Teachers Day 2026: भारत की पावन भूमि पर प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस (Teachers’ Day) अत्यंत श्रद्धा, गरिमा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पावन दिन स्वतंत्र भारत के दूसरे राष्ट्रपति, महान शिक्षाविद, प्रख्यात दार्शनिक और भारत रत्न से अलंकृत डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। वर्ष 1962 में शुरू हुई यह परंपरा आधुनिक भारत में गुरु-शिष्य संबंधों की पवित्रता को पुनर्स्थापित करने और राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों के अप्रतिम योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का सबसे बड़ा मंच बन चुकी है।
शिक्षक दिवस केवल कक्षाओं में पुष्प भेंट करने या सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित कोई रस्म नहीं है, बल्कि यह उस शाश्वत चेतना का स्मरण है जो विद्यार्थी को अज्ञान के गहन अंधकार से निकालकर विवेक और सत्य के आलोक की ओर अग्रसर करती है। भारतीय संत परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोच्च शिखर पर माना गया है। 15वीं शताब्दी के महान समाज सुधारक और रहस्यवादी कवि संत कबीर दास ने अपने सहज, सधुक्कड़ी दोहों के माध्यम से गुरु की महिमा, उनकी आवश्यकता और शिष्य के मानसिक रूपांतरण की प्रक्रिया को ऐसे अनूठे ढंग से रेखांकित किया है, जो डिजिटल और एआई (AI) के इस आधुनिक युग में भी हमारे जीवन को नई दिशा दिखाते हैं।
Teachers Day 2026: ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े’
संत कबीर दास का यह कालजयी दोहा संपूर्ण भारतीय गुरु परंपरा का प्राण माना जाता है:
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
इस दोहे में कबीर दास ने एक अद्भुत आध्यात्मिक द्वंद्व की रचना की है। वे कल्पना करते हैं कि यदि उनके सामने साक्षात जगन्नियंता ‘गोविंद’ (ईश्वर) और उन्हें ज्ञान देने वाले ‘गुरु’ दोनों एक साथ आकर खड़े हो जाएं, तो शिष्य के मन में यह स्वाभाविक असमंजस होगा कि वह सर्वप्रथम किसके चरणों में अपना शीश नवाए। इस स्थिति का समाधान देते हुए कबीर कहते हैं कि वे सर्वप्रथम अपने गुरु के चरणों की वंदना करेंगे और उन पर स्वयं को न्योछावर करेंगे।
इसके पीछे का गूढ़ तर्क यह है कि यदि गुरु ने अपने ज्ञान, साधना और मार्गदर्शन से परमात्मा के स्वरूप का बोध न कराया होता, तो शिष्य अज्ञानतावश ईश्वर के अस्तित्व और सत्य को कभी पहचान ही नहीं पाता। आधुनिक शिक्षा के परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ यह है कि संसार में असीमित संभावनाएं और ज्ञान का भंडार बिखरा पड़ा है, किंतु उस ज्ञान को समझने, आत्मसात करने और उसे जीवन में उपयोगी बनाने की दृष्टि केवल एक योग्य शिक्षक ही प्रदान करता है।
‘गुरु कुम्हार शिष कुंभ है’: अनुशासन की चोट और भीतर से प्रेम का संबल
गुरु और शिष्य के अंतर्संबंधों में अनुशासन और करुणा के संतुलन को कबीर ने अत्यंत सुंदर रूपक के माध्यम से समझाया है:
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
कबीर कहते हैं कि गुरु एक कुशल कुम्हार की भांति होता है और शिष्य कच्ची गीली मिट्टी के घड़े के समान होता है। जिस प्रकार कुम्हार एक सुंदर, सुडौल और उपयोगी घड़ा तैयार करने के लिए बाहर से लकड़ी की थापी से कड़े प्रहार करता है, किंतु साथ ही घड़ा टूट न जाए इसलिए भीतर से अपने दूसरे हाथ का कोमल सहारा देता रहता है; ठीक उसी प्रकार एक सच्चा शिक्षक शिष्य के चरित्र को गढ़ने का कार्य करता है।
कक्षा या जीवन में शिक्षक द्वारा दी जाने वाली डांट, नियम और अनुशासन की कठोरता ऊपर से भले ही अप्रिय लगे, किंतु उसके अंतःकरण में शिष्य के प्रति केवल स्नेह, सुरक्षा और सुधार की भावना होती है। यह दोहा आज के शिक्षा तंत्र को यह गहरा संदेश देता है कि शिक्षा केवल विषय रटाने का माध्यम नहीं है, बल्कि शिष्य के भीतर की कमजोरियों, अहंकार और अवगुणों को छांटकर उसे एक सुसंस्कृत नागरिक में तब्दील करने की सतत शिल्पकारी है।
