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Sleeper Bus Gang Rape News: दिल्ली-NCR स्लीपर बस गैंगरेप, ग्रेटर नोएडा से कश्मीरी गेट तक सुरक्षा व्यवस्था की 7 बड़ी चूक, जिसने हिला दी व्यवस्था

Sleeper Bus Gang Rape News
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Sleeper Bus Gang Rape News: दिल्ली-एनसीआर में चलती स्लीपर बस के भीतर एक नाबालिग लड़की के साथ हुआ जघन्य गैंगरेप कांड ने एक बार फिर सार्वजनिक परिवहन और महिला सुरक्षा के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। ग्रेटर नोएडा से लेकर दिल्ली के कश्मीरी गेट तक फैले इस 43 किलोमीटर के सफर में जिस तरह से दरिंदगी को अंजाम दिया गया, उसने हर किसी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है। जांच के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस चौकसी की जो सात बड़ी खामियां सामने आई हैं, वे यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर रात के अंधेरे में हमारी सड़कों और वाहनों का सुरक्षा चक्र इतना कमजोर क्यों साबित हो रहा है।

Sleeper Bus Gang Rape News: तिरालीस किलोमीटर के लंबे सफर में सिर्फ दो चेकपॉइंट

मामले की जांच कर रही पुलिस टीम के हाथ जो शुरुआती तथ्य लगे हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। ग्रेटर नोएडा के परी चौक से लेकर दिल्ली के कश्मीरी गेट तक लगभग 43 किलोमीटर के इस पूरे रास्ते पर केवल दो ही ऐसे स्थान मिले जहां विधिवत पुलिस चेकपॉइंट सक्रिय था। इतनी लंबी दूरी तय करने के दौरान यदि सड़क पर कोई नियमित वाहन जांच या निगरानी का पुख्ता घेरा होता, तो शायद इस खौफनाक वारदात को होने से रोका जा सकता था। यह सवाल अब हर आम नागरिक के मन में बार-बार उठ रहा है कि आखिर बिना किसी प्रभावी रोक-टोक के गाड़ियां इतनी लंबी दूरी तक कैसे बेरोक-टोक दौड़ती रहती हैं।

खाली बैरिकेड्स और पुलिसकर्मियों की गैरमौजूदगी

सड़क सुरक्षा के नाम पर शहर में बड़े-बड़े ढांचे और बैरिकेड्स तो खड़े कर दिए जाते हैं, लेकिन मौके पर उनकी उपयोगिता शून्य नजर आती है। जांच में यह बात भी खुलकर सामने आई है कि मयूर विहार के पास दिल्ली-नोएडा इंटरसेक्शन पर सड़क किनारे भारी-भरकम बैरिकेडिंग तो मौजूद थी, लेकिन रात के वक्त वहां एक भी पुलिसकर्मी तैनात नहीं था। कागजों और जमीन पर सुरक्षा के बुनियादी ढांचे का होना और असल मौके पर कर्मचारियों का गायब रहना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि व्यवस्था में कहां और कितनी बड़ी ढिलाई बरती जा रही है। ऐसे में बदमाशों के हौसले बुलंद होना कोई हैरानी की बात नहीं रह जाती है।

व्यस्त चौराहों पर सीसीटीवी कैमरों का न होना

राजधानी और उससे सटे इलाकों में ट्रैफिक और आपराधिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कैमरों की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। लेकिन मयूर विहार इंटरसेक्शन जैसे बेहद व्यस्त और संवेदनशील चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल के पास सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे या उनका वहां होना ही कागजी साबित हुआ। जिस रूट से होकर वह स्लीपर बस दिल्ली की तरफ आगे बढ़ी थी, उस रास्ते पर इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस की यह बड़ी चूक जांचकर्ताओं के लिए भी सिरदर्द बन गई है। कैमरे न होने के कारण अपराधियों के वाहन की पल-पल की मूवमेंट को ट्रैक करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

वर्कशॉप जा रही बस का खुद का कैमरा भी था बंद

इस पूरी घटना का सबसे हैरान करने वाला पहलू खुद उस स्लीपर बस की तकनीकी स्थिति और उसकी आंतरिक निगरानी से जुड़ा हुआ है। ट्रैवल कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक घटना के वक्त बस में लगे सीसीटीवी कैमरे पूरी तरह से बंद थे क्योंकि बस तकनीकी खराबी के दौर से गुजर रही थी। यात्रियों की सुरक्षा का दम भरने वाली ट्रेवल एजेंसियों के वाहनों में यदि इस तरह की लापरवाही बरती जाएगी, तो कोई भी अनहोनी आसानी से छिप जाएगी। जब सफर के दौरान अंदर की गतिविधियों को रिकॉर्ड करने वाला कोई जरिया ही सक्रिय न हो, तो अपराधियों के लिए मनमानी करना बेहद आसान हो जाता है।

