ने की ऊर्जा का संकेत देती हैं। भक्ति कभी रुकती नहीं है, बल्कि वह हमेशा ईश्वर की ओर बहती रहती है। इसलिए विषम संख्या में आरती करने से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और घर में सकारात्मकता का संचार होता है। मामला कुछ इस तरह से है कि जब आप पूरी श्रद्धा के साथ इस विधि का पालन करते हैं, तो मन का भटकाव अपने आप कम होने लगता है।

आरती के बाद हथेलियों को आंखों से लगाने का रहस्य

जानकार बताते हैं कि जब आरती पूरी हो जाती है, तो उसके बाद लौ पर हाथ फेरकर उसे अपनी आंखों और सिर पर लगाने की परंपरा भी बेहद खास है। यह सिर्फ एक साधारण सी क्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपने भीतर समाहित करने का भाव छिपा होता है। हालांकि, यह भी सच है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में कई बार लोग इन सूक्ष्म नियमों को नजरअंदाज करने लगे हैं। क्या हम सच में जानते हैं कि हमारी हर एक परंपरा के पीछे कितना बड़ा विज्ञान छिपा है? यह सवाल आज भी अपनी जगह कायम है।

Aarti Rules: आस्था और विज्ञान का मेल है सनातन परंपरा

पूजा-पाठ की ये तमाम पद्धतियां केवल दिखावा नहीं हैं, बल्कि यह मानव जीवन को एक सही दिशा देने का माध्यम हैं। जब कोई व्यक्ति पूरी तल्लीनता के साथ इन नियमों का पालन करता है, तो उसे मानसिक शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी रहती है कि आने वाली पीढ़ी इन सांस्कृतिक धरोहरों को कितना सहेज पाती है। मामले की आगे की जानकारी धार्मिक आयोजनों और विद्वानों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती है।

यह भी पढ़ें

लेखक

Sanjna Gupta

संजना गुप्ता डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी कंटेंट राइटर हैं और मुख्य रूप से लाइफस्टाइल, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। इससे पहले वे बीबी डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड में सोशल मीडिया कंटेंट राइटर रह चुकी हैं और दैनिक भास्कर में इंटर्नशिप कर चुकी हैं।

टिप्पणियां (2)

अपनी राय लिखें

WhatsApp Facebook X