‘सब धरती कागद करूं’: गुरु की अनंत महिमा और शिष्य का समर्पण
गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान और उसकी कृपा की विशालता को शब्दों में बांधना कितना असंभव है, इसे कबीर ने इस दोहे में व्यक्त किया है:
सब धरती कागद करूं, लेखनि सब बनराय।
सात समुंद्र की मसि करूं, गुरु गुन लिखा न जाय॥
कबीर दास जी कहते हैं कि यदि संपूर्ण पृथ्वी के धरातल को एक विशाल कागज बना दिया जाए, संसार के सभी वनों और वृक्षों की टहनियों को कलम (लेखनी) का रूप दे दिया जाए और सातों महासागरों के जल को स्याही में परिवर्तित कर दिया जाए, तब भी गुरु के उपकारों, उनके गुणों और उनकी महिमा का संपूर्ण वर्णन लिखकर पूरा नहीं किया जा सकता।
यह दोहा शिष्य के मन में गुरु के प्रति असीम कृतज्ञता का भाव जाग्रत करता है। जीवन में जब भी कोई व्यक्ति किसी मुकाम पर पहुंचता है—चाहे वह वैज्ञानिक बने, प्रशासनिक अधिकारी बने या राष्ट्र का कर्णधार बने—उसकी नींव में उसके प्राथमिक शिक्षकों का ही पसीना छिपा होता है। गुरु का ऋण भौतिक संपदा या औपचारिक उपहारों से कभी नहीं चुकाया जा सकता; यह केवल उनके प्रति आजीवन श्रद्धा और उनके दिखाए सत्य के मार्ग पर चलकर ही अभिव्यक्त किया जा सकता है।
‘गुरु बिन ज्ञान न उपजै’: सूचना के महासागर में सही दिशा का संबल
ज्ञान के उद्भव और विवेक की प्राप्ति में शिक्षक की अपरिहार्यता को कबीर ने इन पंक्तियों में स्पष्ट किया है:
गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥
कबीर का सुस्पष्ट मत है कि बिना गुरु के सच्चा ज्ञान कभी उत्पन्न नहीं हो सकता और न ही अज्ञान के बंधनों से मुक्ति मिल सकती है। गुरु के मार्गदर्शन के अभाव में व्यक्ति न तो सत्य को समझ सकता है और न ही अपने मानसिक दोषों और पूर्वाग्रहों का निवारण कर सकता है।
वर्तमान डिजिटल युग में जब इंटरनेट, सर्च इंजन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से तथ्यों और सूचनाओं की बाढ़ आ चुकी है, तब कबीर का यह विचार सर्वाधिक प्रासंगिक सिद्ध होता है। आज विद्यार्थी के पास जानकारी की कोई कमी नहीं है, किंतु ‘सूचना’ (Information) और ‘विवेकपूर्ण ज्ञान’ (Wisdom) के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है। किसी सूचना का सही संदर्भ क्या है, उसका नैतिक उपयोग कैसे होना चाहिए और जीवन की विकट परिस्थितियों में सही फैसला कैसे लेना चाहिए—यह समझ कोई मशीन नहीं सिखा सकती। इसके लिए एक संवेदनशील, अनुभवी और जीवंत शिक्षक के मार्गदर्शन की ही अनिवार्य आवश्यकता होती है।
Teachers Day 2026: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का प्रेरक संकल्प
भारत में शिक्षक दिवस का इतिहास एक अत्यंत गरिमामयी और निस्वार्थ प्रसंग से जुड़ा है। 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुत्तनी में जन्मे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्राच्य धर्म और नीतिशास्त्र के प्रोफेसर रहे, आंध्र और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति व द्वितीय राष्ट्रपति बने।
वर्ष 1962 में जब वे राष्ट्रपति बने, तो उनके कुछ छात्र और प्रशंसक उनका जन्मदिवस औपचारिक रूप से मनाने के लिए उनके पास पहुंचे। डॉ. राधाकृष्णन ने अत्यंत विनम्रता के साथ कहा, “मेरे जन्मदिन को व्यक्तिगत रूप से मनाने के बजाय, यदि 5 सितंबर का दिन पूरे देश में शिक्षकों के सम्मान के लिए ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में समर्पित किया जाए, तो यह मेरे लिए सबसे बड़ा गौरव और उपहार होगा।” उनके इस पावन विचार ने भारत में शिक्षकों को राष्ट्रव्यापी सम्मान दिलाने की नींव रखी।
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