Kainchi Dham Yatra: कैंची धाम की चर्चा इन दिनों फिर तेज है। फिल्म हनुमान अंश में यह आश्रम दिखाए जाने के बाद लोग नीम करौली बाबा के किस्से दोहरा रहे हैं। पहाड़ पर शांति खोजने वाले यहां पहुंच रहे हैं। लेकिन महाराज जी का काम सिर्फ एक धाम तक नहीं सिमटा। उत्तराखंड, दिल्ली और वृंदावन में उन्होंने जो मंदिर और आश्रम बनवाए, उनकी कहानी अक्सर पीछे छूट जाती है। सवाल यही है कि कैंची देखने के बाद श्रद्धालु अगला पड़ाव कहां तय करें।

नीम करौली बाबा को लोग महाराज जी कहकर पुकारते हैं। मूल मंत्र छोटा था। सबको प्यार करो, सबकी सेवा करो, भगवान को याद रखो। विराट कोहली से लेकर मार्क जुकरबर्ग तक बड़ी हस्तियां कैंची धाम आ चुकी बताई जाती हैं। भीड़ उसी एक पते पर टिक गई है। चार और ठिकाने ऐसे हैं जहां बाबा की छाप आज भी दिखती है। उनमें से एक दिल्ली के बीच यमुना किनारे है, जहां खुदाई में मूर्ति निकलने की बात पुजारी आज भी बताते हैं।

Kainchi Dham Yatra: नीम करौली बाबा कौन थे

बाबा का नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था। जन्म करीब 1900 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। नाम नीम करौली कैसे पड़ा, यह किस्सा सबसे ज्यादा सुनाया जाता है। एक बार बिना टिकट ट्रेन में सफर चल रहा था। टीटीई ने उन्हें नीम करौली नामक स्थान पर उतार दिया। गाड़ी वहीं अटक गई। आग्रह के बाद जब बाबा फिर सवार हुए, ट्रेन चली। तभी से लोग उन्हें नीम करौली बाबा कहने लगे।

यह प्रसंग आस्था का हिस्सा है, दस्तावेज की भाषा में नहीं बांधा जा सकता। फिर भी यही घटना उनके लोकनाम की जड़ मानी जाती है। मुख्य और सबसे प्रसिद्ध आश्रम नैनीताल के पास कैंची धाम है। देश-विदेश से दर्शनार्थी यहां पहुंचते हैं। पहाड़ की ठंडी हवा और हनुमान भक्ति का मेल जगह को चर्चित बनाए रखता है। देखने पर लगता है कि फिल्म ने सिर्फ भीड़ बढ़ाई है, बाकी पते अब भी कम लोग जानते हैं।

हनुमान गढ़ी: नैनीताल के पास पहली कुटिया

Kainchi Dham Yatra
Kainchi Dham Yatra

कैंची धाम के अलावा नैनीताल शहर के पास हनुमान गढ़ी का निर्माण भी बाबा से जुड़ा बताया जाता है। 1950 में यहां कुटिया बनी। 1953 में बड़े हनुमान जी की मूर्ति स्थापित हुई। राम मंदिर 1955 में और शिव मंदिर 1956-57 में बना। सालों का यह क्रम दिखाता है कि जगह एक झटके में पर्यटन स्थल नहीं बनी। धीरे-धीरे आश्रम फैला।

नैनीताल आने वाले ज्यादातर पर्यटक झील और मॉल रोड तक रह जाते हैं। हनुमान गढ़ी उन्हीं पहाड़ों में है, भीड़ कैंची जितनी नहीं। स्थानीय श्रद्धालु यहां नियमित दर्शन करते हैं। जो परिवार कैंची की लंबी कतार से बचना चाहते हैं, उनके लिए यह पड़ाव शांत विकल्प बन सकता है। रास्ता और समय मौसम पर निर्भर करता है, इसलिए स्थानीय पूछताछ जरूरी है।