स्लीपर बर्थ के पर्दों ने बनाई अपराध की मुमुक्षु आड़

लंबी दूरी की स्लीपर बसों में यात्रियों की सुविधा और गोपनीयता के नाम पर बर्थ पर मोटे परदे लगाए जाते हैं। जांचकर्ताओं के अनुसार इस बस के अंदर भी खिड़कियों और बर्थ के आगे इसी तरह के परदे लटके हुए थे, जिनकी आड़ में अंदर होने वाली हरकतों को बाहर से देख पाना असंभव था। इन पर्दों की मौजूदगी ने अपराधियों के लिए एक सुरक्षित माहौल तैयार कर दिया, जहां वे आसानी से अपनी करतूतों को अंजाम दे सकते थे। यह तथ्य इस बात पर भी बहस छेड़ता है कि क्या पब्लिक ट्रांसपोर्ट में इस तरह की सुविधाएं सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा खतरा बनती जा रही हैं।

सवारी ढोने वाली बस में लड़की को बैठाने का रहस्य

यहीं पर इस मामले में एक ऐसा बड़ा ट्विस्ट सामने आता है जो हर किसी को उलझन में डाल देता है कि आखिर यह सब हुआ क्यों। ट्रैवल कंपनी और पुलिस की शुरुआती जांच बताती है कि वह बस उस वक्त किसी नियमित यात्री सेवा पर नहीं थी, बल्कि उसे तकनीकी खराबी के बाद सूरजपुर की वर्कशॉप में भेजा गया था। वर्कशॉप से उसे पेंट कराने के लिए कश्मीरी गेट ले जाया जा रहा था, तो फिर बारिश और अंधेरे के बीच परी चौक के पास उस नाबालिग लड़की को बस के अंदर क्यों बैठाया गया। कंडक्टर ने उसे सेक्टर 63 छोड़ने की बात कहकर अंदर तो ले लिया, लेकिन अब इस बात की टोह ली जा रही है कि इस पूरी साजिश के पीछे असल मंशा क्या थी।

Sleeper Bus Gang Rape News: कश्मीरी गेट पर भी नहीं था कोई सुरक्षा पहरा

तमाम जिलों की सीमाओं को लांघकर जब वह बस दिल्ली के कश्मीरी गेट तक पहुंची, तो वहां भी सुरक्षा के नाम पर कोई मजबूत घेराबंदी नहीं मिली। जिस जगह पर उस नाबालिग को बस से नीचे उतारा गया, वहां भी जांच में कोई प्रॉपर बैरिकेडिंग या जांच चौकी नहीं पाई गई। ग्रेटर नोएडा से चलकर दिल्ली के उत्तरी छोर तक पहुंचने के बावजूद रास्ते में कहीं भी बस को रोककर उसकी भौतिक जांच नहीं की गई। इन तमाम सात बड़ी खामियों ने मिलकर एक ऐसा ताना-बाना बुना जिसके कारणवानों को अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने का पूरा मौका मिल गया और किसी को भनक तक नहीं लगी।
पुलिस अब इस पूरे रूट का एक विस्तृत नक्शा तैयार करने में जुटी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि रास्ते में जितने भी कैमरे या चौकियां थीं, उन्होंने किस हद तक इस वाहन की आवाजाही को दर्ज किया। बस को अपने कब्जे में लेकर फॉरेंसिक जांच कराई जा रही है ताकि दरिंदगी के हर एक सबूत को करीने से इकट्ठा किया जा सके। इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कागजी नियम और सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे जमीन पर कितने नाकाफी साबित होते हैं। जब तक सड़क से लेकर वाहनों के भीतर तक प्रशासनिक कसावट सख्त नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोक पाना बेहद मुश्किल होगा। मामले की आगे की जांच तेजी से आगे बढ़ रही है और अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि पुलिस इस मामले में अदालत के सामने कितनी मजबूत चार्जशीट पेश करती है।

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लेखक

Sanjna Gupta

संजना गुप्ता डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी कंटेंट राइटर हैं और मुख्य रूप से लाइफस्टाइल, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। इससे पहले वे बीबी डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड में सोशल मीडिया कंटेंट राइटर रह चुकी हैं और दैनिक भास्कर में इंटर्नशिप कर चुकी हैं।

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