बिड़ला हनुमान मंदिर: दिल्ली में निकली मूर्ति

दिल्ली वाले मंदिर की कहानी पहाड़ से अलग है। बिड़ला हनुमान मंदिर उत्तर दिल्ली में यमुना के पास महात्मा गांधी मार्ग पर स्थित है। शिलान्यास दिसंबर 1965 में तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा ने किया। मंदिर के वर्तमान पुजारी गोपाल स्वामी बताते हैं कि 1961 में नीम करौली बाबा की ओर से खुदाई कराई गई और जमीन से हनुमान जी की मूर्ति निकली।

उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला की आर्थिक मदद से मंदिर आगे बढ़ा। इसी वजह से नाम बिड़ला हनुमान मंदिर पड़ा। राजधानी में रहने वाले श्रद्धालु पहाड़ की यात्रा बिना भी बाबा से जुड़े इस स्थान तक पहुंच सकते हैं। यमुना किनारे का इलाका शहर की हलचल में है, फिर भी मंदिर की पहचान पुरानी मूर्ति और बाबा के प्रसंग से जुड़ी रहती है। यही छोटा ट्विस्ट है। पहाड़ नहीं जा सके तो दिल्ली के अंदर भी महाराज जी का पता मिल जाता है।

काकड़ीघाट आश्रम: कैंची से आगे शिव की तपोस्थली

भवाली से अल्मोड़ा जाने वाले मार्ग पर काकड़ीघाट आता है। कैंची धाम से यह जगह करीब 15 से 20 किलोमीटर आगे बताई जाती है। मूल रूप से यह सोमवारी महाराज की तपोस्थली रही। प्राचीन शिवलिंग यहीं से जुड़ा है। 1965 में नीम करौली बाबा ने यहां मंदिर-आश्रम की स्थापना करवाई।

कैंची देखने के बाद कई यात्री उसी दिन वापस नैनीताल लौट जाते हैं। काकड़ीघाट उसी रूट पर आगे पड़ता है, इसलिए चक्कर अलग से काटना नहीं पड़ता। शिव और हनुमान की भक्ति एक ही पहाड़ी पट्टी में दिखती है। सड़क संकरी हो सकती है। बारिश के दिनों में समय ज्यादा लगता है। जो शांत जगह चाहते हैं, उन्हें भीड़ के हिसाब से सुबह का समय ठीक रहता है।

Kainchi Dham Yatra: वृंदावन आश्रम और महासमाधि मंदिर

वृंदावन आश्रम मथुरा रोड के पास परिक्रमा मार्ग पर है। यहीं बाबा का महासमाधि मंदिर भी है। ब्रज आने वाले श्रद्धालु कृष्ण मंदिरों के साथ इस आश्रम का रूख करते हैं। पहाड़ की ठंड यहां नहीं मिलती। गलियों की भीड़ और परिक्रमा का शोर अलग है। फिर भी बाबा के दर्शन की चाह रखने वाले यहीं रुकते हैं।

महासमाधि स्थल को लोग अंतिम पड़ाव की तरह देखते हैं। कैंची जहां जीवनकाल का सबसे चर्चित आश्रम बना, वृंदावन समाधि से जुड़ गया। दोनों जगहों का मूड अलग है। एक जंगल और पहाड़ के बीच है, दूसरी ब्रज की परिक्रमा में। जो परिवार मथुरा-वृंदावन की यात्रा पर हों, उनके लिए यह मंदिर अतिरिक्त दिन की योजना बन सकता है।

कैंची धाम नीम करौली बाबा की सबसे चमकती पहचान है। हनुमान गढ़ी, बिड़ला हनुमान मंदिर, काकड़ीघाट और वृंदावन आश्रम उसी सेवा के फैले हुए पते हैं। कोई 1950 की कुटिया से जुड़ा है, कोई 1961 की खुदाई से, कोई सोमवारी महाराज की तपोभूमि से। फिल्म के बाद भीड़ एक जगह ठहर गई है। बाकी मंदिर अब भी अपेक्षाकृत शांत हैं। दर्शन से पहले स्थानीय समय, मौसम और भीड़ की जानकारी ले लेना ठीक रहेगा। अब देखना यह है कि यात्री सिर्फ कैंची रुकते हैं या बाबा के बाकी ठिकाने भी नक्शे पर लाते हैं।

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